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बुधवार, 15 सितंबर 2021

न जाने क्या जमीं का हो.....गजल

 बहुत मदहोश हैं बादल ,न जाने क्या जमीं का हो

हवा में ताप भी ज्यादा न जाने क्या जमीं का हो

सूरज से बरसती हो तपन ,धरा से आग उठती हो 

मौसम भी सितमगर है,न जाने क्या जमीं का हो 

सागर की सतह से बहुत ऊँची उठ रही लहरें 

तटों पर टूटती हैं तब ,न जाने क्या जमीं का हो

खिसकते बर्फ के हिस्से और ढहते शीर्ष पर्वत के 

नदी में आ रहा मलबा न जाने क्या जमीं का हो 

थिरकती सी हवाएँ दे रही तूफानों की आहट 

उठेंगे जब बबंडर तब ,न जाने क्या जमी का हो 

कमलेश कुमार दीवान

11/7/21

*यह रचना मौसम के वर्तमान हालत और जमीन पर उसके प्रभाव के संबंध में है 

बुधवार, 14 जुलाई 2021

निराश न हो .......एक गजल आशाओं के सृजन हेतु

 निराश न हो मेरे दोस्त ,हौंसला भी रख्खो 

आते हुये जाएंगें मौसम भी बदलते हैं

ये जो गर्दिश है ढल जायेगी सूरज की तरह 

इनआसुंओसे पत्थर भी पिघलते हैं 

ह्म है तो जमीं और सितारे फलक पे होंगे 

इस कायनात मे सब साथ साथ चलते हैं 

सब तो आशाओं मे ठ हरे हुए होंगे दीवान 

अपनी यादें हैं जिसके सिलसिले से चलते हैं 

कमलेश कुमार दीवान 

16/4/21

गुरुवार, 17 जून 2021

जो तुम चलो तो

     "जो तुम चलो तो"

                कमलेश कुमार दीवान

जो तुम चलो तो दुनियां भी चलेगी ऐसे

जैसे आकाश मे चाँद सितारे से चलें 

जो तुम चलो तो .........

रुके हैं आज अँधेरें हर एक मंजिल पर 

उजाले कैसे दिखेगें किसी भी तंगदिल पर 

असर भी चुक रहें हैँ खुट रही हैं आशाएँ

ये जो विश्वास है वह भी तो इशारों से चले ।

जो तुम चलो तो ........

बहुत हुई हैं मिन्नते अब आरजू भी नहीं 

ये जो राहों की सदाएँ हैं उसी छोर से हैं 

अब हवाएँ नहीं होती हैं कभी तूफान के साथ 

कराह उठे हैं सागर भी सभी ओर से हैं 

ये कायनात ही सभी कुछ संभालती हैं यहाँ 

सभी इंतजाम कर सूरज भी सबेरे  से चले  ।

जो तुम चलो तो .........


कमलेश कुमार दीवान 

10/5/21 

शुक्रवार, 28 मई 2021

"हम आसमां से कहे" ....गजल

           " ह्म आसमां से कहे "

                                कमलेश कुमार दीवान

हम आसमाँ से कहे ,अपनी बदल ले तस्वीर 

दो चार सूरज हों और चाँद हो दस॑ बीस

फलक पे तारे हों जो चल सके इशारों से 

जमी पे पेड़ हों तो सब ही हों पहाड़ो पर

कोई तो पासवाँ से कहे अपनी बदल ले तकरीर 

एक आध अपनी बात हो और किताब से दस बीस ।

हम आसमाँ से .......

हम हवाओं से कहे जब भी चले  धीरे वहें

रोक ले बादलो को  , जब कहे तब ही बरसें 

धरा से चाहे कि वो ही रहे सटकर हमसे

नदी को बाँध ले भरमाये न इनसे सागर 

आसमां हम ही हों तब सब ही बदल देंगें तकदीर 

एक आध अपने ठाँव हों खिताब हों दस बीस ।

हम आसमां से .......


कमलेश कुमार दीवान 

15/5/21 

सोमवार, 3 मई 2021

कुछ बाते .........एक गीत

                 "कुछ बाते "        

                               कमलेश कुमार दीवान 

कुछ बाते जो नई नई सी 

अच्छी लगती हैं

यादों के अथाह सागर मे 

डूब डूब जाता है जब मन

होती है बरसात बहुत और 

भीग भीग जाता है जब तन

फिर आती है जब कुछ राते 

छुई मुई सी कुछ सौगाते

नई नई सी सच्ची लगती है 

कुछ बाते .......

