💐💐यार किससे कहे💐💐
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शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
यार किससे कहें.... ग़ज़ल
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026
दरिया -2
दरिया या नदी की हालातों पर हम अनेक तरह से अपनी बात कह सकते हैं अर्ज़ किया है कि....
*दरिया -2
कमलेश कुमार दीवान
अपनी ही रवानी से अनजान है दरिया
झरनो की मेहरबानी से पशेमान है दरिया
जाना था बहुत दूर समुंदर की तरफ ही
साहिल है निगहबानी से परेशान है दरिया
धारा भी थक गई है रूक रूक के बह रहा
थमने की इस कहानी से बेजान है दरिया
आया था पहाड़ों से बड़ी धार में लेकिन
फिर किसकी निगरानी से हैरान है दरिया
लहरें हवा से आज क्यों ऊंची उठे 'दीवान '
पानी तो निशानी भी तेरी पहचान हैं दरिया
कमलेश कुमार दीवान
19/3/25
#दरिया
@सर्वाधिकारसुरक्षित
सोमवार, 9 फ़रवरी 2026
दरिया.... ग़ज़ल
दरिया
कमलेश कुमार दीवान
यूं अपनी ही रवानी से अनजान है दरिया
इस उसकी मेहरबानी से पशेमान है दरिया
जाना था अभी उसको समुंदर की तरफ ही
घाटी की बेईमानी से बहुत परेशान है दरिया
कभी कम तो तेज अब थमा सा ही रह गया
अपनी ही इस कहानी से कुछ हैरान है दरिया
पहाड़ों से सरकते आ रहा एक सैलाब सा धीरे
अपनी ही निगहबानी से असमान हैं दरिया
लहरें हवा से आज भी क्यों उठ रही 'दीवान '
कुछ छोड़ निशानी से तेरी पहचान हैं दरिया
कमलेश कुमार दीवान
19/3/25
बुधवार, 24 दिसंबर 2025
आवाज से तेरी
बहुत दिनों के बाद बेटी की फोन पर आवाज सुनकर दिल को जो तसल्ली मिली वह इन शब्दों में बयां हुई है ....
आवाज से तेरी
कमलेश कुमार दीवान
कुछ तो सुकून मिलता है आवाज से तेरी
खुश होता आसमान भी परवाज़ से तेरी
कायनात सज गई है फिर यूं ही इस तरह
महफ़िल सितारों की भी सुर साज़ से तेरी
अपने लिए भी किसने यहां तान ये छेड़ी
सरगम सुनाई देती हैं साज़ बाज से तेरी
तूने झुकाया आसमां धरती पे इस तरह
मौसम है खुशगवार काम काज से तेरी
यूं ही किसे आवाज दे रहे हो तुम 'दीवान '
सब और हैं खुशियां भी अरबाज से तेरी
कमलेश कुमार दीवान
13/12/25
अरबाज =शक्ति, स्वतंत्रता,ऊंची उड़ान के गुणों का प्रतीक
सोमवार, 8 दिसंबर 2025
ख्वाब की ताबीर में... ग़ज़ल
ख्वाब की ताबीर में
कमलेश कुमार दीवान
अपने एक ख्बाव की ताबीर में ऐसा ही हुआ
चाहा था चांद को आफताब भी वैसा ही हुआ
धूप और छांव का कोई फ़र्क नहीं लगता है
दिन कायनात में भी चांदनी जैसा ही हुआ
हवाएं थी कि हम उसको पकड़ के चलते रहे
नदी में पांव रख्खे उड़ने का अंदेशा ही हुआ
फूल कांटों से चुभे झाड़ पेड़ आसमान में थे
खेत घर बार महकते थे ये सब कैसा ही हुआ
हम भी क्या क्या सोचते रहते हैं यहां 'दीवान'
पानी जला आग महक उठी तमाशा ही हुआ
कमलेश कुमार दीवान
7/11/25
अपने ही हैं बाजार में... ग़ज़ल
अपने ही हैं बाजार में
कमलेश कुमार 'दीवान'
अपने ही है बाजार में खरीददार भी अपने
बीमार भी अपने ही हैं तीमारदार भी अपने
