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सोमवार, 17 जुलाई 2023
कोई तो है जो
कतरा कतरा कोई तो है जो अंदर अंदर रहता है
थोड़ा- थोड़ा दर्द ही होगा , रफ्ता रफ्ता कहता है
दरिया सी ही पहुंच रही है ,पीढ़ाएं पानी पानी
जो भीतर है बाहर होकर हफ़्ता हफ्ता बहता है
देखा भी क्या वो एक समुंदर दूर दूर तक फैला है
ये एहसास हुआ है दिल में रस्ता रस्ता रहता है
चुप चुप बहुत पुकार रहे हैं लफ्ज़ लफ्ज़ धीरे धीरे
दिल की कलम रोशनाई से दस्ता दस्ता सहता है
भाग रही क्यों हवा बादलों को ले लेकर धरती पर
कहां कहां भीगा है मन भी , वस्ता- वस्ता रहता है
कमलेश कुमार दीवान
11/1/22
वस्ता=दीप्त होने वाला , चमकने वाला /दस्ता=कागज़ की गड्डी
मंगलवार, 11 जुलाई 2023
बाकी सब ठीक है
"बाकी सब ठीक है"
*कमलेश कुमार दीवान
मैं हमेशा गलती ही करता हूं
उनके साथ प्यार में दुलार में स्नेह के संसार में
सबके साथ व्यवहार में,स्वीकार में, इंकार में
हमेशा गलती ही करता हूं बस ग़लती ही करता हूं
और गलते जाता हूं हमेशा मैं ही
बाकी सब ठीक है।
मैं तनाव से टूटता भी हूं,सपनों से रूठता भी हूं
संकल्प लेता हूं, शपथ खाता हूं
कि अब त्रुटियां न हो ,गलतियों से बचा रहूं
फिर फिर त्रुटियां, गलतियां करता ही हूं
अपनों के लिए ,जो अपने नहीं रहते
सपनों के लिए जो सपने हीं रहते हैं
मनाने, महसूस करने और देखते रहे उन्हें,
जो कभी मेरे थे मुझसे ही थे
गलतियां तो आदत हो गई है आज भी गलतियां करता हूं
गलतफहमियां पालता हूं ,चुकाता जाता हूं उनका मूल्य
प्यार में, दुलार में, व्यवहार में दो
स्वीकार और इंकार के संसार में
पैसों से, समय से और विचार से
गलतियां करता हूं गलतियों पर हूं
और गलत रहते हुए गलता जाता हूं
सोचता हूं गलत ही सही हूं
जीने के लिए गलतियां ही जरूरी है
बाकी सब ठीक ही है।
कमलेश कुमार दीवान (लेखक)
नर्मदा पुरम होशंगाबाद म.प्र.
29/11/22
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023
💐प्रेम में पगे रहना ....💐
💐प्रेम मे पगे रहना 💐
*कमलेश कुमार दीवान *
जब हम हमेशा ही प्रेम मे पगे रहते हैं तब
बिसार जाते हैं प्रेम को ही
प्रेम एक आभा है आलोक है
आभास भी तो है हमारे प्रेममय होने का
प्रेम मानवीय शाश्वत मूल्यों का आलोढ़न है
प्रेम अंकुरण है ,सृष्टिमय समष्टि का
प्रेम जीवन है और जीव के चुक जाने तक भी है
प्रेम प्रेम ही है पर प्रेम मे ही पगे रहना तो नहीं है प्रेम
जीवन भी तो नहीं है यह
फिर क्यों हम पगे रहते हैं प्रेम मे ही
और रह जाते हैं घृणाँओ के स्पर्श से अछूते
जैविक अजैविक सृष्टि मे
तैरकर ,रेंगकर,चलकर,उड़कर और
स्थिरता के साथ आसमान में पर्ण फैलाएँ
जमीन में जड़े धसाएँ और उनसें ही लिपटकर
पोषण पाती लताएँ बेले भी प्रेममय हैं
अर्थात सृष्टि के सभी मनोभावों को
महसूस करते रहना भी प्रेम ही है