कुछ बाते जो बहुत पुरानी 

कही कही अनकही शेष हैं 

वो भी एक कहानी सी हैं 

यादें रची‌‌‌- बसी बचपन की

लगती अब गुड़ ‌‌‌‌- धानी सी है 

भर भर जाता है जब मन 

फिर भाती अच्छी सी बातें

कई कई तो कच्ची सी लगती हैं

कुछ बाते जो नई नई सी 

अच्छी लगती हैं 

कुछ सौगातें जो नई नई सी 

सच्ची लगती हैं 

कमलेश कुमार दीवान 

30/8/20

 




बुधवार, 28 अप्रैल 2021

"जरा संभल के चलो" ...गजल

                          " जरा संभल के चलो "

                                                            कमलेश कुमार दीवान 

बहुत खामोश हैं लम्हे उदास सुबह और शाम

क्या होगी रात भी ऐसी ,जरा संभल के चलो 

हुई हैं बंदिशे आयत खुले दरीचे भी कहां होगें 

किसी से बात हो कैसे ,जरा संभल के चलो 

अब हवाये बहुत धीमे से चल रही है यहां

उसी के साथ है तूफांं , जरा संभल के चलो 

हम भी पेड़ो से गिरे सूखे पत्तो की तरह 

हमारे पास ही आतिश, जरा संभल के चलो

अपने जेहन मे भी इतनी जगह रखो 'दीवान'

किसी से घात भी हो तो, जरा संभल के चलो

कमलेश कुमार दीवान 

26/4/2021 

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

बहुत उदास है शामें......गजल

 


💐उदास है शामें💐
बहुत उदास हैं शामें जरा ठहर के चलो
किसी का हाथ भी थामों जरा ठहर के चलो
यहां हैं बंदिशें बहुत न जाने और क्या क्या हो
रहेंगे कैद भी सूरज , जरा ठहर के चलो
हम आम हैं या खास होंगें कुछ पता ही नहीं
बताए जा रहे हैं क्या जरा ठहर के चलो
इन हवाओं ने हमें कब से छोड़ रख्खा है
कुछ एक देर सही पर जरा ठहर के चलो
अब आस्तीनों मे इतनी जगह कहाँ है 'दीवान'
समाए फिर कोई मंजर जरा ठहर के चलो


कमलेश कुमार दीवान
16/4/21









शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

लाकडाऊन की सुबह

            💐लाकडाऊन की सुबह💐

कितनी शांत नीरव और आने जाने की भाग दौड़ के लिए
तड़फ विहीन होती है आज जाना
शहरों से शोर गायब है, हिरा गया है भरापूरा पन
गांवो से भी किसी ने लील लिया है अपनापन
सड़कें सूनी सूनी सी हैं नदियां अकेली सी
पहाड़ ही यदाकदा सुलग उठते हैं यहां वहां
सब कुछ रिक्त सा है उदास है एक रूआँसा पन समाए हुए है
जैसे अभी अभी निकली हो धरती समुद्र से
एक युग डूबे रहने के बाद
थम गया है सभी कुछ अनायास बर्फ से जमे हुए घर
खिड़कियों से झाँकते बच्चे तक रहे हैं शून्य सुबह से
चिड़िया देख रहीं हैं कहीं तो होंगीं पड़ी हुई
चावल की टूटन कनकियाँ ,पानी का खप्पर मुँडेरों पर
गाए घूम रही हैं घरों घर रोटी मिलने की आश मे
कहीं कुछ भी नहीं हैं दूर दूर तक
तितलियां भौंरे लापता हैं
सुनाई नहीं देती हैं बच्चों की किलकारियां
ये विषाणु फिर रच रहे हैं विनाश किसी नई सृष्टि के लिए
जिसमें नहीं हो सकेंगी लाकडाऊन जैसी सुबह
दोपहर शाम और कर्फ्यू जैसी रातें

कमलेश कुमार दीवान
14/4/21

बुधवार, 10 मार्च 2021

💐पंतंग💐.... दो गजलें

             💐 पंतंग💐

रूख देख हवाओं का उड़ाओगे जब पतंग
छू लेगी आसमान को रह जाए सभी दंग
कोहरा भी बादल भी हैं कौधेंगी बिजुरिया
चरखी के साथ धागा चलाने का आए ढंग
साथी भी अपना हो माझा भी स्वयं का
जब देर तक आकाश में ठहरी रहे पतंग
कागज तो ताव ही हो पिंचीं हो बाँस की
अच्छी बने कमान तो लहरायेगी पतंग
जब भी किसी मकसद से उड़ाएंगे मेहरबां
काटेंगे दूसरों की खुद ही की गिरे पतंग
हम अपनी पतंग को कभी ऐसे न उड़ाएं
पंछी गिरे दो चार और लुट जाएं फिर पतंग
कमलेश कुमार दीवान
17/2/21
       💐पतंग.... 2
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
कुछ खास से अरमानों को लेकर उड़ी पतंग
कुछ ख्वाहिशो के साथ  मे जीती रही पतंग
उड़ती हुई वो दूर तक पहुंची जरूर थी
बदला हवा का रूख तो उलझती गई पतंग
एक दौर रहा होगा जब त्यौहार थी पतंग
अब दौरे  सियासत का मापन बनी पतंग
ऊँची बहुत गई थी कभी आसमान मे
माँझा बहुत था तेज कटकर गिरी  पतंग
कमलेश कुमार दीवान
18/2/21

शनिवार, 6 मार्च 2021

इसलिए तो....अब हमें चलना ही होगा

                   

