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शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

पतंग -3

  💐पतंग💐

                             *कमलेश कुमार दीवान*
कुछ खास है अरमां, जिन्हें लेकर उड़े पतंग
ख्वाहिश हवा के हाथ मे देकर उड़े पतंग
देखो उसे आकाश में पहुँची है बहुत दूर
बदला हवा ने रूख तो फिरकर उड़े पतंग
पहले तो संग साथ का त्यौहार था यही
इस दौर ए सियासत मे क्यों कर उड़े पतंग
ऊपर गई इतराई भी लहराई संग साथ 
खुशियाँ बनी हैं सपने संजोकर उड़े पतंग
माँजा हैं बहुत तेज दांव पेंच हैं  'दीवान'
जाने दो ऊंची और जी भरकर उड़े पतंग
कमलेश कुमार दीवान 
10/1/23

शनिवार, 7 जनवरी 2023

इन हवाओं से

 इन हवाओं से बुझते नहीं होंगे वे चिराग़

जिनको तूफ़ानों के संग साथ जलाया होगा

जिसने दरिया को धकेला है समुंदर की तरफ़

लौट कर वो ही फिर बादलों में समाया होगा

हर दराजों से झिरा, नदियों से ओझल भी हुआ

आसमां छू छू के पहाड़ों पे फिर छाया होगा

तेज थी धूप वारिश भी तो बार बार हुई 

हमने तो निकले ही थे कि तुमने बुलाया  होगा

इन फिजाओं से कोई पूछता ही कब है दीवान 

जिनके आने से कोई साथ साथ घर आया होगा 

कमलेश कुमार दीवान

17/12/20

रविवार, 1 जनवरी 2023

A Gift of Dawn.........New year 2023

 "A Gift of Dawn....New Year 2023

                                   Kamlesh Kumar Diwan

 May there be new year, may there be joy, may there be new happiness, may there be new prosperity

 New dawn, new evening, new destination

 New goals, new spirits, new directions

 New moon, stars, weather, new vision, new book

 The new river is the New boat ⛵

 the New mood and the New dreams

 New ways, new journey, meaning that you are looking for

 Let this be the gift of the morning.

A Gift of Dawn .

Happy New year 🎉💐 2023

 Kamlesh Kumar Diwan


शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

उनके बयान..... ग़ज़ल

 उनके बयान आएंगें.......

                                 कमलेश कुमार दीवान 

चुप होती शाम और ढहते मकाम आएंगे

ज़िंदगी जी है तो हर एक के नाम आएंगे

गमों के साए उदासियां, खुशी भी साथ रही 

गुजर गए जो लम्हे,वो भी तमाम आएंगे

किसी का साथ कोई और भी सफ़र में रहा

रूठने वाले तो हैं, उनसे भी पयाम आएंगे

कभी किसी को कोई याद कहां  रहता है

हर एक सोचता क्या फिर वो काम आएंगे

चलो उठो अब तुम भी ये न सोचो 'दीवान '

किया न याद कभी उनके भी बयान आएंगें

कमलेश कुमार दीवान

13/1/22








मंगलवार, 8 नवंबर 2022

अंधेरा है बहुत...... ग़ज़ल

 अंधेरा है बहुत

एक दिया और जलाएं कि अंधेरा है बहुत

दिलों को ऐसे मनाएं कि अंधेरा है बहुत

उजाले क़ैद हैं तमाम उनकी बस्ती में

उन्हें हम कैसे छुड़ाएं कि अंधेरा है बहुत

दिखाई दे रही रंगीनियां फिजाओं में

सभी को कैसे बताएं कि अंधेरा है बहुत

उजड़ गई है बस्तियां लुट गए हैं जहां

गरीब कैसे बताएं कि अंधेरा है बहुत

अभी देखो इन अंधेरों को संभालों 'दीवान'

उजाले आएंगे थोड़े,कि अंधेरा है बहुत 

कमलेश कुमार दीवान 

23/10/22




सोमवार, 7 नवंबर 2022

आज हम ...... प्रकाश पर्व

 प्रकाश पर्व शुभ हो मंगलमय हो 

     "आज हम "

                 कमलेश कुमार दीवान 

आओ अंतर्मन के दीप प्रज्वलित करें

आज हम 

पथ पर अंधियारे फैलें हैं, दिशा दिशा भ्रम हैं

सूरज चांद सितारे सब हैं, पर उजास कम हैं

थके पके मन,ढंग मग पर है

भूले राह चले हम।

आओ अंतर्मन के दीप प्रज्वलित करें

आज हम

कमलेश कुमार दीवान (लेखक)

