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Thursday, November 19, 2020

मेरे शहर के लोग.... गजल

 रहते नहीं उदास हैं ,मेरे शहर के लोग

रखते बहुत लिहाज हैं ,मेरे शहर के लोग

अपने लिवास ,बातचीत ,आतिथ्य मे मधुर
हर शख्स लाजबाब है मेरे शहर के लोग।
मंदिर है, मस्जिदें हैं गुरूद्वारे प्रार्थना घर,
हर धर्म की किताब हैं, मेरे शहर के लोग।
कोई समझ सके तो चले साथ हमारे
एक पालदार नाव है, मेरे शहर के लोग
गर्मी में शीतल छाँव है, बरसात में छाता
सर्दी में एक अलाव है मेरे शहर के लोग।
जीवन के साथ बहुत सी कठिनाईयां भी हैं
फिर भी हैं खुशमिजाज, मेरे शहर के लोग।
कमलेश कुमार दीवान
16/9/2020
होशंगाबाद म.प्र. भारत

Wednesday, November 4, 2020

चाँद कहता रहा

 चाँद कहता रहा


चाँद कहता रहा रात भर रात से 

यूँ ही चलता रहा हूँ बिना बात के 

रात में ,रात भर, कई रात से 

इन सितारों की नजरें 

जमीं पर भी रही है

रात मे रात से रात भर ।

अभी भी बहुत बची है कहानी मेरी 

मै चला था कहाँ से कहाँ आ गया 

किसी बात से रात मे रात से ।

तुम सुनोगो नहीं पर कहा तो यही

मेरे जज्बात पर कह उठा है आसमां

तुम्हे कायनात पार करना है अभी

 तुम चलो चलते ही रहो 

रात मे रात भर रात से बिना बात के

चाँद कहता रहा अँधेरो से उजियार से 

मै थका हूँ कहाँ 

रात भर रात से बिना बात के 

चाँद कहता रहा 

रात भर रात से 


कमलेश कूमार दीवान

5/2/17


 

Wednesday, October 28, 2020

"हौंसलों के आसमान"

 "हौंसलों के आसमान"


चिड़ियौ के पास क्या है 

चिड़ियों के पास जो कुछ भी है

वह पंख हैं,हौंसलें हैं

नदियाँ पर्वत,बहुत उँचाई वाले

 आसमान छूते पेड़

तालाब सागर वर्फ 

उड़ान भरने और गंतव्य पर

पहुँचने के हर्ष 

घौंसलों मे राह देखते बच्चे जब

धकियाते है परस्पर 

तब भी चोंच से चुग्गा गिरता नहीं है 

खुश रहती है चिड़िया 

जो चिड़ियौ के पास है वह बेटियौ के पास कहाँ?

उनके हिस्से आते हैं 

उजड़े हुये नीड़

कटकर उड़ती पतंगें

माँ के सपने और पिता के जज्बात्

भाई के लिये समर्पण और

 अपनो के लिये अर्पण

पंख ,हौंसले ,उड़ान और आसमान 

बेटियों के पास कहाँ हैं 

उनका सब कुछ रोजनामचे मे दफन है 

आजादी,लोकतंत्र और तिरंगा 

यही उनका .......नमन है ,जय हिंद 


*रोजनामचा ...पुलिस का रजिष्टर 


कमलेश कुमार दीवान 

3/10/2020 


Saturday, September 26, 2020

गीत....."पता चले"

  पता चले....


कुछ देर सही मिल बैठे तो

साँसो की लय का पता चले 

हम कौन कहाँ तक चल पाऍ

बाधाऍ क्या है पता चले ।


कब रूके और कब मिले प्रिय

कब बिछुड गये तँजीमो से 

सब खाली खाली उजड गये

कुछ छिपा हुआ आस्तीनो मे

कोई गैर नही ,कोई बैर नही 

फाँसो की तह का पता चले।

हम कौन कहाँ तक चल पाऍ....