सब कुछ बिखर गया कुछ भी तो नहीं रहा
ग़म दे रहे हैं अपने ही गमख्वार भी अपने
अपने लिबास देखते या फिर उनके पैराहन
तार तार भी अपने ही हैं गमगुसार भी अपने
अब कौन कहां किसके लिए जी रहे 'दीवान'
बेजार भी अपने हैं और जार जार भी अपने
कमलेश कुमार दीवान
5/12/25
1- गमख्वार =दुख दर्द में साथ देने वाला , दुःख दर्द बांटने वाला, सहानुभूति रखने वाला, सहिष्णु, सहनशील
1-तार तार =बिखर जाना, टुकड़े टुकड़े हो जाना, छवि का पूरी तरह धूमिल हो जाना
3-गम गुसार =हमदर्द,दुख दर्द बांटने वाला, दिलासा देने वाला
4-बेजार=ऊब जाना,तंग आ जाना, विमुख, नाखुश, अप्रसन्न,खिन्न
5-जार जार=फूट फूटकर रोना, अत्य
धिक दुखी होना
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025
रास्ते..... कमलेश कुमार दीवान
रास्ते
कमलेश कुमार दीवान
ये रास्ते अच्छे लगे पर सच्चे नहीं लगते
क्षितिज से आसमां तक देखते जाओ
धरा की आश है सब ओर मिलता छोर
पर ये सब ही स्वप्न है, सच्चे नहीं लगते ।
ये रास्ते......
किनारों से सटी रहकर सरकती जा रही नदियां
किसी की कोख भरती और फिर खाली करती हैं
यूं ही संघर्ष से नरसंहार में मरती जा रही सदियां
किसे फिर याद होगा जी रहे हैं लोग मर मर कर
किसी के वास्ते से वो सब ही हैं अच्छे लगे हैं
पर ये सब कभी सच्चे नहीं लगते।
ये रास्ते.....
बुनियाद में कुछ झूठ हो थोड़ा फरेब भी
फिर तमाशे भी वही निभने-निबाहने के
वायदे हो कसम भी साथ आने के
कभी इन वास्तों को देख लो अनुभव करो
क्या ये वास्ते कच्चे बहुत कच्चे नहीं होते ?
जो रास्ते सुखकर लगे वो रास्ते अच्छे नहीं होते
ये रास्ते.......
कमलेश कुमार दीवान
18/8/25
नर्मदा पुरम मध्यप्रदेश
461001
रविवार, 7 सितंबर 2025
सबा न थी .... गज़ल कमलेश कुमार 'दीवान''
सबा न थी --गजल
कमलेश कुमार दीवान
हम जिस हवा के साथ थे वो तो सबा न थी
वो गुलिस्तां में थी मगर बाद ए सबा न थी
कैसे जले चिराग़ ये सब, तूफान आए तब
कोई मेहरबां न थी वो कोई हम नवा न थी
माजी से थक गया हूं अब मौसम भी नहीं है
चाहत थी गुल खिले वहां रूह ए रवा न थी
दरिया में था महताब तब दिल में अलाव सा
बागों में तितलियां तो थी आब ओ हवा न थी
किसने छुपाया कौन सा वो राज फिर 'दीवान '
चलता रहा वो रात भर कोह ए फिजा न थी
कमलेश कुमार दीवान
15/4/25
बुधवार, 3 सितंबर 2025
इंसान ने किया.....गजल
इंसान ने किया -गजल
कमलेश कुमार दीवान
कुछ हवा ने किया कुछ तूफान ने किया
आंधी का काम भी यहां इंसान ने किया
बादल के फूट पड़ने से खिसके पहाड़ भी
बाकी बचा ही क्या सब आसमान ने किया
बहुतेरी सड़क बन गई जंगल के बीच से
रूठे हैं पेड़ पौधे ये क्या अनजान ने किया
कुछ तो कुसूर अपना कुछ जरूरतों का था
सब ढह गया है जो यहां नादान ने किया
क्या क्या गिनाए दुःख यहां घाटी पहाड़ के
'दीवान 'इस जहां में सब पहचान ने किया
'कमलेश कुमार दीवान'
26/8/25
सोमवार, 28 जुलाई 2025
फूल और बेटियां
फूल और बेटियां
कमलेश कुमार दीवान
जब जब घर के गमले में गुलाब खिलते हैं