                       💐 इसलिए तो ....।।अब हमें चलना ही होगा 💐      
                                                        *कमलेश कुमार दीवान
               अब हमें चलना ही होगा ,कलम लेकर कैमरों के सामने
                थामकर हर हाथों में अखबार अपने 
                बरना ये दुनियाँ हमें जीने नहीं देगी 
               अब हमें चलना ही होगा कलम लेकर कैमरों के सामने।
                हम चले तो चल पड़ेगीं ,कश्तियाँ कागज की भी 
                हम उठे तो जाग उठेंगीं ,बस्तियाँ  जो सो गई थी कभी 
               अब हमें ढलना ही होगा स्याही कागज पेन मे 
               सब उतरना चाहेंगे भी ,इस गंगो-जमुन के चैन में
               अब ये सपने चुभ रहें हैं आस्तीनों में
               आदमी तो हैं हमें झौका मशीनों मे 
              अब निकलना है हमीं को अमन के वास्ते
              अपने ही सर ,सरजमीं और चमन के वास्ते 
              शांति होगी तभी होंगें सहमति के रास्ते
             अब हमें चलना ही होगा कलम लेकर कैमरों के सामने
             थामकर हाथों में अखबार अपने ...अब हमें ।
             क्या तुम्हारी कलम भी गिरफ्तार हो सकती?
             क्या ये आयत बंदिशे हर बार हो सकती?
             क्या तुम्हें लगता नहीं कि ये भी पहरे खत्म हों?
             क्या अमन के वास्ते ये सख्त चेहरे नरम हो ?
             सोचना होगा हमी को हम-वतन के वास्ते
             हम कलम के साथ हो ले हर चमन के वास्ते 
             हाथों में थामों कलम के साथ भी आना जरूरी है
            अन्यथा सर ही कलम होंगें कलम के वास्ते 
             दफन होगें सभी सपने ,न रहेंगे हम ,न होंगे आपके अपने
             इसलिए भी …..अब हमें चलना ही होगा
             कलम लेकर कैमरों के सामने 
             हाथों में थामे हुए अखबार अपने ।

             वतन केवल सरहदों से ही नहीं बनता वतन केवल ओहदों से भी नहीं चलता 
            वतन केवल शाँति से महफूज रहता है वतन केवल 'वतन'  रहने से नहीं चलता
            हम वतन हैं एक प्याले हम निवाले हैं वतन केवल यही कहने से नहीं चलता 
            वतन पर्वत पेड़ नदियां और न ही सरहद वतन दिल से ही दिलो को जोड़ने का बल
            वतन ताकत ही नहीं है प्रेम भी तो है वतन दुःख सुख मे कुशल क्षेम भी तो है
                                       💐2💐
          वतन हम सबका हम ही तो वतन हैं वतन मे अमनो अमन यही तो जतन है
           वतन एक जीवित सदी ,गहरा समुंदर ही वतन ही गुरूद्वार  गिरजा, मस्जिद मंदिर है
           वतन के ही लिए तो तहजीब के  शानी वतन के हर रास्ते,  तजबीज के मानी 
           वतन कागज भर नहीं है आशियाँ है वतन ही तो हम सभी की शिराएँ है
           वतन की अपनी कहानी है वतन की अपनी रवानी है
           वतन केवल ढाई आखर है वतन के भी बड़े मानी है
          वतन एक आकाश सपनों का  वतन एक आभास अपनो का
          वतन सांसे हैं जवानी है  वतन के हर लफ्ज वाणी है
          वतन होगा तो हमारे हम और अपने हैं  वतन से साकार होंगें सपन सबके है
           इसलिए तो …. अब हमें चलना ही होगा कलम लेकर कैमरों के सामने 
          हाथों में थामे हुए अखबार अपने तभी पूरे हो सकेंगे सबके सपने
          वरन् हम होगें कलम सर भी हमारे ही वेवतन उजड़े वतन मे, घर हमारे ही
          अब हमें चलना ही होगा ,अब हमें चलना ही होगा  अब हमें चलना ही होगा।

                                                            
                                                                            ( कमलेश कुमार दीवान)
                                                                                      23/2/2021
      लोकतंत्र ,नागरिकों ,स्वतंत्र लेखक, अखबार और संचार सूचना माध्यमों मे
      कार्यरत सभी  भाई बहनों को मेरी यह रचना सादर समर्पित है ।धन्यवाद


गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

फल

 फल

साख ने छोड़ा है अपने आप तो नहीं टूटा 

हम कहाँ चाहते थे,आसमाँ से जमीं पर गिरना 

आँधियों मे रहा साथ,थपेड़ों को सहा मैने भी

कलीं ने फूलों को हर वक्त धकेला कितना

सरक चला था कच्चा था अधपका सा मै

जमीं के पास फिर किसी ने छोड़ा भी 

किसी ने छील दिया और कोई निचोड़ता हैं

किसी ने बचा रखा और कई ने फोड़ा भी

शुरू कहाँ से हुआ था फिर ऊगना मेरा

वहां रहा होगा पानी हवा जमीन का डेरा

आज फिर बीज मे तब्दील किया है मुझको

मै आऊंगा ऊगकर फिर मिलूंगा तुझको 

जहां से छूटा था मेरी नाव से तेरा दरिया 

कैसे आ जाता है उगने का मेरा जरिया 

एक छोटे बीज से पौधा बना फिर पेड़ हुआ

फल बना पका फिर से साख ने धकियाया बहुत

मै कहाँ जाता मिट्टी थी आसमाँ था ऊगाया उसने 

फिर खिला फूल बना फल और पकाया उसने

साख ने छोड़ा या आँधी के थपेड़ों से गिरा

कितना चाहा था उसी साख से हिलगा रहना 

पर नहीं चाहती थी साख पत्ता पत्ता भी 

वहां होना और उसी डाली को जकड़े रहना

अब तो हर वक्त तोड़ा झिंझोड़ा जाता हूँ 

साख से फिर भी छोड़ा जाता हूँ 

कोई फोड़ा करें निचौड़ा करें 

फल हूँ अपने साथ ही एक पेड़ ले के आता हूँ।

कमलेश कुमार दीवान

8/12/2020

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

अधबुने जाले

 अधबुने जाले 

मकड़ियों के 

लग रहे हैं 

अधबुने जाले 

पर यहाँ की 

लकड़ियाँ सुलगी हुई क्यों है? 

जंगलों  की आग ने 

फूँके वनो के वन 

दाग है चहुँ ओर देखो 

अपने अपने मन  ।


हम वतन के वास्ते 

क्या क्या करे 

क्या कुछ न हो 

आज के इस तंत्र मे 

ऐसा कहाँ है 

भर गया है 

सभी कूछ के साथ 

सामान सारा 

देखिये अपना कहाँ है 

आसमान प्यारा 

खिड़कियो से 

लग रहे हैं

महल दुशाले .

मकड़ियों के 

लग रहे है

अध बुने जाले । 


कमलेश कुमार दीवान 

लेखक 

14/04/2015


शनिवार, 5 दिसंबर 2020

ओ मेरे देश की मिट्टी...

ओ मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
खेत मे ऊगती पक गई फसलों को आते ही
निगल जाते हैं बाजार
सूने रहते हैं खलिहान पायगा और मकान
सूझता कुछ भी नहीं आदमी हैं या फिर है दुकान
उठते सोते हुए खोए हुए रहते हैं उदास
हम भी क्या पाते हैं खोने का लगा पाते हिसाब
अब न गोधूलि है न भोर की ललनाई हैं
न वो परिंदे न पेड़ रात का कलरव ही रहा
ओ मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
दे चुका हूँ मै अपने गांव ,चैन रात के सपने
अब भी बलिदान दे रहे हैं वही मेरे अपने
अब खबर बनती है एक रोज की ताजा तस्वीर
पर बदलते नहीं हालात दास्तां तकरीर
हम सियासत के स्याह हर्फ सफो से हैं क्यों
पन्नो पन्नों पर नाम उनके और उनकी तकदीर
हम तो लहरा रहे हैं तिरंगा जय हिंद के साथ
सोचते हैं कि बदल जाएंगे किस्से और किताब
ओर मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
अब न मेरे पास रहे अपने ही हिस्से के जबाब
अपने घर द्वार और परिवार दे चुका हूँ तुझे
घर आँगन और तुलसी पे रह गया है न हक भी मुझे
अपने सब यार और जज्बात दे चुका हूँ तुझे
ओ मेरे देश की मिट्टी में और क्या क्या दूँ तुझे