हम आजादी के दीवाने

सब लोकत॔त्र के गायक है॔

ऐसा लगता है तूफाँ मे

कश्तियौ॔ को खेते बाहक है

हम धवल श्वेतवर्णी हिमकण

काले पहाड़ क्यो॔ दीख रहे

हम शाँति और अविरलता के

गण है॔ नायक और उन्नायक

यही ठौर हमारे और नही॔

बातो की शह का पता चले।

हम कौन कहां तक चल पाऍ

बाधाऍ क्या है॔ पता चले ।


कमलेश कुमार दीवान

19/9/2020

*हमारी बाधाऍ ...राजनीति,धर्म,जातिवाद,

अशिक्षा,अंधविश्वास,कुरीतियाँ आदि आदि है।

Thursday, September 24, 2020

हिंदी... यह भाषा अपनी

 हिंदी दिवस पर गीत..... यह भाषा अपनी है

हिंदी के गीत लिखे
हिंदी के मीत दिखे
प्रीति करें भाषा से
यह भाषा अपनी है।
यह भाषा अपनी है।
आज नमस्ते का युग
आया है हिन्दी से
विश्व कर रहा प्रणाम
वह भाषा हिंदी से
ओ मेरे मन के मीत
आओ गाओ रे गीत
हम भी जाएंगे जीत
यह आशा अपनी है।
यह भाषा अपनी है।
सभी देशवासियों आ हिंदी दिवस पर शुभकामनाएं।
कमलेश कुमार दीवान
14/9/2020

Saturday, June 20, 2020

मुझे थोड़ी खुशियाँ तो दो मेरे बच्चो

मुझे थोड़ी खुशियाँ तो दो

मेरे बच्चो 
इस ढलती उम्र में 
मुझे  थोड़ी खुशियाँ तो दो 
मेरे बच्चो ।
मुझे पता है 
घर के अनुशासन से 
तुम सब ऊब चुके हो 
मुझे जानकारियाँ मिल रही है कि 
हमारे ही कारण तुम सब 
अपनी अपनी दुनियां मे रम चुके हो 
ये फोन ,ये कम्प्यूटर और शोसल नेटवर्क 
सब कुछ अच्छी शिक्षा नही दे रहे हैं 
जिस तरह किताबे, दादा दादी और परिवार से 
सब कुछ मिल जाता था जो जरूरी था 
गाँव,घर ,स्कूल पड़ोस कस्बा और शहर 
सभी कूछ पहले जैसे नहीं रहे हैं 
मेरे बच्चो 
पर तुम बड़े होने के बाद भी 
 हमारे लिये बच्चे ही हो 
गृहस्थी बसाओ, घर बनाओं खुश रहो
फिर भी हमारी अपेक्षाओं मे बदलाब नही ला पाते 
मेरे बच्चो ,
चाहते है इस ढलती उम्र में 
थोड़ी सी खुशियाँ 
ताकि हम नदियों के वहाव,हवाओ के प्रवाह और 
बागो से उड़ती हुई खुशबूओं को 
महसूस कर सकें 
मेरे बच्चो 
थोड़ी सी खुशियाँ बाँटोगे 
अपार हर्ष पाओगे ।


कमलेश कुमार दीवान
27/09/2016
kamleshkumardiwan@gmail.com 

Monday, June 15, 2020

*हम सुनना चाहते हैं

*हम सुनना चाहते हैं
अब हम सुनना चाहते हैं
वही आवाज
जो सुखकर लगे
हमारे कानों को ।
हम करना चाहते हैं
वही कार्य
जो भाए मन को हाथों को
हम देखना चाहते हैं वही सब‌ कुछ
जो आते जा रहा है हमारी आंखों के सामने
हम बोलना चाहते हैं
वह सब कुछ
जो सुना किया देखा
और झेला है
किन्तु अब
कानों, आंखों, ज़ुबान और ज़ेहन
जबाव देने लगें हैं
शिराएं थकने लगी है
अब हमें सुना रहे हैं वे
जिन्होंने कभी हमारी बातों पर
कान नहीं दिया
सुनना ही पड़ेगा
कमलेश कुमार दीवान
10/07/2019

Monday, May 25, 2020

आओ बात करें ...

"आओ बात करें"

  • कमलेश कुमार दीवान
आओ बात करें अपनों से
 अपनों से, अपने सपनों से
आओ बात करें।
मोबाइल से दूर हुए हम 
लेपटॉप ने छीना है सुख 
सुनने से प्रलाप उपजा है 
पढ़ने से पहुंचा है दुःख
आओ साथ चलें अपनों के
अपने अपने सपनों के
आओ बात करें।
राहें नई उकेरे
रूकें नहीं पर थोड़ा ठहरें
फिर देखें यह नदी पहाड़ी 
जल जंगल और जीवन
चांद सितारे सूरज तारे हवा
चलेगी साथ हमारे
आओ बात करें अपने से
अपनों से , अपने सपनों से
आओ बात करें।