23/10/2016


शनिवार, 12 मार्च 2022

शाँति और युद्ध

      💐शाँति और युद्ध "

                                 *कमलेश कुमार दीवान

अभी तक शाँत थी दुनिया 

लाखों लोगों के भूख से मर जाने पर 

वह अशांत नहीं हुई जब भी तब लोग 

गरीबी और जहालत से मर रहे थे 

बच्चे ,बूढ़े, जवान नए जोड़े  सबके सब

 विछुड़े ,लुढ़के, काल -कलवित हुए हैं

वायरस की दी मौत से पर 

यह दुनिया चुप ही रही 

यह नीरवता, न बोलने ,मौन साध लेने और

ऊँगलियाँ उठाने से बचने मे पैदा हुआ गहन सन्नाटा

क्रंदन, चीत्कारों को शोर मे दबाएं जाने से 

शाँति महसूस होती है 

परन्तु यह सुलगती धधक कर बुझ सी गई आग 

सूत्रपात होती है क्रांति का आगाज 

दुनिया के सपनों को मार देने 

छीनकर उनकी आजादी बेड़ियाँ पहना देने 

सजाए मौत ,शूली पर चढ़ा देने से

आदमी मरता नहीं है 

वह अपने समय के साथ 

समा जाता है आवाम के दिलो मे

जीता है उनके विचारों , आदतो , संस्कारों में

फिर हम युद्ध क्यों कर रहे हैं?

क्यों बरसा रहे हैं बारूद आसमान से 

ये बारूद अस्र शस्त्र, आयुधों के भंडार 

तुम्हारे मित्र नहीं हैं 

जो आज हो रहा है वह कल भी होगा 

ये सूरज ,घूमती धरती वहती हवाएँ

महासागर की लहरें ,नदियां झरने तालाब 

पर्वत पठार मैदान सब होंगे पर

सृष्टि में वह नहीं जो तुम हो जाना चाहते हो युद्ध 

हमें शाँति चाहिए शाँति शाँति ।

           कमलेश कुमार दीवान 

          12/3/22

सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

प्यार .... एक सापेक्ष कविता 💐एक नज्म़

 💐प्यार  --एक सापेक्ष कविता 💐 एक नज्म़

                                    कमलेश कुमार दीवान

प्यार एक ख्वाब है ,तन्हाई है सपनों का सफर
प्यार बस प्यार है रोशनाई है अपनो का असर
प्यार एक दरिया है एक धार है मझधार भी है
प्यार एक कश्ती है तूफान है पतवार भी है
प्यार मंजिल है मुसाफिर है साहिल भी है
प्यार स्वीकार है इंकार है झंकार भी है
प्यार व्यवहार है दरकार भी तकरार भी है
प्यार एक वास्ता एक रास्ता इकरार भी है
प्यार एक प्यास है एहसास है एक आश भी है
प्यार जीवन है एक राग है नैराश्य भी है
प्यार हो जाना है पा जाना है खो जाना भी
प्यार रूसवाई है चलना भी है रूक जाना भी
      प्यार बादल है  वारिस है हरजाई भी
      प्यार सागर है उफान है गहराई भी है
      प्यार तो दिल के खेतों मे ऊग आई फसल
       प्यार वस प्यार है कोई दूसरा संसार नहीं
कमलेश कुमार दीवान
28/8/99

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

बसंत गीत..... कमलेश कुमार दीवान

 💐बसंत गीत💐

                  कमलेश कुमार दीवान

बसंत ....यह क्रम अनंत आया है

अब बसंत आया है ।
पीली चूनर ओढ़े फूल खिल खिला रहें हैं
आम्र बौर लद रहें हैं ,खेत फिर बुला रहे हैं
नभ की ओर उठ गई हैं डालियां पसारे पात
निखर निखर खिर रहे हैं वृक्ष फूल पारिजात
वन वन आनंद छाया है ,यह क्रम अनंत आया है
अब बसंत आया है ........
खिल उठी लताएँ भी मौन हम भी क्यों रहें
तुम भी गीत गाओं और कुछ कथाएँ हम कहें
सृष्टि का यह क्रम अनंत फैल रहा दिग दिगंत
आया छाया बसंत मन न जाए ,भरमाएँ ये अंत
हम सबको भाया है  .....
अब बसंत आया है ,अब बसंत आया है ।
कमलेश कुमार दीवान
17/2/21