बेटियां याद आती है
जो पढ़ने गई है विदेश में नौकरी पर हैं देश में
और जो ब्याह दी गई बहुत दूर
ये फूल क्यों खिलते हैं घर के गमले में याद दिलाने
बेटियों के संघर्ष जद्दोजहद आद्योपांत
भीड़ भरी सड़कें,कोलाहल दफ्तर
छोटे छोटे कमरों वाली दड़बे नुमा हास्टल
क्यों इन कांटों में ही खिल उठते हैं गुलाब
जो याद दिला जाते हैं बेटियों की
उनके संघर्ष अपने से कष्ट चुभते हैं कांटो की तरह
बस खुशियां ही थोड़ी कम लगती है
गुलाब तुम गमलों में मत खिलो ऐसे
जिनमें बेटियां दिखे गुलाब सी
बेटियां और फूल एक से ही हैं
खिलते हैं तो खुशियां बिखेरते हैं
और मुरझाते है तब........?
कमलेश कुमार दीवान
26/7/25
सोमवार, 14 जुलाई 2025
रहें हैं लोग.... ग़ज़ल कमलेश कुमार दीवान
रहे हैं लोग ... ग़ज़ल
कमलेश कुमार दीवान
जिन सीढ़ियों से चढ़ते उतरते रहे हैं लोग
उन्ही सीढ़ियों से लुढ़कते गिरते रहे हैं लोग
सुनते रहे हैं ज़श्न मनाने की तालियां सभी
नीचे गिरे तो गिर के सिहरते रहें हैं लोग
खुशियों से भरें दिखते हैं दुःख भोगते हुए
खुद को ही भूलकर यूं उबरते रहें हैं लोग
ऊंचाई पर भी और भी उठने की हसरतें
घायल हुए हैं ज़ख्म को भरते रहें हैं लोग
कुछ देर और देखो तमाशा भी ये 'दीवान'
चलने से ज्यादा अब तो ठहरते रहे हैं लोग
कमलेश कुमार दीवान
5/3/25
रविवार, 8 जून 2025
जला है दीया
*जला है दिया *
कमलेश कुमार दीवान
कभी हवाओं से तो कभी तूफान से जला है दीया
कि बुझाने वालों के ही अभिमान से जला है दीया
मिटाने आई है कितनी ही बार हस्तियां फिर भी
बार बार हर मक़ाम उसी शान से जला है दीया
बहुत उजाला था बस्ती में कहीं अंधेरा ही न था
दिखाएं ऐसे नजारे बड़े अरमान से जला है दीया
समय की धार तेज है उस भंवर में घूमते 'दीवान'
सच है कि बार बार अपने ईमान से जला है दीया
कमलेश कुमार दीवान
12/4/25
मंगलवार, 22 अप्रैल 2025
एक खिलौना हो जाए
दुनिया एक खिलौना हो जाए
कमलेश कुमार दीवान
सोच रहे हैं यह दुनिया भी एक खिलौना हो जाए
बदला बदला आसमान हो जो भी होना हो जाए
चांद सितारे ग्रह उपग्रह यूं मुट्ठी में कर ले सबको
पुच्छल तारें बैठ फिरें हम जो भी होना हो जाए
देखें पुंज पुंज को छूकर कैसे बन मिट सिमट रहे
ब्लैक होल में घूमे हम भी जो भी होना हो जाए
निहारिकाएं छुए टटोले टुकड़े टुकड़े फिर जोड़ें
सूरज पर अपना डेरा हो जो भी होना हो जाए
सब कुछ छोड़ हवा को ढूंढें प्यास बुझाने पानी
धरती जैसी और ज़मीं हो जो भी होना हो जाए
कैसे कैसे ख्बाव हमारे ख्यालों में खोये 'दीवान'
हम भी चले हवाओं जैसे जो भी होना हो जाए
कमलेश कुमार दीवान
2/1/25
सोमवार, 7 अप्रैल 2025
राम जी
।।राम जी ।।
कमलेश कुमार दीवान
अच्छे बुरे हैं सबका ध्यान रखते हैं राम जी
पहचानते हैं सबका मान रखते हैं राम जी
वे राज में है काज में और समाज में भी हैं
वो जानते हैं सबकी शान रखते हैं राम जी
रोटी गरीब को मिले खुशियां भी बढ़े बहुत
सही ओ ग़लत की पहचान रखते हैं राम जी
कैसे बताएं वे बसते सभी के दिल दिमाग में
