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बुधवार, 28 अप्रैल 2021

"जरा संभल के चलो" ...गजल

                          " जरा संभल के चलो "

                                                            कमलेश कुमार दीवान 

बहुत खामोश हैं लम्हे उदास सुबह और शाम

क्या होगी रात भी ऐसी ,जरा संभल के चलो 

हुई हैं बंदिशे आयत खुले दरीचे भी कहां होगें 

किसी से बात हो कैसे ,जरा संभल के चलो 

अब हवाये बहुत धीमे से चल रही है यहां

उसी के साथ है तूफांं , जरा संभल के चलो 

हम भी पेड़ो से गिरे सूखे पत्तो की तरह 

हमारे पास ही आतिश, जरा संभल के चलो

अपने जेहन मे भी इतनी जगह रखो 'दीवान'

किसी से घात भी हो तो, जरा संभल के चलो

कमलेश कुमार दीवान 

26/4/2021 

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29 -04-2021 को चर्चा – 4,051 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

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  2. सुंदर भाव अभिव्यक्ति कमलेश भाई.... बधाइयां

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  3. वाह, क्या बात है। बहुत सुन्दर।

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