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

माँ 💐माँ को समर्पित रचना

              💐माँ💐

                                    कमलेश कुमार दीवान

तुम सा क्या हो पाना , तो एक नदी सी हो माँ
जीवन पथ पहाड़ जैसे हैं,घने सघन वन प्रांतर मन
सृष्टि सृजन पालन पोषण,मोह पाश भव के बंधन
चली जहां से फिर वैसे भी ,यहीं  किनारे बहना हैं
कष्ट सहे दुख झेले कितने , उन्हीं सहारे रहना है
आँगन आँगन एक ढिठोना, तुम संसार सदी सी हो मां।
तुम सा क्या हो पाना है माँ ,तुम तो एक नदी सी हो माँ।
निर्मल पावन झर झर झरने ,द्वीप  देश द्वारे दर दर
तुमने जिया अकेले जीवन बाकी के तो सब हर घर
मिलने मे विशाल सागर सी ,ऊँचे मे  आकाश लगी
घर घर की संजीवनी बगिया ,जैसे खड़ी हिमालय सी
तुम तारा हो आसमान  भी, तुम ही सप्त्ऋषि सी हो माँ
तुम सा क्या हो आना है माँ ,तुम तो एक नदी सी हो माँ।

कमलेश कुमार दीवान
1/2/22





बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

बेटियों को याद कर ...गजल

            💐बेटियों को याद कर💐

                                         कमलेश कुमार दीवान

हम चले आए यहां  बेटियों को याद कर
बहुत लहराए हवा में, बेटियों को याद कर
क्या करें इस देश में भी हो रहे परदेशी हम
कैसे बिसराए जहाँ में , बेटियों को याद कर
हमने ये पाया नया सब, पर पुराना भी वहां
ऐसे बतियाएँ वहां पर ,बेटियों को याद कर
अब हमारा जिन्दगी जीने का मकसद भी यही
हर समय उत्सव मनाएं ,बेटियों को याद कर
वो बहुत हैं दूर ,जाना भी कठिन उनके यहां
बात कर आँसू - बहाएँ ,बेटियों को याद कर
तुम कहाँ उलझे हुए हैं 'याद में ऐसे   दीवान '
गीत लिख लें गुनगुनाएंँ  , बेटियों को याद कर
कमलेश कुमार दीवान
31/1/22

शनिवार, 8 जनवरी 2022

गजल ... हमने खुशबू से कहा

       " हमने खुशबू से"

हमने खुशबू से कहा छोड़ हवा का दामन

वो लरजती रही सकुचाई भी शरमाई भी

उसने तूफान के संग साथ ही रहना चाहा

बाग में तितलियों भंवरों की याद आई भी

फूल से था तो बहुत पास का गहरा रिश्ता

बागवां खामोश हुआ तो पाई तन्हाई भी

अभी सूखी हुई है शाख और उड़े हुए हैं रंग

जो बिखरती रही हूं साथ ले आशनाई भी

वो तो चुप हो गए देकर मुझे खूशबू 'दीवान'

जो सिमटती रही ग़ज़लों से और रूबाई में भी

कमलेश कुमार दीवान

27/12/21


शनिवार, 18 दिसंबर 2021

चुपके चुपके कहना था

 चुपके चुपके कहना था कुछ और सिमट कर सो जाना

सीली गीली यादे लेकर  फिर एक मां सी रो जाना

कैसा है यह चांद यहां फिर अगहन की कुछ रातों का
कुछ यादें कुछ बातें  सपने और आंसू आंसू हो जाना
मोड़ बहुत थे गलियों में भी  घर आंगन एक  कोना था
बहुत अकेला मन रहता पर अपना वही  खिलौना था
दूर बहुत थी राहें ,  राहों में उलझन थी बड़ी बड़ी
चलते चलते फिर मंजिल तक  ढेर सी यादें बोना था
रफ्ता रफ्ता सहना था कुछ और लिपटकर खो जाना
तीली तीली यादे लेकर   एक ही बाजू सो जाना
कमलेश कुमार दीवान
13/12/21

