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शनिवार, 5 दिसंबर 2020

ओ मेरे देश की मिट्टी...

ओ मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
खेत मे ऊगती पक गई फसलों को आते ही
निगल जाते हैं बाजार
सूने रहते हैं खलिहान पायगा और मकान
सूझता कुछ भी नहीं आदमी हैं या फिर है दुकान
उठते सोते हुए खोए हुए रहते हैं उदास
हम भी क्या पाते हैं खोने का लगा पाते हिसाब
अब न गोधूलि है न भोर की ललनाई हैं
न वो परिंदे न पेड़ रात का कलरव ही रहा
ओ मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
दे चुका हूँ मै अपने गांव ,चैन रात के सपने
अब भी बलिदान दे रहे हैं वही मेरे अपने
अब खबर बनती है एक रोज की ताजा तस्वीर
पर बदलते नहीं हालात दास्तां तकरीर
हम सियासत के स्याह हर्फ सफो से हैं क्यों
पन्नो पन्नों पर नाम उनके और उनकी तकदीर
हम तो लहरा रहे हैं तिरंगा जय हिंद के साथ
सोचते हैं कि बदल जाएंगे किस्से और किताब
ओर मेरे देश की मिट्टी मै और क्या दूँ तुझे
अब न मेरे पास रहे अपने ही हिस्से के जबाब
अपने घर द्वार और परिवार दे चुका हूँ तुझे
घर आँगन और तुलसी पे रह गया है न हक भी मुझे
अपने सब यार और जज्बात दे चुका हूँ तुझे
ओ मेरे देश की मिट्टी में और क्या क्या दूँ तुझे

कमलेश कुमार दीवान
2/12/2020

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