प्रेम मे पगे रहना ही तो प्रेम नहीं है।
कमलेश कुमार दीवान
शुक्रवार, 13 जनवरी 2023
पतंग -3
💐पतंग💐
शनिवार, 7 जनवरी 2023
इन हवाओं से
इन हवाओं से नहीं बुझते होंगे वे चिराग़
जिनको तूफ़ानों के संग साथ जलाया होगा
जिसने दरिया को धकेला है समुंदर की तरफ़
लौट कर वो ही फिर बादलों में समाया होगा
हर दराजों से झिरा, नदियों से ओझल भी हुआ
आसमां छू छू के पहाड़ों पे फिर छाया होगा
तेज थी धूप वारिश भी तो बार बार हुई
हम तो निकले ही थे तुमने बुलाया होगा
अब फिजाओं से कोई पूछता ही कब है दीवान
जिनके आने से कोई साथ घर आया होगा
कमलेश कुमार दीवान
17/12/20
रविवार, 1 जनवरी 2023
A Gift of Dawn.........New year 2023
"A Gift of Dawn....New Year 2023
Kamlesh Kumar Diwan
May there be new year, may there be joy, may there be new happiness, may there be new prosperity
New dawn, new evening, new destination
New goals, new spirits, new directions
New moon, stars, weather, new vision, new book
The new river is the New boat ⛵
the New mood and the New dreams
New ways, new journey, meaning that you are looking for
Let this be the gift of the morning.
A Gift of Dawn .
Happy New year 🎉💐 2023
Kamlesh Kumar Diwan
शुक्रवार, 18 नवंबर 2022
उनके बयान..... ग़ज़ल
उनके बयान आएंगें.......
कमलेश कुमार दीवान
चुप होती शाम और ढहते मकाम आएंगे
ज़िंदगी जी है तो हर एक के नाम आएंगे
गमों के साए उदासियां, खुशी भी साथ रही
गुजर गए जो लम्हे,वो भी तमाम आएंगे
किसी का साथ कोई और भी सफ़र में रहा
रूठने वाले तो हैं, उनसे भी पयाम आएंगे
कभी किसी को कोई याद कहां रहता है
हर एक सोचता क्या फिर वो काम आएंगे
चलो उठो अब तुम भी ये न सोचो 'दीवान '
किया न याद कभी उनके भी बयान आएंगें
कमलेश कुमार दीवान
13/1/22
मंगलवार, 8 नवंबर 2022
अंधेरा है बहुत...... ग़ज़ल
अंधेरा है बहुत
एक दिया और जलाएं कि अंधेरा है बहुत
दिलों को ऐसे मनाएं कि अंधेरा है बहुत
उजाले क़ैद हैं तमाम उनकी बस्ती में
उन्हें हम कैसे छुड़ाएं कि अंधेरा है बहुत
दिखाई दे रही रंगीनियां फिजाओं में
सभी को कैसे बताएं कि अंधेरा है बहुत
उजड़ गई है बस्तियां लुट गए हैं जहां
गरीब कैसे बताएं कि अंधेरा है बहुत
अभी देखो इन अंधेरों को संभालों 'दीवान'
उजाले आएंगे थोड़े,कि अंधेरा है बहुत
कमलेश कुमार दीवान
23/10/22
सोमवार, 7 नवंबर 2022
आज हम ...... प्रकाश पर्व
प्रकाश पर्व शुभ हो मंगलमय हो
"आज हम "
कमलेश कुमार दीवान
आओ अंतर्मन के दीप प्रज्वलित करें
आज हम
पथ पर अंधियारे फैलें हैं, दिशा दिशा भ्रम हैं
सूरज चांद सितारे सब हैं, पर उजास कम हैं
थके पके मन,ढंग मग पर है
भूले राह चले हम।
आओ अंतर्मन के दीप प्रज्वलित करें
आज हम
कमलेश कुमार दीवान (लेखक)
23/10/2016
