Wednesday, August 25, 2010

सावन आये रे सावन आये रे....

सावन आये रे

सावन आये रे....
बादल बिजुरी और हवायें
घिर आये घनघोर घटाएँ
घन बरसाएँ रे...
सावन आये रे....।

सरवन के कच्चे धागों से
बहना करे श्रृंगार भाई का
जग जाने भारत की रीति
मूल्य जाने बहना कलाई का
सब मन भाये रे.....
सावन आये रे ...।

कमलेश कुमार दीवान
24/08/2010
होशंगाबाद म.प्र.

2 comments:

  1. आप में मुझे प्रेमचंद की छवि दीखती है. इसे अतिशयोक्ति न समझें. यदि आपको कहीं कमी लग रही हो तो उसे दूर करना आपके बस में है. वैसे स्वरुप में भी काफी समानता है.

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  2. बहुत सुंदर रचना है कमलेश जी बधाई स्वीकार करें।

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