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रविवार, 26 जुलाई 2009

गगन मै

गगन मै
गगन मै
उड़ते बिहग अनेक।
गगन मे
उड़ते ,बिहग अनेक ।
कोई अकेला
कोई सखा सँग
कोई..कोई विशेष ।
गगन में,
उड़ते बिहग अनेक ।
कमलेश कुमार दीवान

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

चिड़ियों की चिंताओं मे

चिड़ियों की चिंताओं मे

ओ चिड़ियो , ओ चिड़ियो
पंख फड़फड़ाओ मत
उड़ के तुम दूर कहीं जाओ मत
गाओ गुनगुनाओं मत
खिलखिला के हँसना सब दूर मना
ये पर्वत ,नदियाँ ,झील, सागर के साथ साथ
नीला आकाश खूब बना ठना है
आसपास एक छोटा पिंजरा बना है
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
फंख फड़फड़ाओ मत
गाओ गुनगुनाओ मत
खिलखिला के हँसना सब दूर मना है।
अब कितना मुश्किल है
खोखले से बरगद पर घौसला बनाना
खतरनाक हो गया है
दूर हरे खेतों से चुग्गा ले आना
दुनका दाना पानी सब यहीं बुलाने दो
उड़ना पर तौलना सब दूर मना है।
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
फंख फड़फड़ाओ मत
उनको फुरफुराने दो
गाओ मत गीत कोई
उनको ही गाने दो
आस पास आओ मत
उनको मँडराने दो
नीला आकाश खूब बना ठना है।
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
आस पास एक छोटा पिंजरा बना है।
कमलेश कुमार दीवान
०८ मार्च १९९५

रविवार, 7 जून 2009

क्या करूँ मेरे मना....... गीत

suniye
क्या करूँ मेरे मना....... गीत

क्या करूँ , मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है,रहता अनमना।

ऐसा लगता,भागते रहने से
सब कुछ खो रहा है
जिंदगी के गीत गाये साथ साथ
अब खुशी के साथ भी कुछ हो रहा है।
दिल नहीं लगता है ,रहता अनमना
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना ।

ठहरना ,चलना,ठिठकना, याद रखना भूलना
शुष्क ॠतुओं मे उपजना,लहलहाना
और फलना फूलना
आए मौसम जब बहारों का
मुस्कराने ,मचलने और श्रृगारों का
भूलकर होती नहीँ है कल्पना ।
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।

क्या अधेंरी रात का आकाश या तारा बनूँ
बादलों बरसात की एक बूँद ,जल सारा बनूँ
या कि सागर झील का मोती रहूँ
सीप में पलते हुए संसार का कारा बनूँ
पीर हरने का सहारा जन्मना.
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।

क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।

कमलेश कुमार दीवान
०१ मई २००६

बुधवार, 20 मई 2009

दरबारों मे खास हुए हैं

दरबारों मे खास हुए हैं
दरबारो मे
खास हुए हैं
आम लोग सारे ,
आम लोग सारे ।
गलियारो मे
पहरे...पहरे
जनता दरवाजो पर ठहरे ,
मुट्ठी भर जनत्तंत्र यहाँ पर
अधिनायक सारे ,।
दरबारो मे खास हुए हैं
आम लोग सारे ,।
आम लोग सारे ।
राज निरंकुश
काज निरंकुश
इनके सारे बाज निरंकुश
लोक नही
मनतंत्र यहाँ पर
गणनायक हारे ।
दरबारो मे खास हुए हैं
आम लोग सारे ।
आम लोग सारे।
ठहर गए
कानून नियम सब
खाली सब आदेश
मुफलिस की
आँखों मे आँसू
हरकारे दरवेश,
ऊँच..नीच के भेद वही हैं
काले वही ,सफेद वही है
स्वेच्छाचारी और अनिवारक
मणिबाहक सारे।
दरबारो मे खास हुए है्
आम लोग सारे ।
आम लोग सारे ।
कमलेश कुमार दीवान
मई १९९३

मंगलवार, 5 मई 2009

आज गाने,गुनगुनाने का,नहीं मौसम...