बुधवार, 15 सितंबर 2021

न जाने क्या जमीं का हो.....गजल

 बहुत मदहोश हैं बादल ,न जाने क्या जमीं का हो

हवा में ताप भी ज्यादा न जाने क्या जमीं का हो

सूरज से बरसती हो तपन ,धरा से आग उठती हो 

मौसम भी सितमगर है,न जाने क्या जमीं का हो 

सागर की सतह से बहुत ऊँची उठ रही लहरें 

तटों पर टूटती हैं तब ,न जाने क्या जमीं का हो

खिसकते बर्फ के हिस्से और ढहते शीर्ष पर्वत के 

नदी में आ रहा मलबा न जाने क्या जमीं का हो 

थिरकती सी हवाएँ दे रही तूफानों की आहट 

उठेंगे जब बबंडर तब ,न जाने क्या जमी का हो 

कमलेश कुमार दीवान

11/7/21

*यह रचना मौसम के वर्तमान हालत और जमीन पर उसके प्रभाव के संबंध में है 

बुधवार, 14 जुलाई 2021

निराश न हो .......एक गजल आशाओं के सृजन हेतु

 निराश न हो मेरे दोस्त ,हौंसला भी रख्खो 

आते हुये जाएंगें मौसम भी बदलते हैं

ये जो गर्दिश है ढल जायेगी सूरज की तरह 

इनआसुंओसे पत्थर भी पिघलते हैं 

ह्म है तो जमीं और सितारे फलक पे होंगे 

इस कायनात मे सब साथ साथ चलते हैं 

सब तो आशाओं मे ठ हरे हुए होंगे दीवान 

अपनी यादें हैं जिसके सिलसिले से चलते हैं 

कमलेश कुमार दीवान 

16/4/21

गुरुवार, 17 जून 2021

जो तुम चलो तो

     "जो तुम चलो तो"

                कमलेश कुमार दीवान

जो तुम चलो तो दुनियां भी चलेगी ऐसे

जैसे आकाश मे चाँद सितारे से चलें 

जो तुम चलो तो .........

रुके हैं आज अँधेरें हर एक मंजिल पर 

उजाले कैसे दिखेगें किसी भी तंगदिल पर 

असर भी चुक रहें हैँ खुट रही हैं आशाएँ

ये जो विश्वास है वह भी तो इशारों से चले ।

जो तुम चलो तो ........

बहुत हुई हैं मिन्नते अब आरजू भी नहीं 

ये जो राहों की सदाएँ हैं उसी छोर से हैं 

अब हवाएँ नहीं होती हैं कभी तूफान के साथ 

कराह उठे हैं सागर भी सभी ओर से हैं 

ये कायनात ही सभी कुछ संभालती हैं यहाँ 

सभी इंतजाम कर सूरज भी सबेरे  से चले  ।

जो तुम चलो तो .........


कमलेश कुमार दीवान 

10/5/21 

शुक्रवार, 28 मई 2021

हम आसमां से कहे ....गजल

           " हम आसमां से कहे "

                                कमलेश कुमार दीवान

हम आसमाँ से कहे ,अपनी बदल ले तस्वीर 

दो चार सूरज हों और चाँद हो दस॑ बीस

फलक पे तारे हों जो चल सके इशारों से 

जमी पे पेड़ हों तो सब ही हों पहाड़ो पर

कोई तो पासवाँ से कहे अपनी बदल ले तकरीर 

एक आध अपनी बात हो और किताब से दस बीस ।

हम आसमाँ से .......

हम हवाओं से कहे जब भी चले  धीरे वहें

रोक ले बादलो को  , जब कहे तब ही बरसें 

धरा से चाहे कि वो ही रहे सटकर हमसे

नदी को बाँध ले भरमाये न इनसे सागर 

आसमां हम ही हों तब सब ही बदल देंगें तकदीर 

एक आध अपने ठाँव हों खिताब हों दस बीस ।

हम आसमां से .......


कमलेश कुमार दीवान 

15/5/21 

सोमवार, 3 मई 2021

कुछ बाते .........एक गीत

                 "कुछ बाते "        

                               कमलेश कुमार दीवान 

कुछ बाते जो नई नई सी 

अच्छी लगती हैं

यादों के अथाह सागर मे 

डूब डूब जाता है जब मन

होती है बरसात बहुत और 

भीग भीग जाता है जब तन

फिर आती है जब कुछ राते 

छुई मुई सी कुछ सौगाते

नई नई सी सच्ची लगती है 

कुछ बाते .......

कुछ बाते जो बहुत पुरानी 

कही कही अनकही शेष हैं 

वो भी एक कहानी सी हैं 

यादें रची‌‌‌- बसी बचपन की

लगती अब गुड़ ‌‌‌‌- धानी सी है 

भर भर जाता है जब मन 

फिर भाती अच्छी सी बातें

कई कई तो कच्ची सी लगती हैं

कुछ बाते जो नई नई सी 

अच्छी लगती हैं 

कुछ सौगातें जो नई नई सी 

सच्ची लगती हैं 

कमलेश कुमार दीवान 

30/8/20

 




बुधवार, 28 अप्रैल 2021

जरा संभल के चलो ...गजल

                          " जरा संभल के चलो "