*यह गीत सुबह सबेरे भोपाल में प्रकाशित हुआ है
दिनांक 15/9/19

Tuesday, March 20, 2018

Kamlesh Kumar Diwan: "चिड़ियाँ रानी आना"...बच्चों के लिये गीत

Kamlesh Kumar Diwan: "चिड़ियाँ रानी आना"...बच्चों के लिये गीत: "चिड़ियाँ रानी आना"...बच्चों के लिये गीत आज विश्व गौरया दिवस है(20 मार्च)अपनी नन्ही सी प्यारी  बेटियो के लिये यह गीत लिखा और उन्...

Saturday, September 23, 2017

समय जुलाहे बता.....गीत

“समय जुलाहे बता”
समय जुलाहे बता
आज का ताना बाना
क्या है?
कौन किसे सम्मान करेगा
गरियागा कौन
कौन लिखेगा शब्द वाण से
कौन रहेगा मौन
समय जुलाहे बता
आज का रोना गाना
क्या है?
समय जुलाहे बता
आज का ताना बाना
क्या है?
सूरज तो निकला है
पर वह
लाल नहीं था
घूम गई थी धरा
मगर वह
काल नहीं था
ध्वज दिख रहे सभी
पीले ही पीले
मन लहराए कब
ऐसा हाल नहीं था
समय जुलाहे बता
आज का खोना पाना
क्या है?
समय जुलाहे बता
आज का ताना बाना
क्या है?
कमलेश कुमार दीवान
लैखक होशंगाबाद म.प्र.
10/9/17

Sunday, September 3, 2017

"तुमसे क्या छिपायें" .. .....(......

"आजादी के बाद मेरे देश मे संसदीय लोकतंत्र और बहुत बाद मे स्थानीय स्वशासन एवं पंचायती राज प्रणाली
अपनाई गई पर इस प्रकार की दोहरी तिहरी शासन प्रशासन प्रणाली से भी आजादी के समय स्वतंत्रता सेनानियो के सपनो को पूर्ण नही कर पाये है देश की अर्थव्यवस्था पर बौझ बढ़ा लोकतात्रिक संस्थाऐ एक दूसरे से पृथक कर दि गई आम चुनाव बहुत महंगे हुये सहिष्णुता भाईचारा सब कुछ तिरोहित हो गया हम नेतृत्व से बहुत आशा करते है किन्तू वह प्रशासनिक व्यवस्थाओ मे कोई सुधार नही होने के कारण मजबूर हो गये है नेतृत्व से जन अपेक्षाओं के संदर्भ मे यह गीत  प्रस्तूत है ...

लोकतंत्र का नया गान ......

 "तुमसे क्या छिपायें"

नित नये नारे ,नए उदघोष ,नव आंकाँछाएँ
हो नही सकती कभी पूरी
 ये तुमसे क्या छिपाएँ  ।

देश का इतना बड़ा,कानून है
भूख पर जिसका असर ,होता नहीं
मूल्य बदले दलदलो ने भी
क्राँति जैसे जलजलों का
अब असर होगा नहीं
और नुस्खे आजमायें ।
ये तुमसे क्या छिपाएँ।

अरगनी खाली ,तबेले बुझ रहे हैं
छातियों में उग आये स्वप्न सारे
जंगलों से जल रहे है्
तानकर ही मुट्ठियों को क्या करेगें
ध्वज पताकाएँ उठाने मे मरेगें
तालियाँ भी इस हथेली से नहीं बजती
ढोल कैसे बजाएँ।
तुमसे क्या छिपाएँ।
   
कमलेश कुमार दीवान
लेखक
होशंगाबाद म.प्र.
919425642458
kamleshkumardiwan.blogspot
kamleshkumardiwan.youtube.com