कमलेश कुमार दीवान
2/12/2020

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

सांझ आई है

 सांझ आई है

                               * कमलेश कुमार दीवान


सांझ आई है अब आएगी नहीं रातों में नींद

शेष यादों के सफर खुरापात करें सुबह तलक

कभी आती है पिता की यादें,ठहर से जाते हैं मां के जज्बात

रूठते झगड़ते हुए भाई बहनों  के साथ 

भूली भी नहीं जाती है गांव गलियों की बरसात 

 अपनों के खेत ,चारागाह ,नदी,पोखर तालाब

शीत रातें और दालानों में जलते थे आलाव 

न मस्जिद थी,न मंदिर थे,न ही गिरजाघर

फिर भी घरों घर बाँची जाती थी किताब

जलते थे चूल्हे सिकती थी रोटियां सबकी

हम सही होते थे सुरक्षित थी बेटियां सबकी


आज हालात बदलते देखे ,लोग मुंह फेरकर चलते देखे

लोक में मत भिन्न थे  सैलाव भी पलते देखे

दिन निकल जायेगा अच्छे से भोर होने के बाद

रात सरेराह झगडो में उलझते देखे 

कहां सुकूं हैं अरमान स्वप्न सारे जहां 

सबने शव द्फ़्न और जलते देखे

बंद हो जाए रहनुमांई अब

बनती बारूद गोलियां और बम

बदल जाएगी दुनिया सारी 

और थोडा सुकून पाएंगे हम

न वोट मांगें न हुंजूमों की तरफदारी हो

किसी से दुश्मनी न हो सभी से यारी हो 

चलो बनाएं एक देश ऐसा भी हम

जहाँ की सुबह और शाम रात प्यारी हो

सभी हों पर किसी का नाम न हो

प्रार्थनाओं में  उठे  सभी के हाथ न दुश्वारी हो

सांझ आये तो आये सुकून, नींद और ख्वाब 

शेष यांदो के सफ़र सुबह तक जारी ही रहे ।


कमलेश कुमार दीवान 

28‍/11/2020









गुरुवार, 19 नवंबर 2020

मेरे शहर के लोग.... गजल

 रहते नहीं उदास हैं ,मेरे शहर के लोग

रखते बहुत लिहाज हैं ,मेरे शहर के लोग

अपने लिवास ,बातचीत ,आतिथ्य मे मधुर
हर शख्स लाजबाब है मेरे शहर के लोग।
मंदिर है, मस्जिदें हैं गुरूद्वारे प्रार्थना घर,
हर धर्म की किताब हैं, मेरे शहर के लोग।
कोई समझ सके तो चले साथ हमारे
एक पालदार नाव है, मेरे शहर के लोग
गर्मी में शीतल छाँव है, बरसात में छाता
सर्दी में एक अलाव है मेरे शहर के लोग।
जीवन के साथ बहुत सी कठिनाईयां भी हैं
फिर भी हैं खुशमिजाज, मेरे शहर के लोग।
कमलेश कुमार दीवान
16/9/2020
होशंगाबाद म.प्र. भारत

बुधवार, 4 नवंबर 2020

चाँद कहता रहा

 चाँद कहता रहा


चाँद कहता रहा रात भर रात से 

यूँ ही चलता रहा हूँ बिना बात के 

रात में ,रात भर, कई रात से 

इन सितारों की नजरें 

जमीं पर भी रही है

रात मे रात से रात भर ।

अभी भी बहुत बची है कहानी मेरी 

मै चला था कहाँ से कहाँ आ गया 

किसी बात से रात मे रात से ।

तुम सुनोगो नहीं पर कहा तो यही

मेरे जज्बात पर कह उठा है आसमां

तुम्हे कायनात पार करना है अभी

 तुम चलो चलते ही रहो 

रात मे रात भर रात से बिना बात के

चाँद कहता रहा अँधेरो से उजियार से 

मै थका हूँ कहाँ 

रात भर रात से बिना बात के 

चाँद कहता रहा 

रात भर रात से 


कमलेश कूमार दीवान

5/2/17


 

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

"हौंसलों के आसमान"

 "हौंसलों के आसमान"


चिड़ियौ के पास क्या है 

चिड़ियों के पास जो कुछ भी है

वह पंख हैं,हौंसलें हैं

नदियाँ पर्वत,बहुत उँचाई वाले

 आसमान छूते पेड़

तालाब सागर वर्फ 

उड़ान भरने और गंतव्य पर

पहुँचने के हर्ष 

घौंसलों मे राह देखते बच्चे जब

धकियाते है परस्पर 

तब भी चोंच से चुग्गा गिरता नहीं है 

खुश रहती है चिड़िया 

जो चिड़ियौ के पास है वह बेटियौ के पास कहाँ?

उनके हिस्से आते हैं 

उजड़े हुये नीड़

कटकर उड़ती पतंगें

माँ के सपने और पिता के जज्बात्

भाई के लिये समर्पण और

 अपनो के लिये अर्पण

पंख ,हौंसले ,उड़ान और आसमान 

बेटियों के पास कहाँ हैं 

उनका सब कुछ रोजनामचे मे दफन है 

आजादी,लोकतंत्र और तिरंगा 

यही उनका .......नमन है ,जय हिंद 


*रोजनामचा ...पुलिस का रजिष्टर 


कमलेश कुमार दीवान 

3/10/2020 


शनिवार, 26 सितंबर 2020

गीत....."पता चले"

  पता चले....


कुछ देर सही मिल बैठे तो

साँसो की लय का पता चले 

हम कौन कहाँ तक चल पाऍ

बाधाऍ क्या है पता चले ।


कब रूके और कब मिले प्रिय

कब बिछुड गये तँजीमो से 

सब खाली खाली उजड गये

कुछ छिपा हुआ आस्तीनो मे

कोई गैर नही ,कोई बैर नही 

फाँसो की तह का पता चले।

हम कौन कहाँ तक चल पाऍ....


हम आजादी के दीवाने

सब लोकत॔त्र के गायक है॔

ऐसा लगता है तूफाँ मे

कश्तियौ॔ को खेते बाहक है

हम धवल श्वेतवर्णी हिमकण

काले पहाड़ क्यो॔ दीख रहे

हम शाँति और अविरलता के

गण है॔ नायक और उन्नायक

यही ठौर हमारे और नही॔

बातो की शह का पता चले।

हम कौन कहां तक चल पाऍ

बाधाऍ क्या है॔ पता चले ।


कमलेश कुमार दीवान

19/9/2020

*हमारी बाधाऍ ...राजनीति,धर्म,जातिवाद,

अशिक्षा,अंधविश्वास,कुरीतियाँ आदि आदि है।

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

हिंदी... यह भाषा अपनी

 हिंदी दिवस पर गीत..... यह भाषा अपनी है

हिंदी के गीत लिखे
हिंदी के मीत दिखे
प्रीति करें भाषा से
यह भाषा अपनी है।
यह भाषा अपनी है।
आज नमस्ते का युग
आया है हिन्दी से
विश्व कर रहा प्रणाम
वह भाषा हिंदी से
ओ मेरे मन के मीत
आओ गाओ रे गीत
हम भी जाएंगे जीत
यह आशा अपनी है।
यह भाषा अपनी है।
सभी देशवासियों आ हिंदी दिवस पर शुभकामनाएं।
कमलेश कुमार दीवान
14/9/2020