                                                            कमलेश कुमार दीवान 

बहुत खामोश हैं लम्हे उदास सुबह और शाम

क्या होगी रात भी ऐसी ,जरा संभल के चलो 

हुई हैं बंदिशे आयत खुले दरीचे भी कहां होगें 

किसी से बात हो कैसे ,जरा संभल के चलो 

अब हवाये बहुत धीमे से चल रही है यहां

उसी के साथ है तूफांं , जरा संभल के चलो 

हम भी पेड़ो से गिरे सूखे पत्तो की तरह 

हमारे पास ही आतिश, जरा संभल के चलो

अपने जेहन मे भी इतनी जगह रखो 'दीवान'

किसी से घात भी हो तो, जरा संभल के चलो

कमलेश कुमार दीवान 

26/4/2021 

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

बहुत उदास है शामें......गजल

 


💐उदास है शामें💐
बहुत उदास हैं शामें जरा ठहर के चलो
किसी का हाथ भी थामों जरा ठहर के चलो
यहां हैं बंदिशें बहुत न जाने और क्या क्या हो
रहेंगे कैद भी सूरज , जरा ठहर के चलो
हम आम हैं या खास होंगें कुछ पता ही नहीं
बताए जा रहे हैं क्या जरा ठहर के चलो
इन हवाओं ने हमें कब से छोड़ रख्खा है
कुछ एक देर सही पर जरा ठहर के चलो
अब आस्तीनों मे इतनी जगह कहाँ है 'दीवान'
समाए फिर कोई मंजर जरा ठहर के चलो


कमलेश कुमार दीवान
16/4/21









शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

लाकडाऊन की सुबह

            💐लाकडाऊन की सुबह💐

कितनी शांत नीरव और आने जाने की भाग दौड़ के लिए
तड़फ विहीन होती है आज जाना
शहरों से शोर गायब है, हिरा गया है भरापूरा पन
गांवो से भी किसी ने लील लिया है अपनापन
सड़कें सूनी सूनी सी हैं नदियां अकेली सी
पहाड़ ही यदाकदा सुलग उठते हैं यहां वहां
सब कुछ रिक्त सा है उदास है एक रूआँसा पन समाए हुए है
जैसे अभी अभी निकली हो धरती समुद्र से
एक युग डूबे रहने के बाद
थम गया है सभी कुछ अनायास बर्फ से जमे हुए घर
खिड़कियों से झाँकते बच्चे तक रहे हैं शून्य सुबह से
चिड़िया देख रहीं हैं कहीं तो होंगीं पड़ी हुई
चावल की टूटन कनकियाँ ,पानी का खप्पर मुँडेरों पर
गाए घूम रही हैं घरों घर रोटी मिलने की आश मे
कहीं कुछ भी नहीं हैं दूर दूर तक
तितलियां भौंरे लापता हैं
सुनाई नहीं देती हैं बच्चों की किलकारियां
ये विषाणु फिर रच रहे हैं विनाश किसी नई सृष्टि के लिए
जिसमें नहीं हो सकेंगी लाकडाऊन जैसी सुबह
दोपहर शाम और कर्फ्यू जैसी रातें

कमलेश कुमार दीवान
14/4/21

बुधवार, 10 मार्च 2021

पंतंग💐.... दो गजलें

             💐 पंतंग💐

रूख देख हवाओं का उड़ाओगे जब पतंग
छू लेगी आसमान को रह जाए सभी दंग
कोहरा भी बादल भी हैं कौधेंगी बिजुरिया
चरखी के साथ धागा चलाने का आए ढंग
साथी भी अपना हो माझा भी स्वयं का
जब देर तक आकाश में ठहरी रहे पतंग
कागज तो ताव ही हो पिंचीं हो बाँस की
अच्छी बने कमान तो लहरायेगी पतंग
जब भी किसी मकसद से उड़ाएंगे मेहरबां
काटेंगे दूसरों की खुद ही की गिरे पतंग
हम अपनी पतंग को कभी ऐसे न उड़ाएं
पंछी गिरे दो चार और लुट जाएं फिर पतंग
कमलेश कुमार दीवान
17/2/21
       💐पतंग.... 2
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
कुछ खास से अरमानों को लेकर उड़ी पतंग
कुछ ख्वाहिशो के साथ  मे जीती रही पतंग
उड़ती हुई वो दूर तक पहुंची जरूर थी
बदला हवा का रूख तो उलझती गई पतंग
एक दौर रहा होगा जब त्यौहार थी पतंग
अब दौरे  सियासत का मापन बनी पतंग
ऊँची बहुत गई थी कभी आसमान मे
माँझा बहुत था तेज कटकर गिरी  पतंग
कमलेश कुमार दीवान
18/2/21

शनिवार, 6 मार्च 2021

इसलिए तो....अब हमें चलना ही होगा

                   