suniye
नहीं मौसम...
आज गाने,गुनगुनाने का,
नहीं मौसम
नाते रिश्ते आजमाने का ,
नहीं मौसम
घर बनाने और बसाने का,
समय है
उनको ढेलो से ढहानें का,
नहीं मौसम
आज गाने गुनगुनाने का
नही मौसम ।
मेरे तेरे,इसके उसके
फेर मे हम सब पड़े है
कुछ लकीरे खींचकर एक
चौखटे मे सब जड़े हैं
कायदा है समय से
सब कुछ भुनाने का
आज अपने दिल जलाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
एक मकसद,एकमँजिल,
एक ही राहें हमारी
क्रातियाँ ,जेहाद्द से दूने हुये दुःख
फिर कटी बाहें हमारी
जलजलों ,बीमारियों का कहर
बरपा है,
गुम हुई हैं बेटियाँ जब शहर
तड़फा है
यातनायें,मौत पर दो चार आँसू
और फिर मातम,मनाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
दूर हो जाये गरीबी जब
जलजलों के कहर
सालेंगें नहीं
गोलियाँ ,बारूद बम और एटम का
क्या करेगें युध्द
पालेंगे नहीं
दरकते,और टूटते रिश्तों के पुल
बनानें का समय है
सरहदों को खून की
नदियाँ बनाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
कमलेश कुमार दीवान
८ जून १९९४

सोमवार, 4 मई 2009

आशाओं के सृजन का गीत ...." ओ सूरज "

suniye
आशाओं के सृजन का गीत
ओ सूरज
ओ सूरज तुम हटो ,मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है ।
चाहे अँधियारे घिर आएँ
सिर फोड़े तूफान
मेरी राह नहीं आयेगें
नदियों के उँचे ऊफान
ओ चँदा तुम किरन बिखेरों
तारों मे छिप जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है।
ओ सूरज तुम हटो, मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।
कमलेश कुमार दीवान

शनिवार, 2 मई 2009

छूने को आकाश बहुत

छूने को आकाश बहुत
छूने को आकाश,
बहुत मन करता है
जाने कब ये हाथ और उँचे होंगें।
घुटनो चलते तारों को पाने मे रोया
चाँद पकड़ पाने की ,जिद करते..करते सोया
आज लगा यह सूरज ,
देखो सब कुछ हाँक रहा
अँधियारे को इस दुनिया से
कैसे ढाक रहा
सब कुछ खत्म हो पर दुनिया मे
बची रहें आशाएँ
जाने कब विश्वास और दूने होगें।
छूने को आकाश बहुत
मन करता है
जाने कब ये हाथ और उँचे होगें।
कमलेश कुमार दीवान

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

कल क्या हो ?

suniye
पृथ्वी दिवस केअवसर पर गीत
कल क्या हो ?
कोई मुझसे पूछे ,
कल क्या हो ?
मैं कहता ,यह संसार रहे ।
हम रहें ,न रहें
फिर भी तो
घूमेगी दुनियाँ इसी तरह।
चमकेगा आसमान सारा
नदियाँ उमड़ेगी उसी तरह।
ये सात समुंदर, बचे रहें
को व्दीप न डूबें
सागर में,
सब कुछ बिगड़े
पर थोड़ा सा
जल बचा रहे
इस घाघर मे।
सब कुछ तो
खत्म नहीं होता
जो बचा आपसी प्यार रहे
कोई मुझसे पूछे
कल क्या हो
मे कहता हूँ ,संसार रहे ।
कमलेश कुमार दीवान
नोटःःप्राकृतिक पर्यावरण के केन्द्र मे मानव है।जलवायु परिवर्तनशील तत्वो का
समुच्य है।परिवर्तन होते रहें हैं और होंगें,परन्तु हमे आशाओं का सृजन
करना चाहिये।संसार की आबादियो को यह गीत सादर समर्पित है।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

गगन मै

गगन मै
गगन मै
उड़ते बिहग अनेक।
गगन मे उड़ते ,बिहग अनेक ।
कोई अकेला
कोई सखा सँग
कोई..कोई विशेष ।
गगन में,उड़ते बिहग अनेक ।
कमलेश कुमार दीवान

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

ओ पंछी उड़ जा रे

suniye
ओ पंछी उड़ जा रे
ओ पंछी उड़ जा रे
साँझ हो रही है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
छुई मुई से पँख तेरे
सारा आकाश
दूर ऊँचे पर्वत और बादलों के पास
आज घनें पैड़ नहीं
न छप्पर...छानी
पानी के खप्पर मे
न होती दानी
घोंसलें के तिनकों की,तान खो गयी है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
बरगद की खोहो मे
प्राण नहीं हैं
बूढे रखवारे मे
जान नहीं हैं
रात के बसेरों पर
बिजली के सूरज हैं
दाना..पानी मे ईमान नही है
चारे चुन चुनकर
घोंसले बनाये जो
आज वही ,कमरों की शान हो गई हैं
ओ पँछी उड़ जा रे
साँझ हो गई है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
कमलेश कुमार दीवान