रविवार, 21 जून 2020

मुझे थोड़ी खुशियाँ तो दो मेरे बच्चो

मुझे थोड़ी खुशियाँ तो दो

मेरे बच्चो 
इस ढलती उम्र में 
मुझे  थोड़ी खुशियाँ तो दो 
मेरे बच्चो ।
मुझे पता है 
घर के अनुशासन से 
तुम सब ऊब चुके हो 
मुझे जानकारियाँ मिल रही है कि 
हमारे ही कारण तुम सब 
अपनी अपनी दुनियां मे रम चुके हो 
ये फोन ,ये कम्प्यूटर और शोसल नेटवर्क 
सब कुछ अच्छी शिक्षा नही दे रहे हैं 
जिस तरह किताबे, दादा दादी और परिवार से 
सब कुछ मिल जाता था जो जरूरी था 
गाँव,घर ,स्कूल पड़ोस कस्बा और शहर 
सभी कूछ पहले जैसे नहीं रहे हैं 
मेरे बच्चो 
पर तुम बड़े होने के बाद भी 
 हमारे लिये बच्चे ही हो 
गृहस्थी बसाओ, घर बनाओं खुश रहो
फिर भी हमारी अपेक्षाओं मे बदलाब नही ला पाते 
मेरे बच्चो ,
चाहते है इस ढलती उम्र में 
थोड़ी सी खुशियाँ 
ताकि हम नदियों के वहाव,हवाओ के प्रवाह और 
बागो से उड़ती हुई खुशबूओं को 
महसूस कर सकें 
मेरे बच्चो 
थोड़ी सी खुशियाँ बाँटोगे 
अपार हर्ष पाओगे ।


कमलेश कुमार दीवान
27/09/2016
kamleshkumardiwan@gmail.com 

सोमवार, 15 जून 2020

*हम सुनना चाहते हैं

*हम सुनना चाहते हैं
अब हम सुनना चाहते हैं
वही आवाज
जो सुखकर लगे
हमारे कानों को ।
हम करना चाहते हैं
वही कार्य
जो भाए मन को हाथों को
हम देखना चाहते हैं वही सब‌ कुछ
जो आते जा रहा है हमारी आंखों के सामने
हम बोलना चाहते हैं
वह सब कुछ
जो सुना किया देखा
और झेला है
किन्तु अब
कानों, आंखों, ज़ुबान और ज़ेहन
जबाव देने लगें हैं
शिराएं थकने लगी है
अब हमें सुना रहे हैं वे
जिन्होंने कभी हमारी बातों पर
कान नहीं दिया
सुनना ही पड़ेगा
कमलेश कुमार दीवान
10/07/2019

सोमवार, 25 मई 2020

आओ बात करें ...

"आओ बात करें"

  • कमलेश कुमार दीवान
आओ बात करें अपनों से
 अपनों से, अपने सपनों से
आओ बात करें।
मोबाइल से दूर हुए हम 
लेपटॉप ने छीना है सुख 
सुनने से प्रलाप उपजा है 
पढ़ने से पहुंचा है दुःख
आओ साथ चलें अपनों के
अपने अपने सपनों के
आओ बात करें।
राहें नई उकेरे
रूकें नहीं पर थोड़ा ठहरें
फिर देखें यह नदी पहाड़ी 
जल जंगल और जीवन
चांद सितारे सूरज तारे हवा
चलेगी साथ हमारे
आओ बात करें अपने से
अपनों से , अपने सपनों से
आओ बात करें।

*यह गीत सुबह सबेरे भोपाल में प्रकाशित हुआ है
दिनांक 15/9/19

मंगलवार, 20 मार्च 2018

शनिवार, 23 सितंबर 2017

समय जुलाहे बता.....गीत

“समय जुलाहे बता”
समय जुलाहे बता
आज का ताना बाना
क्या है?
कौन किसे सम्मान करेगा
गरियागा कौन
कौन लिखेगा शब्द वाण से
कौन रहेगा मौन
समय जुलाहे बता
आज का रोना गाना
क्या है?
समय जुलाहे बता
आज का ताना बाना
क्या है?
सूरज तो निकला है
पर वह
लाल नहीं था
घूम गई थी धरा
मगर वह
काल नहीं था
ध्वज दिख रहे सभी
पीले ही पीले
मन लहराए कब
ऐसा हाल नहीं था
समय जुलाहे बता
आज का खोना पाना
क्या है?
समय जुलाहे बता
आज का ताना बाना
क्या है?
कमलेश कुमार दीवान
लैखक होशंगाबाद म.प्र.
10/9/17

रविवार, 3 सितंबर 2017

"तुमसे क्या छिपायें" .. .....(......

