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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

दरिया.... ग़ज़ल

          दरिया 

                       कमलेश कुमार दीवान 

यूं अपनी ही रवानी से अनजान है दरिया 

इस उसकी मेहरबानी से पशेमान है दरिया 

जाना था अभी उसको समुंदर की तरफ ही 

घाटी की बेईमानी से बहुत परेशान  है दरिया 

कभी कम तो तेज अब थमा सा ही रह गया 

अपनी ही इस कहानी से कुछ हैरान है दरिया 

पहाड़ों से सरकते आ रहा एक सैलाब सा धीरे

अपनी ही निगहबानी से असमान हैं दरिया 

लहरें हवा से आज भी क्यों उठ रही 'दीवान '

कुछ छोड़ निशानी से तेरी पहचान हैं दरिया 

कमलेश कुमार दीवान 

19/3/25

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