वन में जटायु का एहसान रखते हैं राम जी
क्या क्या बताएं और भी महिमा है राम की
'दीवान' सबमें जान प्राण रखते हैं राम जी
कमलेश कुमार दीवान
6/4/25
बुधवार, 12 मार्च 2025
लुत्फ़
कभी कभी हम कुछ लिखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की जल्दबाजी में शब्दों के प्रभाव को नजरंदाज कर देते हैं परन्तु जो शब्द होते हैं वे भी नाद करते हैं नृतन करते हुए हमे आलोड़ित करते जाते हैं ऐसा ही एक शब्द है लुत्फ़ जिसका आशय आनंद से है हमारे विचार ये है....
*लुत्फ़"
अब लुफ़्त जिंदगी के भी उठाए नहीं जाते
गाने हंसी खुशी के भी तो गाए नहीं जाते
दुनिया का ये माहौल भी जुदा जुदा सा है
मौसम जो आएं अब वे आ के नहीं जाते
कमलेश कुमार दीवान
12/3/25
#लुत्फ़_मौसम_खुशी
शुक्रवार, 17 जनवरी 2025
ख्यालों से चलों.... कमलेश कुमार दीवान
ख्यालों से चलों
कमलेश कुमार दीवान
तुम कहीं दूर बहुत,अपने ख्यालों से चलों
गम के सायों से चलों अपने सवालों से चलों
ये दुनिया भी एक ताबीज की मानिंद ही है
अपने जज्बात और आते उजालों से चलों
बहुत कुछ पाया है हमने भी इसी दुनिया से
अपनी फितरत है सहो पांव के छालों से चलों
मैं नहीं,वो नहीं ये कौन है जो थम सा गया
तुम चलो हम भी चलें उनके हवालों से चलों
दुनिया वाले भी ऐसे ही रोकते रहते 'दीवान '
उठाओ तेज कदम अपनी ही चालों से चलों
कमलेश कुमार दीवान
17/1/25
शुक्रवार, 27 सितंबर 2024
कैसे कौन कहे .... कमलेश कुमार दीवान
* कैसे कौन कहे *
कमलेश कुमार दीवान
बीते दिन की मीठी बातें
कैसे कौन कहे ।
इस उस किस किससे मुलाकातें
कैसे कौन कहे ।
दिन तपते हैं दुपहर भारी
शाम सुनहरी रातें कारी
उमस भरी सांसे लगती है
बादर और वर्षा बाजारी
यहां अधिक जल और
वहां कहीं पर बूंदाबांदी
मन भाए ललचाए ऐसे
एक बड़ी सौगात लगती हैं
दिन बीते रूठी सी रातें
कौन बताए कैसे मौन सहे
कैसे कौन कहे ।
मौसम की क्या बात कहें हम
कुछ ठंडा कुछ ताप सहे हम
पावस गई शरद आईं है
किस ऋतु की क्या माप कहें हम
बदला समय बिताना मुश्किल
कैसे कौन सहे।
कमलेश कुमार दीवान
21/09/24
नर्मदा पुरम मध्यप्रदेश भारत वर्ष
461001
गुरुवार, 5 सितंबर 2024
पाठशालाएं.... कमलेश कुमार दीवान शिक्षक दिवस पर विशेष नज़्म
शिक्षक दिवस 2024 पर विशेष
*उनींदी पाठशालाएं * हिंदी नज़्म
कमलेश कुमार दीवान
बच्चों अपने आप को देखों निहारों पाठशालाएं
तुम्हारी जिंदगी थी और हजारों स्वप्न शालाएं
अपनी सी दर ओ दीवार काले पर सफेद चाक
लिखे सब किलम से और किए स्लेट में साफ़
सफेद झक कुर्ते धोती पहने गुरूदेव शाला में
सजे है मेज़ और एक तस्वीर पर फूल मालाएं
वीणा वादनी मां सरस्वती होती थी किताबों में
नदी पर्वत की पावनता पढ़ते थे दो-आबो में
उत्तर में पहरी हिमालय आज़ भी है ,बहुत ऊंचा
पावन नदी गंगा जिसने सभ्यताओं को बहुत सींचा
बच्चों अब भी वही तस्वीर तख्ता चाक डस्टर है
बदलती जा रही है जिंदगी, लगाए जैसे अस्तर हैं
घंटी हैं मगर चुपचाप से बच्चे हैं और स्थूल शालाएं