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

अकेले मन का गीत

suniye
अकेले मन का गीत
ओ अकेले मन ,
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे ,कारबाँ मे,कारबाँ मे ।
बहुत झगड़े हैं ,झमेले हैं
ठहरकर आबाद रहने मे
सब तरफ से उगलियाँ उठती
भीड़ मे अपबाद रहने से
बात को बर्दाश्त करने का
समय अब चुक गया है
श्वाँस की उष्माएँ सहने का भी
मौसम रुक गया है
पर रुका न सिलसिला ,दुनियावी मेलो का
ओ अकेले तन
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे, कारबाँ ,मे कारबाँ मे ।
मान्यतायें अनगिनत
अपनी जमातों मे
बाँटकर देखा
शहर और गाँव ,जातों मे
सोचते षड़यंत्र करते
दें किसी को मात
मेल इतना सा और
अनबन ढेर नातों मे
हाथ मे झँडें हैं खँजर हैं
पर न बदला रूप भी,मिट्टी के ढेलों का
ओ अकेले कण तुझे
मिलना पड़ेगा
कारबाँ मे,कारबाँ मे,कारबाँ मे।
ओ अकेले मन
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे, कारबाँ मे, कारबाँ मे ।
कमलेश कुमार दीवान

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

आजादी की याद मे एक गीत

आजादी की याद मे एक गीत
उन सपनो को ,कौन गिनाएँ
जो बारी से छूठ गये
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये।
होना दूर गरीबी को था
पर विलासता बढती क्यो
परिवर्तन की चाह मे निकली
राह सियासी लगती क्यों?
पसरा रहता घोर अँधेरा
इन बिजली के तारों से
जान न पाए पीढाओं को
बाते चाँद सितारों से।
उन अपनों को कौन मनाएँ
जो यारी से छूठ गये
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये ।
हमलो के बढते खतरों में
लोग अकेले रहते हैं
बीहड में डाकू, राहों पर
कई लुटेरें रहतें हैं
गजब हुए हैं दिल्ली बाले
गबई गाँव सब छूट गये।
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये।
कमलेश कुमार दीवान
११ जनवरी १९९८

अब अंधकार भी जाने कितने

suniye
अब अंधकार भी जाने कितने
अब अंधकार भी
जाने कितने स्हाय घने होंगे,
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल ।
हम ढूँढ रहे हैं क्यों
अनंत के छोर
दुख के प्रहार अब
द्रवित नहीं करते हैँ ।
नित नई वेदनाओं
के प्रवाह मे लोग
सूखे अँतस से
क्रमिक नहीं झरते हैं ।
दिल के सुराख भी
जाने कितनें और बड़े होंगें ।
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल
अब अँधकार भी जाने कितने
स्हाय घने होंगें ।
टुकड़ों टुकड़ों मे बटे हुये
कैसे एक देश बनाएँगें
सूखीं बगियाँ ,मरते माली
कैसे एक फूल उगायेंगें
धन लुटा,अस्मिता नग्न हुई
नोंचे जाते पथ पर सुहाग
बसते संसार भी
जानै कितनें उजड़ गये होगें
अब अँधकार भी जाने कितने
स्हाय घने होंगें
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल ।
कमलेश कुमार दीवान

सोमवार, 30 मार्च 2009

कविताओं के संदर्भ मे एक कविता

कविताओं के संदर्भ मे एक कविता
कविताएँ ज्यादा कहती है्
वे अर्थ और जीवन के बीच
नदी सी बहती है्।
कविताएँ ज्यादा कहती है।
वे राग रँग
सच और प्रसंग की धार बनाती है
आनंद और उत्सर्ग सहित
जन जन से आती है
वे पीड़ाओं की एक
सदी सी सहती हैं ।
कविताएँ ज्यादा कहती हैं।
कमलेश कुमार दीवान
२५ मार्च १९०६

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

नव संवत् शुभ..फलदायक हों

॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥
भारतवर्ष के नव संवत् विक्रम संवत् २०६६
गुड़ी पड़वा चैत्र शुक्ल प्रथम के पावन पर्व पर
शुभमंगलकामनाएँ है। देशवाशियों को यह गीत
सादर समर्पित है......
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नछत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति बरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
चैत्र शुक्ल एकम् संवत् २०६६

