Saturday, October 24, 2015

***कुछ लोग ही तय कर रहे हैं*****

दुनियां मे कुछ लोगो  समस्त अधिकारो कानूनो और शीर्ष पदो पर काबिज होकर आबाम् को संचालित कर सब कुछ अपनी मूट्ठि मे कैद रखने की कवायद करते रहे हैं जो स्वतँत्रता और लोकतँत्र के इस दौर मे   गैरजरूरी और अनूचित है जिसके भयावह परिणाम हमारे सामने आ रहे है ।मेरी यह कविता दिशा संवाद के बुलेटि मे प्रकाशित है अनुरीध है आप भी  पढ़े और इस दौर को समझें जिसकी पृष्टभुमि मे बीता हुआ वह समय है जिसमे अमेरिका मे  क्लिंटन और सोवियत रूस मे येल्तसिन थे।
**सबके सापेक्ष मे कूछ लोग**

कुछ लोग ही तय कर रहे हैं
बहुत कुछ इस दुनियाँ के लिये
कुछ लोगो के कानो मे पीतल के टैग लगाये गये है
(क्योकि वे प्रगतिशील हैं)
कूछ लोगौ ने छाती पर गुदने गुदवा लिये है
(क्योंकि वे अपने को परम्परावादी मानते है )
कुछ लोग पूछ रहे है कि भाई तुम किस तरफ हो
कुछ लोग बाकी लोगो के लिये रबर की सील लिये दौड़ रहे हैं
क्योकि इस सदी के अंत अंत तक
तय कर देना चाहते है कि वे इस तरफ हैं या उस ओर
सच मानो आदमी सिध्द करने के खाँचे
अब नहीं बचे हैं उनके पास
जो पहले आदमी थे
आज हम तुम बैंको व्दारा ऋण मे दिये गये रेबड़ के
बैल भैस गाय भेड़ बकरी और मेमने हैं
आधुनिक बाजार मे अपने अपने निशानों से
बिकते चले जाते है सभी के सभी
कुछ लोग समूची दुनियाँ पर
आई.एस. आई.या एगमार्क जैसे निशान बनाना चाहते है
क्योकि उन्ही के पास तो तपती सलाखे हैं
गर्म करते रहने की धमनभट्टियाँ भी ।
देखो येल्त्सिन के पास लाल बटन है और
क्लिन्टन लोकतंत्र की  चावी घुमा रहे हैं
हमारे देश मे एक ही प्रधान मंत्री है
पर लोग देश का फेडरल स्ट्रक्चर समझा रहे है
दौस्तौ दुनियाँ कैसी हो?
उसमे कौन कौन हों और कौन कौन नहीं
समाज कैसे चले
औरते कैसी हों ,उसके नाखून कितने बढ़ें,कैसे रंगे जाये
कुछ ही लोग तय कर देना चाहते है
इन कुछ लोगो के सब कुछ तय कर देने से
बाकी सब,कुछ नहीं कर पा रहें है
इसलिये कुछ लोगो के पास कारखाने हैं
जिनमे बनाये जा रहें है स्टाम्प पेड रबर मोहर और टैग
चड्ढी हाफपेंट और टोपी से लेकर लाल कुर्ते तक
सिलने सिलवाने ,पहनने या दूसरो को पहनाने
या सब कुछ को उतार फेंकने का सिलसिला चल निकला है
बिल्लो को फटी कमीज पर चिपकाये रखने
छोटे छोटे सपनो को खूँटी पर टाँगे रखने
या मूँह ढाँपकर सोते रहने से
आदमी और दुनियाँ दोनो ही बदल रही है
लोगो जरा सोचो और मालुम करो कि
हिस्से मे आये जिन्दी जिन्दी नोट
बच्चो का गला फाड़ रहे नारे और देश की छाती मे छेद करते बोट
बूढ्ढो के खँसते खंखारते रहे से क्यो झड़ रहें हैं
दुनियाँ के पास बहुत कूछ है पर
हमारे पास पा सकने लायक कुछ बी नहीं
क्योंकि कुछ ही लोग हैं
जो सभी कुछ तय कर चुके है ।

कमलेश कुमार दीवान
लेखक
होशंगाबाद म.प्र
9425642458
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24/10 /15
 

Friday, October 23, 2015

बंजारे तू गीत न गा रे

""बंजारे तू गीत न गा रे""

बंजारे तू गीत न गा रे
बस्ती बस्ती प्यार के
बस्ती बस्ती प्यार के ।।
किसी से तेरी प्रीत नहीं है
कोई तेरा मीत नहीं है
तू तो चलता ही जाता है
मंजिल कभी नहीं पाता हैं
आजा रे तू मीत बना ले
मान और मनुहार से
बँजारे तू गीत न गा रे
बस्ती बस्ती  प्यार के
हो न सके उस यार के
बंजारे तू गीत न गा रे
बस्ती बस्ती प्यार के ।

कमलेश कुमार दीवान
लेखक
18/12/2000
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