न वो बातें, न वो मंजर ,न वो फोटो ,न मालाएं
सभी के साथ भी तो है सभी को याद भी तो है
अपने आप को देखों निहारों उनींदी पाठशालाएं
कमलेश कुमार दीवान
1/9/24
नर्मदा पुरम मध्यप्रदेश भारत वर्ष
461001
शनिवार, 24 अगस्त 2024
Daughters..... kamlesh Kumar Diwan
"Daughters"
Kamlesh Kumar Diwan
Give me that vision with which I can see today's world
What I saw yesterday is past, now when I see it, I am afraid
Hold your fingers tightly and clench your fists again
Get up above everything, don't believe what I say
Now it has become difficult to tolerate even the last breath
The world is standing to cut off my courage, it is very narrow-minded
Look and understand the color of the well-formed skies
May these dreams and emotions be fulfilled, there is also a lot of desires
Where is that world where the dawn, the sun, the dew are pearls
The winds are slow and the chirping of birds is also there
The river moves forward humming something
The creeper grows on the earth, the vine clings to the branches and climbs the trees
Every branch is full of flowers and fruit-laden branches You are bent down
I look at the fields as if the crops are singing songs
When I look at the houses, I feel that these generations will remain for centuries
There are people dancing and celebrating the beats of drums
Today this business has turned the world into a market
Here every man lives, and lives more by dying
Kamlesh Kumar Diwan
19/8/24
My poem hindi "Betiyan" translate by Google
बेटियों..... एक नज़्म कमलेश कुमार दीवान
" बेटियों "....... नज़्म
कमलेश कुमार दीवान
मुझे वो दृष्टि दो जिससे निहारूं आज़ की दुनिया
जो कल देखा वो गुजरा है,अब देखा तो एक डर सा है
कसकर उंगलियां थामो भींचकर फिर मुट्ठियों तानो
उठो सब बातों से उपर जो कहता हूं वह न मानो
भरती सांस भी बर्दाश्त करना अब हुआ मुश्किल
हौंसले पर कतरने को खड़ी दुनियां बहुत तंगदिल
निहारों और रंग समझो बने- ठने आसमानों का
पूरे हों जज़्बात ये सपने ढेर भी तो है अरमानों का
वो सृष्टि है कहां जहां की भोर सूरज ओस मोती हों
हवाएं मंद और चहचहाहट पंछियों की भी होती हों
नदी कल कल करें कुछ गुनगुनाती आगे बढ़ती हो
धरती पर उगी लता बेले लिपट शाखें पेड़ चढ़ती हों
खिले हों फूल हर डाली फल लदी डालें झुकी सी हो
निहारूं खेत फिर वैसे कि जैसे गीत गातीं हों फसलें
घरों को देखूं तो लगे कि सदी तक रहेंगी यही नस्लें
ढोल थापों पे थिरकते नाचते खुशियां मनाते लोग भी तो हैं
आज़ इस व्यापार ने दुनिया को बाजार में तब्दील किया है
यहां हर आदमी जीता है,और ज्यादा मर मर के जिया है
कमलेश कुमार दीवान
19/8/24
रविवार, 24 मार्च 2024
फागुन गीत
फागुन में कोई गीत नहीं....