Friday, June 30, 2017

#हेलो डाक्टर#

#हेलो डाक्टर #

                ..           “ कमलेश कुमार दीवान”
क्या आप जानते है कि आपके मरीज पर्याप्त दवाई खाने के बाद भी स्वस्थ नहीं हो पा रहें हैं?मुझे लगता है कि शायद आप हाँ  नहीं कहेंगे।हमें विश्वास करना होगा कि हमारे देश के 99%व्यक्ति बीमार होने पर कई पेथी से संबधित नाना प्रकार की दवाईयाँ अपने आप सीधे दुकानों से खरीदकर सेवन करतें हैं इसमें इलाज करने वाले के साथ विज्ञापन भी सहभागी हैं।इसका एक अर्थ यह भी है कि एलोपैथिक चिकित्सा से कहीं अधिक विश्वास आयुर्वेद ,होम्योपैथी,यूनानी चिकित्सा पद्धतियों के साथ घरेलू नुस्ख मे है ।कभी कभी डाक्टर यह कहते हुए भी देखें जाते हैं कि “वह दवाई मत छोड़ना यह भी चलने दो “गजब संस्कार हैं।इस बहाने कुछ बातें जरूर साफ होना चाहिए……
1..मरीज की मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग जरूर करें ताकि आपको पता चले कि नाश्ते के पहले या बाद के लिये लिखी गई दवाई को सेवन करने हेतु उसकी नाश्ता करने की प्रवृत्ति या परम्परा है कि नहीं ?
2...अपनी तरफ से ही सभी प्रकार की जांच करवाएँ तदुपरांत ही दवा लिखें ।उसके पूर्व सामान्य दवाएं दे ताकि राहत मिले पर पैथोलॉजी जाँच प्रभावित न हो।
3...मरीजों को सुनें,देखें कि वह बीमारी से पृथक क्या बताना चाहता है ।
4...बगैर गहन जांच के दवाएं न लिखें।
धन्यवाद।
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद
30/6/177

Monday, June 5, 2017

पहाड़ हँस रहें हैं

आज 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है ।हम सभी पर्यावरण विनाश को लेकर चिंतित हैं। यह दिवस आने पर हम पेड़ लगाते आ रहे हैं पर कहाँ पेड़ पौधो का रोपड़ किया जाये यह नहीं सोचते हैं।हमारे देश मे होने वाली मानसूनी वर्षा पहाड़ों कि ऊँचाईयों के अनुसार होती है यदि हम पहाड़ो से पेड़ काटते हैं तब ऊँचाई एकदम लगभग तीस मीटर तक कम हो जाती है जिससे न केवल वर्षा वरन  भूमिगत  जल भी प्रभावित होता है । मेरी यह कविता एक आव्हन है पढ़ियेगा...


पहाड़ हँस रहें हैं
                            कमलेश कुमार दीवान

दोस्तो ये पहाड़ हम पर
हँस रहे हैं
अट्टहास कर रही है हवायें
उमड़ते घुमड़ते काले मेघ
कहर बरपा रहे हैं
और तुम........
अब भी सड़को ,नदियों के किनारें
घर आँगन चौपाल चौराहों पर
पेड़ लगा रहे हो
जानते हो नरबाई की आग ने
जला दिये है लाखों पेड़
मानना ही पड़ेगा कि पहाड़ो की हरितिमा
उतार फेकी है इस सदी ने
फिर भी तुम
पर्यावरण के गीत गा रहे हो
दोस्तो
नदियों से पहले
पहाड़ो को बचाओ
भुरभुरी रेत की ढेरी बनती
चट्टानो को बचाओं
ये पहाड़ ही हैं जिनके बीच से बहती नर्मदा
भूमिगत स्त्रोतों से रिसकर आ रहे जल से
सदानीरा जीवनदायनी है
पहाड़ पर पेड़ होंगें तब
जल और जीवन के साथ
हमारा आज और कल भी होगा
पहाड़ो को बचाओ दोस्तो
नदियों से पहले पहाड़ों और पेड़ो के गीत गाओं
यात्रा करो उन वियावानो की
जहाँ जंगलो को साफ कर दिया गया है
देखो वहाँ से कभि न दिखाई देने वाला आसमान
साफ कह रहा है कि
पेड़ पौधौ की जरूरत यहाँ हैं
उन खेतो और किनारो मे नहीं
इसलिये यहाँ आओ
पेड़ उगाओ, लगाओ और कल के लिये जल के साथ
कलकल बहती नदियाँ हवा पानी और सूख पाओ
दोस्तो सही जगह पेड़ लगाओ .
पेड़ो को लगाने की सही जगह पहाड़ ही हैं
     
कमलेश कुमार दीवान
30/5/2017
लेखक होशंगाबाद    

Tuesday, May 16, 2017

दादा जी संक्षेप मे

भारतीय किसानो की दशा पर वर्ष १९८२ मे लिखा यह गीत आज भी प्रासांगिक है ।
पहले महाजन थे आज सरकारी एवम्  निजी बैंक और उनके एजेंट है लोग समझते है कि भारत
१९४७ मे आजाद हो गया है पर हमारी आखौ के सामने वही मंजर है वही गिड़गिड़ाहट है ,फसले खराब होने
पर अन्नदाता किसान राजनीति के कदमो मे गिर रहा है अर्थात् हमने आजादी से क्या पाया है बड़े बड़ै बाजारो का तिलिस्म
समपन्नता के सपने हमे जीने नही देते है ।मेरा यह गीत एक बिचार है जो परिवर्तन की दरकार लिये है .....