"आजादी के बाद मेरे देश मे संसदीय लोकतंत्र और बहुत बाद मे स्थानीय स्वशासन एवं पंचायती राज प्रणाली
अपनाई गई पर इस प्रकार की दोहरी तिहरी शासन प्रशासन प्रणाली से भी आजादी के समय स्वतंत्रता सेनानियो के सपनो को पूर्ण नही कर पाये है देश की अर्थव्यवस्था पर बौझ बढ़ा लोकतात्रिक संस्थाऐ एक दूसरे से पृथक कर दि गई आम चुनाव बहुत महंगे हुये सहिष्णुता भाईचारा सब कुछ तिरोहित हो गया हम नेतृत्व से बहुत आशा करते है किन्तू वह प्रशासनिक व्यवस्थाओ मे कोई सुधार नही होने के कारण मजबूर हो गये है नेतृत्व से जन अपेक्षाओं के संदर्भ मे यह गीत  प्रस्तूत है ...

लोकतंत्र का नया गान ......

 "तुमसे क्या छिपायें"

नित नये नारे ,नए उदघोष ,नव आंकाँछाएँ
हो नही सकती कभी पूरी
 ये तुमसे क्या छिपाएँ  ।

देश का इतना बड़ा,कानून है
भूख पर जिसका असर ,होता नहीं
मूल्य बदले दलदलो ने भी
क्राँति जैसे जलजलों का
अब असर होगा नहीं
और नुस्खे आजमायें ।
ये तुमसे क्या छिपाएँ।

अरगनी खाली ,तबेले बुझ रहे हैं
छातियों में उग आये स्वप्न सारे
जंगलों से जल रहे है्
तानकर ही मुट्ठियों को क्या करेगें
ध्वज पताकाएँ उठाने मे मरेगें
तालियाँ भी इस हथेली से नहीं बजती
ढोल कैसे बजाएँ।
तुमसे क्या छिपाएँ।
   
कमलेश कुमार दीवान
लेखक
होशंगाबाद म.प्र.
919425642458
kamleshkumardiwan.blogspot
kamleshkumardiwan.youtube.com

शनिवार, 1 जुलाई 2017

#हेलो डाक्टर#

#हेलो डाक्टर #

                ..           “ कमलेश कुमार दीवान”
क्या आप जानते है कि आपके मरीज पर्याप्त दवाई खाने के बाद भी स्वस्थ नहीं हो पा रहें हैं?मुझे लगता है कि शायद आप हाँ  नहीं कहेंगे।हमें विश्वास करना होगा कि हमारे देश के 99%व्यक्ति बीमार होने पर कई पेथी से संबधित नाना प्रकार की दवाईयाँ अपने आप सीधे दुकानों से खरीदकर सेवन करतें हैं इसमें इलाज करने वाले के साथ विज्ञापन भी सहभागी हैं।इसका एक अर्थ यह भी है कि एलोपैथिक चिकित्सा से कहीं अधिक विश्वास आयुर्वेद ,होम्योपैथी,यूनानी चिकित्सा पद्धतियों के साथ घरेलू नुस्ख मे है ।कभी कभी डाक्टर यह कहते हुए भी देखें जाते हैं कि “वह दवाई मत छोड़ना यह भी चलने दो “गजब संस्कार हैं।इस बहाने कुछ बातें जरूर साफ होना चाहिए……
1..मरीज की मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग जरूर करें ताकि आपको पता चले कि नाश्ते के पहले या बाद के लिये लिखी गई दवाई को सेवन करने हेतु उसकी नाश्ता करने की प्रवृत्ति या परम्परा है कि नहीं ?
2...अपनी तरफ से ही सभी प्रकार की जांच करवाएँ तदुपरांत ही दवा लिखें ।उसके पूर्व सामान्य दवाएं दे ताकि राहत मिले पर पैथोलॉजी जाँच प्रभावित न हो।
3...मरीजों को सुनें,देखें कि वह बीमारी से पृथक क्या बताना चाहता है ।
4...बगैर गहन जांच के दवाएं न लिखें।
धन्यवाद।
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद
30/6/177

सोमवार, 5 जून 2017

पहाड़ हँस रहें हैं

आज 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है ।हम सभी पर्यावरण विनाश को लेकर चिंतित हैं। यह दिवस आने पर हम पेड़ लगाते आ रहे हैं पर कहाँ पेड़ पौधो का रोपड़ किया जाये यह नहीं सोचते हैं।हमारे देश मे होने वाली मानसूनी वर्षा पहाड़ों कि ऊँचाईयों के अनुसार होती है यदि हम पहाड़ो से पेड़ काटते हैं तब ऊँचाई एकदम लगभग तीस मीटर तक कम हो जाती है जिससे न केवल वर्षा वरन  भूमिगत  जल भी प्रभावित होता है । मेरी यह कविता एक आव्हन है पढ़ियेगा...