                       💐 इसलिए तो ....।।अब हमें चलना ही होगा 💐      
                                                        *कमलेश कुमार दीवान
               अब हमें चलना ही होगा ,कलम लेकर कैमरों के सामने
                थामकर हर हाथों में अखबार अपने 
                बरना ये दुनियाँ हमें जीने नहीं देगी 
               अब हमें चलना ही होगा कलम लेकर कैमरों के सामने।
                हम चले तो चल पड़ेगीं ,कश्तियाँ कागज की भी 
                हम उठे तो जाग उठेंगीं ,बस्तियाँ  जो सो गई थी कभी 
               अब हमें ढलना ही होगा स्याही कागज पेन मे 
               सब उतरना चाहेंगे भी ,इस गंगो-जमुन के चैन में
               अब ये सपने चुभ रहें हैं आस्तीनों में
               आदमी तो हैं हमें झौका मशीनों मे 
              अब निकलना है हमीं को अमन के वास्ते
              अपने ही सर ,सरजमीं और चमन के वास्ते 
              शांति होगी तभी होंगें सहमति के रास्ते
             अब हमें चलना ही होगा कलम लेकर कैमरों के सामने
             थामकर हाथों में अखबार अपने ...अब हमें ।
             क्या तुम्हारी कलम भी गिरफ्तार हो सकती?
             क्या ये आयत बंदिशे हर बार हो सकती?
             क्या तुम्हें लगता नहीं कि ये भी पहरे खत्म हों?
             क्या अमन के वास्ते ये सख्त चेहरे नरम हो ?
             सोचना होगा हमी को हम-वतन के वास्ते
             हम कलम के साथ हो ले हर चमन के वास्ते 
             हाथों में थामों कलम के साथ भी आना जरूरी है
            अन्यथा सर ही कलम होंगें कलम के वास्ते 
             दफन होगें सभी सपने ,न रहेंगे हम ,न होंगे आपके अपने
             इसलिए भी …..अब हमें चलना ही होगा
             कलम लेकर कैमरों के सामने 
             हाथों में थामे हुए अखबार अपने ।

             वतन केवल सरहदों से ही नहीं बनता वतन केवल ओहदों से भी नहीं चलता 
            वतन केवल शाँति से महफूज रहता है वतन केवल 'वतन'  रहने से नहीं चलता
            हम वतन हैं एक प्याले हम निवाले हैं वतन केवल यही कहने से नहीं चलता 
            वतन पर्वत पेड़ नदियां और न ही सरहद वतन दिल से ही दिलो को जोड़ने का बल
            वतन ताकत ही नहीं है प्रेम भी तो है वतन दुःख सुख मे कुशल क्षेम भी तो है
                                       💐2💐
          वतन हम सबका हम ही तो वतन हैं वतन मे अमनो अमन यही तो जतन है
           वतन एक जीवित सदी ,गहरा समुंदर ही वतन ही गुरूद्वार  गिरजा, मस्जिद मंदिर है
           वतन के ही लिए तो तहजीब के  शानी वतन के हर रास्ते,  तजबीज के मानी 
           वतन कागज भर नहीं है आशियाँ है वतन ही तो हम सभी की शिराएँ है
           वतन की अपनी कहानी है वतन की अपनी रवानी है
           वतन केवल ढाई आखर है वतन के भी बड़े मानी है
          वतन एक आकाश सपनों का  वतन एक आभास अपनो का
          वतन सांसे हैं जवानी है  वतन के हर लफ्ज वाणी है
          वतन होगा तो हमारे हम और अपने हैं  वतन से साकार होंगें सपन सबके है
           इसलिए तो …. अब हमें चलना ही होगा कलम लेकर कैमरों के सामने 
          हाथों में थामे हुए अखबार अपने तभी पूरे हो सकेंगे सबके सपने
          वरन् हम होगें कलम सर भी हमारे ही वेवतन उजड़े वतन मे, घर हमारे ही
          अब हमें चलना ही होगा ,अब हमें चलना ही होगा  अब हमें चलना ही होगा।

                                                            
                                                                            ( कमलेश कुमार दीवान)
                                                                                      23/2/2021
      लोकतंत्र ,नागरिकों ,स्वतंत्र लेखक, अखबार और संचार सूचना माध्यमों मे
      कार्यरत सभी  भाई बहनों को मेरी यह रचना सादर समर्पित है ।धन्यवाद


गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

फल

 फल

साख ने छोड़ा है अपने आप तो नहीं टूटा 

हम कहाँ चाहते थे,आसमाँ से जमीं पर गिरना 

आँधियों मे रहा साथ,थपेड़ों को सहा मैने भी

कलीं ने फूलों को हर वक्त धकेला कितना

सरक चला था कच्चा था अधपका सा मै

जमीं के पास फिर किसी ने छोड़ा भी 

किसी ने छील दिया और कोई निचोड़ता हैं

किसी ने बचा रखा और कई ने फोड़ा भी

शुरू कहाँ से हुआ था फिर ऊगना मेरा

वहां रहा होगा पानी हवा जमीन का डेरा

आज फिर बीज मे तब्दील किया है मुझको

मै आऊंगा ऊगकर फिर मिलूंगा तुझको 

जहां से छूटा था मेरी नाव से तेरा दरिया 

कैसे आ जाता है उगने का मेरा जरिया 

एक छोटे बीज से पौधा बना फिर पेड़ हुआ

फल बना पका फिर से साख ने धकियाया बहुत

मै कहाँ जाता मिट्टी थी आसमाँ था ऊगाया उसने 

फिर खिला फूल बना फल और पकाया उसने

साख ने छोड़ा या आँधी के थपेड़ों से गिरा

कितना चाहा था उसी साख से हिलगा रहना 

पर नहीं चाहती थी साख पत्ता पत्ता भी 

वहां होना और उसी डाली को जकड़े रहना

अब तो हर वक्त तोड़ा झिंझोड़ा जाता हूँ 

साख से फिर भी छोड़ा जाता हूँ 

कोई फोड़ा करें निचौड़ा करें 

फल हूँ अपने साथ ही एक पेड़ ले के आता हूँ।

कमलेश कुमार दीवान

8/12/2020

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

अधबुने जाले

 अधबुने जाले 

मकड़ियों के 

लग रहे हैं 

अधबुने जाले 

पर यहाँ की 

लकड़ियाँ सुलगी हुई क्यों है? 

जंगलों  की आग ने 

फूँके वनो के वन 

दाग है चहुँ ओर देखो 

अपने अपने मन  ।


हम वतन के वास्ते 

क्या क्या करे 

क्या कुछ न हो 

आज के इस तंत्र मे 

ऐसा कहाँ है 

भर गया है 

सभी कूछ के साथ 

सामान सारा 

देखिये अपना कहाँ है 

आसमान प्यारा 

खिड़कियो से 

लग रहे हैं

महल दुशाले .

मकड़ियों के 

लग रहे है

अध बुने जाले । 


कमलेश कुमार दीवान 

लेखक 

14/04/2015


शनिवार, 5 दिसंबर 2020

ओ मेरे देश की मिट्टी...

ओ मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
खेत मे ऊगती पक गई फसलों को आते ही
निगल जाते हैं बाजार
सूने रहते हैं खलिहान पायगा और मकान
सूझता कुछ भी नहीं आदमी हैं या फिर है दुकान
उठते सोते हुए खोए हुए रहते हैं उदास
हम भी क्या पाते हैं खोने का लगा पाते हिसाब
अब न गोधूलि है न भोर की ललनाई हैं
न वो परिंदे न पेड़ रात का कलरव ही रहा
ओ मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
दे चुका हूँ मै अपने गांव ,चैन रात के सपने
अब भी बलिदान दे रहे हैं वही मेरे अपने
अब खबर बनती है एक रोज की ताजा तस्वीर
पर बदलते नहीं हालात दास्तां तकरीर
हम सियासत के स्याह हर्फ सफो से हैं क्यों
पन्नो पन्नों पर नाम उनके और उनकी तकदीर
हम तो लहरा रहे हैं तिरंगा जय हिंद के साथ
सोचते हैं कि बदल जाएंगे किस्से और किताब
ओर मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
अब न मेरे पास रहे अपने ही हिस्से के जबाब
अपने घर द्वार और परिवार दे चुका हूँ तुझे
घर आँगन और तुलसी पे रह गया है न हक भी मुझे
अपने सब यार और जज्बात दे चुका हूँ तुझे
ओ मेरे देश की मिट्टी में और क्या क्या दूँ तुझे