शनिवार, 12 मार्च 2022
शाँति और युद्ध
💐शाँति और युद्ध "
*कमलेश कुमार दीवान
अभी तक शाँत थी दुनिया
लाखों लोगों के भूख से मर जाने पर
वह अशांत नहीं हुई जब भी तब लोग
गरीबी और जहालत से मर रहे थे
बच्चे ,बूढ़े, जवान नए जोड़े सबके सब
विछुड़े ,लुढ़के, काल -कलवित हुए हैं
वायरस की दी मौत से पर
यह दुनिया चुप ही रही
यह नीरवता, न बोलने ,मौन साध लेने और
ऊँगलियाँ उठाने से बचने मे पैदा हुआ गहन सन्नाटा
क्रंदन, चीत्कारों को शोर मे दबाएं जाने से
शाँति महसूस होती है
परन्तु यह सुलगती धधक कर बुझ सी गई आग
सूत्रपात होती है क्रांति का आगाज
दुनिया के सपनों को मार देने
छीनकर उनकी आजादी बेड़ियाँ पहना देने
सजाए मौत ,शूली पर चढ़ा देने से
आदमी मरता नहीं है
वह अपने समय के साथ
समा जाता है आवाम के दिलो मे
जीता है उनके विचारों , आदतो , संस्कारों में
फिर हम युद्ध क्यों कर रहे हैं?
क्यों बरसा रहे हैं बारूद आसमान से
ये बारूद अस्र शस्त्र, आयुधों के भंडार
तुम्हारे मित्र नहीं हैं
जो आज हो रहा है वह कल भी होगा
ये सूरज ,घूमती धरती वहती हवाएँ
महासागर की लहरें ,नदियां झरने तालाब
पर्वत पठार मैदान सब होंगे पर
सृष्टि में वह नहीं जो तुम हो जाना चाहते हो युद्ध
हमें शाँति चाहिए शाँति शाँति ।
कमलेश कुमार दीवान
12/3/22
सोमवार, 14 फ़रवरी 2022
प्यार .... एक सापेक्ष कविता 💐एक नज्म़
💐प्यार --एक सापेक्ष कविता 💐 एक नज्म़
कमलेश कुमार दीवान
प्यार एक ख्वाब है ,तन्हाई है सपनों का सफरप्यार बस प्यार है रोशनाई है अपनो का असर
प्यार एक दरिया है एक धार है मझधार भी है
प्यार एक कश्ती है तूफान है पतवार भी है
प्यार मंजिल है मुसाफिर है साहिल भी है
प्यार स्वीकार है इंकार है झंकार भी है
प्यार व्यवहार है दरकार भी तकरार भी है
प्यार एक वास्ता एक रास्ता इकरार भी है
प्यार एक प्यास है एहसास है एक आश भी है
प्यार जीवन है एक राग है नैराश्य भी है
प्यार हो जाना है पा जाना है खो जाना भी
प्यार रूसवाई है चलना भी है रूक जाना भी
प्यार बादल है वारिस है हरजाई भी
प्यार सागर है उफान है गहराई भी है
प्यार तो दिल के खेतों मे ऊग आई फसल
प्यार वस प्यार है कोई दूसरा संसार नहीं
कमलेश कुमार दीवान
28/8/99
शनिवार, 5 फ़रवरी 2022
बसंत गीत..... कमलेश कुमार दीवान
💐बसंत गीत💐
कमलेश कुमार दीवान
बसंत ....यह क्रम अनंत आया है
अब बसंत आया है ।पीली चूनर ओढ़े फूल खिल खिला रहें हैं
आम्र बौर लद रहें हैं ,खेत फिर बुला रहे हैं
नभ की ओर उठ गई हैं डालियां पसारे पात
निखर निखर खिर रहे हैं वृक्ष फूल पारिजात
वन वन आनंद छाया है ,यह क्रम अनंत आया है
अब बसंत आया है ........
खिल उठी लताएँ भी मौन हम भी क्यों रहें
तुम भी गीत गाओं और कुछ कथाएँ हम कहें
सृष्टि का यह क्रम अनंत फैल रहा दिग दिगंत
आया छाया बसंत मन न जाए ,भरमाएँ ये अंत
हम सबको भाया है .....