" कमलेश कुमार दीवान"
फागुन में कोई गीत नहीं गाए जाते ओ मन
कुछ देर और ठहरों आंगन
विचलित सा है यह जन जीवन
बिफरा बिफरा सा है यह मन
अब 'वो' ही नहीं आते भाते
कोई प्रीति नहीं,न भरमाते
इस गुन के कोई मीत नहीं पाए जाते ओ मन।
फागुन में कोई गीत नहीं गाए जाते ओ मन ।
क्यों हैं रंगों से सराबोर
विस्मृत से कण कण है विभोर
हम विस्मित हैं कैसी ये भोर
मन हो म्यूर नाचे, ले हिलोर
कुछ गुन गुन में इस रून झुन में
कुछ और देर पसरो पाहुन
कोई रीत नहीं अपनाई है,आते जाते ओ मन ।
फागुन में कोई गीत नहीं गाए जाते ओ मन।।
वो=प्रियतम
कमलेश कुमार दीवान
17/3/24
"
सोमवार, 26 फ़रवरी 2024
तुमको क्या मालुम ....गजल ---कमलेश कुमार दीवान
तुमको क्या मालुम
मां ने कितने कष्ट सहे हैं तुमको क्या मालुम
हम सब हष्ट-पुष्ट रहे हैं, तुमको क्या मालुम
खूब सताते थे सब बच्चे और था पूरा परिवार
जाने कितने सुनें ठोंसरे, तुमको क्या मालुम
सासू की भी सासू मां और पिताजी दादा जी के
कदम कदम पर पाए ताने तुमको क्या मालुम
सुबह शाम आरती बंदन ,मिन्नत में बीते सब वर्ष
जाने क्या क्या करी दुआएं, तुमको क्या मालुम
बगिया के हम फूल महक मां के जीवन से है
सींच सींच आंसू पल पल से, तुमको क्या मालुम
बुरी नज़र में झाड़ फूंक से पाला पोषा है 'दीवान'
रोज सुलाने लोरी गाई गीत सुनाएं, तुमको क्या मालुम
कमलेश कुमार दीवान
4/1/24
ठोंसरे=तंज़ कटाक्ष
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गुरुवार, 31 अगस्त 2023
सावन आएं रे ..….. गीत बंदिश
सावन आएं रे
बादर बिजुरी और हवाएं
घिर आए घनघोर घटाएं
घन बरसाएं,मन भरमाएं रे
सावन आएं रे।
सरवन के कच्चे धागों से
बहना करे श्रृंगार भाई का
जग जाने भारत की संस्कृति
मूल्य जाने बहना कलाई का
मन हर्षाएं सब मन भाए रे
सावन आएं रे।
कमलेश कुमार दीवान
@kamleskumardiwan
24/8/2010
शनिवार, 26 अगस्त 2023
जेहन में ध्वज तिरंगा है
" ध्वज तिरंगा है"
*कमलेश कुमार दीवान*
हमारा मान आजादी ,जेहन में ध्वज तिरंगा है
हमारा देश भारत है,आज़ाद हर एक एक परिंदा है
वतन गणतंत्र,संविधान संसद ,और जनतंत्र जिंदा है
यहां सम्मान है मेरे वतन घर घर जेहन में ध्वज तिरंगा है
जो बर्बर थे वे खुद लुटे ,मिट गए कुछ तानाशाही में
बची है राजशाही तब वहां जन अधिकार देने से
यही एक देश है संस्कृति जहां की विविध रंगों की
अलग है खान पान, रहन सहन, पहनावा विविध ढंगों की
विविधताओं की यहां पहचान और इंसानियत भी है
अमन हो भाईचारे की मुक्कमल बानगी सी है