गुरुवार, 26 मार्च 2009

भारतीय नव वर्ष पर शुभकामनाएँ

भारतीय नव वर्ष पर शुभकामनाएँ
विक्रम संवत २०६६
नया वर्ष शुभ हो ।
नया वर्ष हो, नये हर्ष हों
हो नई खुशी, नवोत्कर्ष हों ।
नया वर्ष शुभ हो ।
नई सुबह हो,नयी शाम हो
नई मजिंलें,नए मुकाम हो
नए लक्छय हों ,नए हौसले
हो नई दिशा, नए काफिले
नए चाँद तारे ..ओ आफताव
नई दृष्टियाँ ,नयी हो किताब
नये मिजाज हो, नये ख्वाब हों
नई हो नदी... नयी नाव हो
नये वास्ते नए हैं सफर
नये अर्थ जिनकी तलाश हो
नई भोर की सौगात हो .
नया वर्ष शुभ हो ।
कमलेश कुमार दीवान

मंगलवार, 24 मार्च 2009

यह सब संसार विकल है .....भजन गीत



सुनिये
http://in.geocities.com/kamleshkumardiwan/yahsavsansarbhajhan.wav

यह सब संसार विकल है .....भजन गीत
यह सब संसार विकल है।
गिरते आँसू कोइ देख न ले
वह छिपा रहा केवल है।
कोई सुख मे डूबा जाता है
कोई दुख मे तैर नही् पाता
कोई पानी पानी नदियों सा
कोई हिम सा ठहरा रह जाता
कोई शांत और अविचल है।
यह सब संसार विकल है।
कमलेश कुमार दीवान

मन कछु सुमरत नाहीं ....भजन गीत

suniye
मन कछु सुमरत नाहीं ....भजन गीत
हे हरि,मन कछु सुमरत नाहीं।
हे हरि ,मन कछु सुमरत नाहीं।
का करिहें जग जपत बुढ़ाया
मोह माया का फेर बढ़ाया
जे असार संसार भँवर है
कहीं किनारा नाहीं।
हे हरि ,मन कछु सुमरत नाहीं।
पी॔त पाण पण पेम पराए
राग देव्श अपनों से
बहुरि भेद नहिं मिते रे मनुज के
साँच कहुँ सपने से
करनीं के फल किते मिलत है
पावो जुगत भिडाई
हे हरि, मन कछु सुमरअत नाहीं ।
कमलेश कुमार दीवान
नोटः यह भजन गीत ईश्वर की आराघना मे लिखा है, उन्हे सादर समर्पित है।

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

उगलियाँ ही उगलियौं मे गढ़ रही हैं

उगलियाँ ही उगलियौं मे गढ़ रही हैं
ऐसा क्यों?
जो लताएँ आज तक
चढ़ती थी ऊचे पेड पर
हर हरा कर टूटते
गहरे कुएँ में गिर रहीं हैं
ऐसा क्यों?
मान्यताएँ फिर हुई बूढ़ी
अन्ध विश्वासों ने बनाएँ घर
अब न मौसम बन बरसतें हैं
स्याह बादल से भयावह डर
एड़ियों पर चोटियों से जो टपकती थी कभी
बूँद श्रम की नम नयन से झर रही है
ऐसा क्यों ?
लोग कहते हैं विवशता से
दोष सारे हैं व्वस्था के
नहीं बदला रूख हवाओं ने
गर्म मौसम की अवस्था से
फिर न दोहराओ सवालो को
आग हो जाते हैं रखवारे
पीढ़ियाँ ही पीढ़ियों से चिड रही हैं
ऐसा क्यों ?
विग्य बनते हैं बहुत सारे
व्यापते हैं जब भी अंधियारे
इस लड़ाई का नहीं मकसद
हो गये हैं आज सब न्यारे
कौम, वर्ग, विकल्प और विभीषकाएँ क्या
हर नये सिध्दांत की बाते वही है
खोखली दिक् चेतना से हर शिराएँ थक गई है
ऐसा क्यों ?
कमलेश कुमार दीवान
६ जनवरी १९८८

साथ चलो, पर दोडो मत

पाश्चात्य संगीत के लिये एक गीत
suniye
साथ चलो, पर दोडो मत
साथ चलो, पर दोडो मत
गिर जाओगे ।,
हाथ से हाथ,छोडो मत
गिर जाओगे।
रेत घरों के ढ़हने से
आसूँ तो बहते हैं
सुख..दुःख ,हँसी ..खुशी दो पहलू
एक साथ सब सहते हैं।
लोग कहानी उनकी कहते
जो उनको भी भाते हैं
दूर रहा न जाये उनसे
जो सपनों में आते हैं।
चलती हुई हवाओं के तुम
साथ बहो पर मोडो मत।
साथ चलो ,पर दोडो मत
गिर जाओगे,
हाथ से हाथ,छोडो मत
गिर जाओगे।
कमलेश कुमार दीवान
१०अक्तुबर १९९६
नोटः यह गीत युवाओं के लिये लिखा है ,एक समूची पीढ़ी को आदर के साथ समर्पित है।