पहाड़ हँस रहें हैं
                            कमलेश कुमार दीवान

दोस्तो ये पहाड़ हम पर
हँस रहे हैं
अट्टहास कर रही है हवायें
उमड़ते घुमड़ते काले मेघ
कहर बरपा रहे हैं
और तुम........
अब भी सड़को ,नदियों के किनारें
घर आँगन चौपाल चौराहों पर
पेड़ लगा रहे हो
जानते हो नरबाई की आग ने
जला दिये है लाखों पेड़
मानना ही पड़ेगा कि पहाड़ो की हरितिमा
उतार फेकी है इस सदी ने
फिर भी तुम
पर्यावरण के गीत गा रहे हो
दोस्तो
नदियों से पहले
पहाड़ो को बचाओ
भुरभुरी रेत की ढेरी बनती
चट्टानो को बचाओं
ये पहाड़ ही हैं जिनके बीच से बहती नर्मदा
भूमिगत स्त्रोतों से रिसकर आ रहे जल से
सदानीरा जीवनदायनी है
पहाड़ पर पेड़ होंगें तब
जल और जीवन के साथ
हमारा आज और कल भी होगा
पहाड़ो को बचाओ दोस्तो
नदियों से पहले पहाड़ों और पेड़ो के गीत गाओं
यात्रा करो उन वियावानो की
जहाँ जंगलो को साफ कर दिया गया है
देखो वहाँ से कभि न दिखाई देने वाला आसमान
साफ कह रहा है कि
पेड़ पौधौ की जरूरत यहाँ हैं
उन खेतो और किनारो मे नहीं
इसलिये यहाँ आओ
पेड़ उगाओ, लगाओ और कल के लिये जल के साथ
कलकल बहती नदियाँ हवा पानी और सूख पाओ
दोस्तो सही जगह पेड़ लगाओ .
पेड़ो को लगाने की सही जगह पहाड़ ही हैं
     
कमलेश कुमार दीवान
30/5/2017
लेखक होशंगाबाद    

मंगलवार, 16 मई 2017

दादा जी संक्षेप मे

भारतीय किसानो की दशा पर वर्ष १९८२ मे लिखा यह गीत आज भी प्रासांगिक है ।
पहले महाजन थे आज सरकारी एवम्  निजी बैंक और उनके एजेंट है लोग समझते है कि भारत
१९४७ मे आजाद हो गया है पर हमारी आखौ के सामने वही मंजर है वही गिड़गिड़ाहट है ,फसले खराब होने
पर अन्नदाता किसान राजनीति के कदमो मे गिर रहा है अर्थात् हमने आजादी से क्या पाया है बड़े बड़ै बाजारो का तिलिस्म
समपन्नता के सपने हमे जीने नही देते है ।मेरा यह गीत एक बिचार है जो परिवर्तन की दरकार लिये है .....

दादा जी संक्षेप मे

सारी जिनगी
बीत गई है
दादा जी आक्षेप मे
और सुनाओ
बड़ी कहानी
दादा जी संक्षेप मे ।

सच बतलाओ
उसे कहाँ पर
दफनाया था
पतिता रोती रही
न उसका
पति आया था
दूर देखती रही
उसांसे भर भर कर
कैसे जीती रही
आज तक
मर मर कर
पिता आयेंगें
बिटियाँ तेरे
बाबाजी के वेष मे
दादा जी संक्षेप मे ।

जब रमुआ के बैल
हाँक ले गये महाजन
गिर गिर गई पैर पर
सुखिया बाई अभागन
छुड़ा रही थी हाथ
और वह खींच रहा था
तेरा साथी कल्लू कैसा
चीख रहा था
लाज लुटी घरबार रहन
हो गये एक आदेश मे
और सुनाओ बड़ी कहानी
दादा जी संक्षेप मे ।

कमलेश कुमार दीवान
१८ जून १९८२

   

रविवार, 30 अक्तूबर 2016

दीपावली 2016 पर विचार शुभकामनायें एवम् गीत .."आज हम"

दीपावली 2016 पर  विचार शुभकामनायें एवम् गीत .."आज हम"

सृष्टि मे अँधेरे का साम्राज्य है।पृथ्वी पर पृथ्वी की छाया ही दुनियाँ मे रात का अँधेरा है जिसे एक सूरज उजाले से भर देता है ।मनूष्य भी अपने अतीत की छाया से भविष्य के अंधेरों का सृजन कर डूबने लगता है तब हमारे अंर्तमन से वर्तमान के उजास प्रस्फुटित होकर पथ को आलोकित करते हैं। आओ हम सब एक दीप अपने अंर्तमन मे व्याप्त अंधेरों को दूर करने हेतु जलायें अपने पथ पर आगे बढ़े ,बढ़ते रहें । गीत है .......

""आज हम ""
आओ अंर्तमन के
दीप प्रज्जवलित करे ,आज हम
पथ पथ अँधीयारे फैले हैं
दिशा दिशा भ्रम हैं
सूरज चाँद सितारे सब है
पर उजास कम हैं
थके पके मन, डग मग पग है
भूले राह चले हम ।
आओ अंर्तमन के
दीप प्रज्जवलित करे, आज हम ।

दीपावली के पावन पर्व पर शुभकामनायें ।सभी सुख समृध्दि से परिपूर्ण रहें ।

कमलेश कुमार दीवान
30/10/2016