हमारा गान है जनतंत्र, यही अरमान सबका हो
तिरंगा एक हो,यह मंत्र, और अभियान सबका हो
बंटे क्यों जातियों में हम, रहे क्यों हाशियों में हम
यही संघर्ष, आजादी ही हम सबकी विरासत है
किसी की बांट की खातिर बंटे क्यों वादियों में हम
यहां गंगा है जमुना भी नर्मदा गोदावरी कृष्णा कावेरी
पूरव घाट पश्चिम श्रृंखला सतपुड़ा विंध्य और अरावली
उत्तर में हिमालय सी ऊंचाई ,पूरव पहाड़ी सात बहनों सी
कहानी भर नहीं है आजादी के लिए बलिदान देने की
हमारी शान भारतवर्ष, घर, जेहन में ध्वज तिरंगा है
यही सम्मान घर घर वतन और ज़ेहन में तिरंगा है
कमलेश कुमार दीवान
15/8/23
सोमवार, 17 जुलाई 2023
कोई तो है जो
कतरा कतरा कोई तो है जो अंदर अंदर रहता है
थोड़ा- थोड़ा दर्द ही होगा , रफ्ता रफ्ता कहता है
दरिया सी ही पहुंच रही है ,पीढ़ाएं पानी पानी
जो भीतर है बाहर होकर हफ़्ता हफ्ता बहता है
देखा भी क्या वो एक समुंदर दूर दूर तक फैला है
ये एहसास हुआ है दिल में रस्ता रस्ता रहता है
चुप चुप बहुत पुकार रहे हैं लफ्ज़ लफ्ज़ धीरे धीरे
दिल की कलम रोशनाई से दस्ता दस्ता सहता है
भाग रही क्यों हवा बादलों को ले लेकर धरती पर
कहां कहां भीगा है मन भी , वस्ता- वस्ता रहता है
कमलेश कुमार दीवान
11/1/22
वस्ता=दीप्त होने वाला , चमकने वाला /दस्ता=कागज़ की गड्डी
मंगलवार, 11 जुलाई 2023
बाकी सब ठीक है
"बाकी सब ठीक है"
*कमलेश कुमार दीवान
मैं हमेशा गलती ही करता हूं
उनके साथ प्यार में दुलार में स्नेह के संसार में
सबके साथ व्यवहार में,स्वीकार में, इंकार में
हमेशा गलती ही करता हूं बस ग़लती ही करता हूं
और गलते जाता हूं हमेशा मैं ही
बाकी सब ठीक है।
मैं तनाव से टूटता भी हूं,सपनों से रूठता भी हूं
संकल्प लेता हूं, शपथ खाता हूं
कि अब त्रुटियां न हो ,गलतियों से बचा रहूं
फिर फिर त्रुटियां, गलतियां करता ही हूं
अपनों के लिए ,जो अपने नहीं रहते
सपनों के लिए जो सपने हीं रहते हैं
मनाने, महसूस करने और देखते रहे उन्हें,
जो कभी मेरे थे मुझसे ही थे
गलतियां तो आदत हो गई है आज भी गलतियां करता हूं
गलतफहमियां पालता हूं ,चुकाता जाता हूं उनका मूल्य
प्यार में, दुलार में, व्यवहार में दो
स्वीकार और इंकार के संसार में
पैसों से, समय से और विचार से
गलतियां करता हूं गलतियों पर हूं
और गलत रहते हुए गलता जाता हूं
सोचता हूं गलत ही सही हूं
जीने के लिए गलतियां ही जरूरी है
बाकी सब ठीक ही है।
कमलेश कुमार दीवान (लेखक)
नर्मदा पुरम होशंगाबाद म.प्र.