कमलेश कुमार दीवान
2/12/2020

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

सांझ आई है

 सांझ आई है

                               * कमलेश कुमार दीवान


सांझ आई है अब आएगी नहीं रातों में नींद

शेष यादों के सफर खुरापात करें सुबह तलक

कभी आती है पिता की यादें,ठहर से जाते हैं मां के जज्बात

रूठते झगड़ते हुए भाई बहनों  के साथ 

भूली भी नहीं जाती है गांव गलियों की बरसात 

 अपनों के खेत ,चारागाह ,नदी,पोखर तालाब

शीत रातें और दालानों में जलते थे आलाव 

न मस्जिद थी,न मंदिर थे,न ही गिरजाघर

फिर भी घरों घर बाँची जाती थी किताब

जलते थे चूल्हे सिकती थी रोटियां सबकी

हम सही होते थे सुरक्षित थी बेटियां सबकी


आज हालात बदलते देखे ,लोग मुंह फेरकर चलते देखे

लोक में मत भिन्न थे  सैलाव भी पलते देखे

दिन निकल जायेगा अच्छे से भोर होने के बाद

रात सरेराह झगडो में उलझते देखे 

कहां सुकूं हैं अरमान स्वप्न सारे जहां 

सबने शव द्फ़्न और जलते देखे

बंद हो जाए रहनुमांई अब

बनती बारूद गोलियां और बम

बदल जाएगी दुनिया सारी 

और थोडा सुकून पाएंगे हम

न वोट मांगें न हुंजूमों की तरफदारी हो

किसी से दुश्मनी न हो सभी से यारी हो 

चलो बनाएं एक देश ऐसा भी हम

जहाँ की सुबह और शाम रात प्यारी हो

सभी हों पर किसी का नाम न हो

प्रार्थनाओं में  उठे  सभी के हाथ न दुश्वारी हो

सांझ आये तो आये सुकून, नींद और ख्वाब 

शेष यांदो के सफ़र सुबह तक जारी ही रहे ।


कमलेश कुमार दीवान 

28‍/11/2020









गुरुवार, 19 नवंबर 2020

मेरे शहर के लोग.... गजल

 रहते नहीं उदास हैं ,मेरे शहर के लोग

रखते बहुत लिहाज हैं ,मेरे शहर के लोग

अपने लिवास ,बातचीत ,आतिथ्य मे मधुर
हर शख्स लाजबाब है मेरे शहर के लोग।
मंदिर है, मस्जिदें हैं गुरूद्वारे प्रार्थना घर,
हर धर्म की किताब हैं, मेरे शहर के लोग।
कोई समझ सके तो चले साथ हमारे
एक पालदार नाव है, मेरे शहर के लोग
गर्मी में शीतल छाँव है, बरसात में छाता
सर्दी में एक अलाव है मेरे शहर के लोग।
जीवन के साथ बहुत सी कठिनाईयां भी हैं
फिर भी हैं खुशमिजाज, मेरे शहर के लोग।
कमलेश कुमार दीवान
16/9/2020
होशंगाबाद म.प्र. भारत

बुधवार, 4 नवंबर 2020

चाँद कहता रहा

 चाँद कहता रहा


चाँद कहता रहा रात भर रात से 

यूँ ही चलता रहा हूँ बिना बात के 

रात में ,रात भर, कई रात से 

इन सितारों की नजरें 

जमीं पर भी रही है

रात मे रात से रात भर ।

अभी भी बहुत बची है कहानी मेरी 

मै चला था कहाँ से कहाँ आ गया 

किसी बात से रात मे रात से ।

तुम सुनोगो नहीं पर कहा तो यही

मेरे जज्बात पर कह उठा है आसमां

तुम्हे कायनात पार करना है अभी

 तुम चलो चलते ही रहो 

रात मे रात भर रात से बिना बात के

चाँद कहता रहा अँधेरो से उजियार से 

मै थका हूँ कहाँ 

रात भर रात से बिना बात के 

चाँद कहता रहा 

रात भर रात से 


कमलेश कूमार दीवान

5/2/17


 

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

हौंसलों के आसमान

 "हौंसलों के आसमान"


चिड़ियौ के पास क्या है 

चिड़ियों के पास जो कुछ भी है

वह पंख हैं,हौंसलें हैं

नदियाँ पर्वत,बहुत उँचाई वाले

 आसमान छूते पेड़

तालाब सागर वर्फ 

उड़ान भरने और गंतव्य पर

पहुँचने के हर्ष 

घौंसलों मे राह देखते बच्चे जब

धकियाते है परस्पर 

तब भी चोंच से चुग्गा गिरता नहीं है 

खुश रहती है चिड़िया 

जो चिड़ियौ के पास है वह बेटियौ के पास कहाँ?

उनके हिस्से आते हैं 

उजड़े हुये नीड़

कटकर उड़ती पतंगें

माँ के सपने और पिता के जज्बात्

भाई के लिये समर्पण और

 अपनो के लिये अर्पण

पंख ,हौंसले ,उड़ान और आसमान 

बेटियों के पास कहाँ हैं 

उनका सब कुछ रोजनामचे मे दफन है 

आजादी,लोकतंत्र और तिरंगा 

यही उनका .......नमन है ,जय हिंद 


*रोजनामचा ...पुलिस का रजिष्टर 


कमलेश कुमार दीवान 

3/10/2020