अब बसंत आया है ,अब बसंत आया है ।
कमलेश कुमार दीवान
17/2/21
गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022
माँ 💐माँ को समर्पित रचना
💐माँ💐
कमलेश कुमार दीवान
तुम सा क्या हो पाना , तो एक नदी सी हो माँजीवन पथ पहाड़ जैसे हैं,घने सघन वन प्रांतर मन
सृष्टि सृजन पालन पोषण,मोह पाश भव के बंधन
चली जहां से फिर वैसे भी ,यहीं किनारे बहना हैं
कष्ट सहे दुख झेले कितने , उन्हीं सहारे रहना है
आँगन आँगन एक ढिठोना, तुम संसार सदी सी हो मां।
तुम सा क्या हो पाना है माँ ,तुम तो एक नदी सी हो माँ।
निर्मल पावन झर झर झरने ,द्वीप देश द्वारे दर दर
तुमने जिया अकेले जीवन बाकी के तो सब हर घर
मिलने मे विशाल सागर सी ,ऊँचे मे आकाश लगी
घर घर की संजीवनी बगिया ,जैसे खड़ी हिमालय सी
तुम तारा हो आसमान भी, तुम ही सप्त्ऋषि सी हो माँ
तुम सा क्या हो आना है माँ ,तुम तो एक नदी सी हो माँ।
कमलेश कुमार दीवान
1/2/22
बुधवार, 2 फ़रवरी 2022
बेटियों को याद कर ...गजल
💐बेटियों को याद कर💐
कमलेश कुमार दीवान
हम चले आए यहां बेटियों को याद करबहुत लहराए हवा में, बेटियों को याद कर
क्या करें इस देश में भी हो रहे परदेशी हम
कैसे बिसराए जहाँ में , बेटियों को याद कर
हमने ये पाया नया सब, पर पुराना भी वहां
ऐसे बतियाएँ वहां पर ,बेटियों को याद कर
अब हमारा जिन्दगी जीने का मकसद भी यही
हर समय उत्सव मनाएं ,बेटियों को याद कर
वो बहुत हैं दूर ,जाना भी कठिन उनके यहां
बात कर आँसू - बहाएँ ,बेटियों को याद कर
तुम कहाँ उलझे हुए हैं 'याद में ऐसे दीवान '
गीत लिख लें गुनगुनाएंँ , बेटियों को याद कर
कमलेश कुमार दीवान
31/1/22
शनिवार, 8 जनवरी 2022
गजल ... हमने खुशबू से कहा
" हमने खुशबू से"
हमने खुशबू से कहा छोड़ हवा का दामन
वो लरजती रही सकुचाई भी शरमाई भी
उसने तूफान के संग साथ ही रहना चाहा
बाग में तितलियों भंवरों की याद आई भी
फूल से था तो बहुत पास का गहरा रिश्ता
बागवां खामोश हुआ तो पाई तन्हाई भी
अभी सूखी हुई है शाख और उड़े हुए हैं रंग
जो बिखरती रही हूं साथ ले आशनाई भी
वो तो चुप हो गए देकर मुझे खूशबू 'दीवान'
जो सिमटती रही ग़ज़लों से और रूबाई में भी
कमलेश कुमार दीवान
27/12/21
शनिवार, 18 दिसंबर 2021
चुपके चुपके कहना था
चुपके चुपके कहना था कुछ और सिमट कर सो जाना
सीली गीली यादे लेकर फिर एक मां सी रो जाना
कैसा है यह चांद यहां फिर अगहन की कुछ रातों काकुछ यादें कुछ बातें सपने और आंसू आंसू हो जाना
मोड़ बहुत थे गलियों में भी घर आंगन एक कोना था
बहुत अकेला मन रहता पर अपना वही खिलौना था
दूर बहुत थी राहें , राहों में उलझन थी बड़ी बड़ी
चलते चलते फिर मंजिल तक ढेर सी यादें बोना था
रफ्ता रफ्ता सहना था कुछ और लिपटकर खो जाना
