यह ब्लॉग खोजें

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

"जरा संभल के चलो" ...गजल

                          " जरा संभल के चलो "

                                                            कमलेश कुमार दीवान 

बहुत खामोश हैं लम्हे उदास सुबह और शाम

क्या होगी रात भी ऐसी ,जरा संभल के चलो 

हुई हैं बंदिशे आयत खुले दरीचे भी कहां होगें 

किसी से बात हो कैसे ,जरा संभल के चलो 

अब हवाये बहुत धीमे से चल रही है यहां

उसी के साथ है तूफांं , जरा संभल के चलो 

हम भी पेड़ो से गिरे सूखे पत्तो की तरह 

हमारे पास ही आतिश, जरा संभल के चलो

अपने जेहन मे भी इतनी जगह रखो 'दीवान'

किसी से घात भी हो तो, जरा संभल के चलो

कमलेश कुमार दीवान 

26/4/2021 

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

बहुत उदास है शामें......गजल

 


💐उदास है शामें💐
बहुत उदास हैं शामें जरा ठहर के चलो
किसी का हाथ भी थामों जरा ठहर के चलो
यहां हैं बंदिशें बहुत न जाने और क्या क्या हो
रहेंगे कैद भी सूरज , जरा ठहर के चलो
हम आम हैं या खास होंगें कुछ पता ही नहीं
बताए जा रहे हैं क्या जरा ठहर के चलो
इन हवाओं ने हमें कब से छोड़ रख्खा है
कुछ एक देर सही पर जरा ठहर के चलो
अब आस्तीनों मे इतनी जगह कहाँ है 'दीवान'
समाए फिर कोई मंजर जरा ठहर के चलो


कमलेश कुमार दीवान
16/4/21









शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

लाकडाऊन की सुबह

            💐लाकडाऊन की सुबह💐

कितनी शांत नीरव और आने जाने की भाग दौड़ के लिए
तड़फ विहीन होती है आज जाना
शहरों से शोर गायब है, हिरा गया है भरापूरा पन
गांवो से भी किसी ने लील लिया है अपनापन
सड़कें सूनी सूनी सी हैं नदियां अकेली सी
पहाड़ ही यदाकदा सुलग उठते हैं यहां वहां
सब कुछ रिक्त सा है उदास है एक रूआँसा पन समाए हुए है
जैसे अभी अभी निकली हो धरती समुद्र से
एक युग डूबे रहने के बाद
थम गया है सभी कुछ अनायास बर्फ से जमे हुए घर
खिड़कियों से झाँकते बच्चे तक रहे हैं शून्य सुबह से
चिड़िया देख रहीं हैं कहीं तो होंगीं पड़ी हुई
चावल की टूटन कनकियाँ ,पानी का खप्पर मुँडेरों पर
गाए घूम रही हैं घरों घर रोटी मिलने की आश मे
कहीं कुछ भी नहीं हैं दूर दूर तक
तितलियां भौंरे लापता हैं
सुनाई नहीं देती हैं बच्चों की किलकारियां
ये विषाणु फिर रच रहे हैं विनाश किसी नई सृष्टि के लिए
जिसमें नहीं हो सकेंगी लाकडाऊन जैसी सुबह
दोपहर शाम और कर्फ्यू जैसी रातें

कमलेश कुमार दीवान
14/4/21