Monday, September 6, 2010

भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे (स्वरचित)

॥श्री गणेशाय नमः॥
भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे

मेरो मन न
अंत को पावे ।
मेरो मन न अंत को पावे।
कोटि    कोटि
ब्रम्हाण्ड रचियता
नित नवीन उपजावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।

लोग कहत
उजियार जगत् में
जित देखा तम है,
एक सूरज से
क्या होता है
कई करोड़ कम हैं ।
टिम  टिमाते
तारे.... तारे से
बार बार भरमावे ।
जगा जोत सम लागे।
मेरा मन न, अंत को पावे।

जो दीखें न
अँधकार है
तब प्रकाश भ्रम है
भरम मिटे न
इस दुनियाँ का
आदि ... अनादि क्रम है।
तृण....  तृण 
अनंत हो जावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।

            कमलेश कुमार दीवान
            गणेश चतुर्थी रविवार
          दिनाँक  २३ अगस्त २००९