तीली तीली यादे लेकर एक ही बाजू सो जाना
कमलेश कुमार दीवान
13/12/21
बुधवार, 15 सितंबर 2021
न जाने क्या जमीं का हो.....गजल
बहुत मदहोश हैं बादल ,न जाने क्या जमीं का हो
हवा में ताप भी ज्यादा न जाने क्या जमीं का हो
सूरज से बरसती हो तपन ,धरा से आग उठती हो
मौसम भी सितमगर है,न जाने क्या जमीं का हो
सागर की सतह से बहुत ऊँची उठ रही लहरें
तटों पर टूटती हैं तब ,न जाने क्या जमीं का हो
खिसकते बर्फ के हिस्से और ढहते शीर्ष पर्वत के
नदी में आ रहा मलबा न जाने क्या जमीं का हो
थिरकती सी हवाएँ दे रही तूफानों की आहट
उठेंगे जब बबंडर तब ,न जाने क्या जमी का हो
कमलेश कुमार दीवान
11/7/21
*यह रचना मौसम के वर्तमान हालत और जमीन पर उसके प्रभाव के संबंध में है
बुधवार, 14 जुलाई 2021
निराश न हो .......एक गजल आशाओं के सृजन हेतु
निराश न हो मेरे दोस्त ,हौंसला भी रख्खो
आते हुये जाएंगें मौसम भी बदलते हैं
ये जो गर्दिश है ढल जायेगी सूरज की तरह
इनआसुंओसे पत्थर भी पिघलते हैं
ह्म है तो जमीं और सितारे फलक पे होंगे
इस कायनात मे सब साथ साथ चलते हैं
सब तो आशाओं मे ठ हरे हुए होंगे दीवान
अपनी यादें हैं जिसके सिलसिले से चलते हैं
कमलेश कुमार दीवान
16/4/21
गुरुवार, 17 जून 2021
जो तुम चलो तो
"जो तुम चलो तो"
कमलेश कुमार दीवान
जो तुम चलो तो दुनियां भी चलेगी ऐसे
जैसे आकाश मे चाँद सितारे से चलें
जो तुम चलो तो .........
रुके हैं आज अँधेरें हर एक मंजिल पर
उजाले कैसे दिखेगें किसी भी तंगदिल पर
असर भी चुक रहें हैँ खुट रही हैं आशाएँ
ये जो विश्वास है वह भी तो इशारों से चले ।
जो तुम चलो तो ........
बहुत हुई हैं मिन्नते अब आरजू भी नहीं
ये जो राहों की सदाएँ हैं उसी छोर से हैं
अब हवाएँ नहीं होती हैं कभी तूफान के साथ
कराह उठे हैं सागर भी सभी ओर से हैं
ये कायनात ही सभी कुछ संभालती हैं यहाँ
सभी इंतजाम कर सूरज भी सबेरे से चले ।
जो तुम चलो तो .........
कमलेश कुमार दीवान
10/5/21
शुक्रवार, 28 मई 2021
हम आसमां से कहे ....गजल
" हम आसमां से कहे "
कमलेश कुमार दीवान
हम आसमाँ से कहे ,अपनी बदल ले तस्वीर
दो चार सूरज हों और चाँद हो दस॑ बीस
फलक पे तारे हों जो चल सके इशारों से
जमी पे पेड़ हों तो सब ही हों पहाड़ो पर
कोई तो पासवाँ से कहे अपनी बदल ले तकरीर
एक आध अपनी बात हो और किताब से दस बीस ।
हम आसमाँ से .......
हम हवाओं से कहे जब भी चले धीरे वहें
रोक ले बादलो को , जब कहे तब ही बरसें
धरा से चाहे कि वो ही रहे सटकर हमसे
नदी को बाँध ले भरमाये न इनसे सागर
आसमां हम ही हों तब सब ही बदल देंगें तकदीर
एक आध अपने ठाँव हों खिताब हों दस बीस ।
हम आसमां से .......
कमलेश कुमार दीवान
15/5/21