29/11/22
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023
💐प्रेम में पगे रहना ....💐
💐प्रेम मे पगे रहना 💐
*कमलेश कुमार दीवान *
जब हम हमेशा ही प्रेम मे पगे रहते हैं तब
बिसार जाते हैं प्रेम को ही
प्रेम एक आभा है आलोक है
आभास भी तो है हमारे प्रेममय होने का
प्रेम मानवीय शाश्वत मूल्यों का आलोढ़न है
प्रेम अंकुरण है ,सृष्टिमय समष्टि का
प्रेम जीवन है और जीव के चुक जाने तक भी है
प्रेम प्रेम ही है पर प्रेम मे ही पगे रहना तो नहीं है प्रेम
जीवन भी तो नहीं है यह
फिर क्यों हम पगे रहते हैं प्रेम मे ही
और रह जाते हैं घृणाँओ के स्पर्श से अछूते
जैविक अजैविक सृष्टि मे
तैरकर ,रेंगकर,चलकर,उड़कर और
स्थिरता के साथ आसमान में पर्ण फैलाएँ
जमीन में जड़े धसाएँ और उनसें ही लिपटकर
पोषण पाती लताएँ बेले भी प्रेममय हैं
अर्थात सृष्टि के सभी मनोभावों को
महसूस करते रहना भी प्रेम ही है
प्रेम मे पगे रहना ही तो प्रेम नहीं है।
कमलेश कुमार दीवान
शुक्रवार, 13 जनवरी 2023
पतंग -3
💐पतंग💐
शनिवार, 7 जनवरी 2023
इन हवाओं से
इन हवाओं से नहीं बुझते होंगे वे चिराग़
जिनको तूफ़ानों के संग साथ जलाया होगा
जिसने दरिया को धकेला है समुंदर की तरफ़
लौट कर वो ही फिर बादलों में समाया होगा
हर दराजों से झिरा, नदियों से ओझल भी हुआ
आसमां छू छू के पहाड़ों पे फिर छाया होगा
तेज थी धूप वारिश भी तो बार बार हुई
हम तो निकले ही थे तुमने बुलाया होगा
अब फिजाओं से कोई पूछता ही कब है दीवान
जिनके आने से कोई साथ घर आया होगा
कमलेश कुमार दीवान
17/12/20
रविवार, 1 जनवरी 2023
A Gift of Dawn.........New year 2023
"A Gift of Dawn....New Year 2023
Kamlesh Kumar Diwan
May there be new year, may there be joy, may there be new happiness, may there be new prosperity
New dawn, new evening, new destination
New goals, new spirits, new directions
New moon, stars, weather, new vision, new book
The new river is the New boat ⛵
the New mood and the New dreams
New ways, new journey, meaning that you are looking for
Let this be the gift of the morning.
A Gift of Dawn .
Happy New year 🎉💐 2023
Kamlesh Kumar Diwan
शुक्रवार, 18 नवंबर 2022
उनके बयान..... ग़ज़ल
उनके बयान आएंगें.......
कमलेश कुमार दीवान
चुप होती शाम और ढहते मकाम आएंगे
ज़िंदगी जी है तो हर एक के नाम आएंगे
गमों के साए उदासियां, खुशी भी साथ रही
गुजर गए जो लम्हे,वो भी तमाम आएंगे
किसी का साथ कोई और भी सफ़र में रहा
रूठने वाले तो हैं, उनसे भी पयाम आएंगे
कभी किसी को कोई याद कहां रहता है
हर एक सोचता क्या फिर वो काम आएंगे
चलो उठो अब तुम भी ये न सोचो 'दीवान '
किया न याद कभी उनके भी बयान आएंगें
कमलेश कुमार दीवान
13/1/22
मंगलवार, 8 नवंबर 2022
अंधेरा है बहुत...... ग़ज़ल
अंधेरा है बहुत
एक दिया और जलाएं कि अंधेरा है बहुत
दिलों को ऐसे मनाएं कि अंधेरा है बहुत
उजाले क़ैद हैं तमाम उनकी बस्ती में
उन्हें हम कैसे छुड़ाएं कि अंधेरा है बहुत
दिखाई दे रही रंगीनियां फिजाओं में
सभी को कैसे बताएं कि अंधेरा है बहुत
उजड़ गई है बस्तियां लुट गए हैं जहां
गरीब कैसे बताएं कि अंधेरा है बहुत
अभी देखो इन अंधेरों को संभालों 'दीवान'
उजाले आएंगे थोड़े,कि अंधेरा है बहुत
कमलेश कुमार दीवान
23/10/22