दादा जी संक्षेप मे

सारी जिनगी
बीत गई है
दादा जी आक्षेप मे
और सुनाओ
बड़ी कहानी
दादा जी संक्षेप मे ।

सच बतलाओ
उसे कहाँ पर
दफनाया था
पतिता रोती रही
न उसका
पति आया था
दूर देखती रही
उसांसे भर भर कर
कैसे जीती रही
आज तक
मर मर कर
पिता आयेंगें
बिटियाँ तेरे
बाबाजी के वेष मे
दादा जी संक्षेप मे ।

जब रमुआ के बैल
हाँक ले गये महाजन
गिर गिर गई पैर पर
सुखिया बाई अभागन
छुड़ा रही थी हाथ
और वह खींच रहा था
तेरा साथी कल्लू कैसा
चीख रहा था
लाज लुटी घरबार रहन
हो गये एक आदेश मे
और सुनाओ बड़ी कहानी
दादा जी संक्षेप मे ।

कमलेश कुमार दीवान
१८ जून १९८२

   

Sunday, October 30, 2016

दीपावली 2016 पर विचार शुभकामनायें एवम् गीत .."आज हम"

दीपावली 2016 पर  विचार शुभकामनायें एवम् गीत .."आज हम"

सृष्टि मे अँधेरे का साम्राज्य है।पृथ्वी पर पृथ्वी की छाया ही दुनियाँ मे रात का अँधेरा है जिसे एक सूरज उजाले से भर देता है ।मनूष्य भी अपने अतीत की छाया से भविष्य के अंधेरों का सृजन कर डूबने लगता है तब हमारे अंर्तमन से वर्तमान के उजास प्रस्फुटित होकर पथ को आलोकित करते हैं। आओ हम सब एक दीप अपने अंर्तमन मे व्याप्त अंधेरों को दूर करने हेतु जलायें अपने पथ पर आगे बढ़े ,बढ़ते रहें । गीत है .......

""आज हम ""
आओ अंर्तमन के
दीप प्रज्जवलित करे ,आज हम
पथ पथ अँधीयारे फैले हैं
दिशा दिशा भ्रम हैं
सूरज चाँद सितारे सब है
पर उजास कम हैं
थके पके मन, डग मग पग है
भूले राह चले हम ।
आओ अंर्तमन के
दीप प्रज्जवलित करे, आज हम ।

दीपावली के पावन पर्व पर शुभकामनायें ।सभी सुख समृध्दि से परिपूर्ण रहें ।

कमलेश कुमार दीवान
30/10/2016

 

Monday, September 19, 2016

एक गीत...उड़ना चाहता हूँ

एक गीत...उड़ना चाहता हूँ

मै परो को तौलकर
खूब फैलाकर ही
उड़ना चाहता हूँ ।
जानता हूँ यह
वही आकाश है
जिसने धरा को
जन्म देकर
फिर घुमाया है ,
हवाओं से मेघ ला
वृष्टि कर
हरित आकाश ओढ़ाया है
देखने ,सुनने, समझने
और सव आत्मसात् करने
मै घरों को छोड़कर
खूब चलना चाहता हूँ ।
मै परों को तौलकर
खुब फैलाकर ही
उड़ना चाहता हूँ ।

कमलेश कुमार दीवान
23/07/15

Saturday, June 4, 2016

"बच्चो तुम सब खुश रहो "

"बच्चो तुम सब खुश रहो "
                      *कमलेश कुमार दीवान*
 बच्चो ..तुम सभी खुश रहो
सुख से अपना जीवन बिताओ
पर आने वाले दुःखों को भी पहचानो
दुःख जो अपनो से बिछुड़ने और
अपनाये हुये दूसरो से
मिलने वाले  संताप के बीच मे होते हैं
दुःख जो सपनो को पुरा होने और
उनसे अंकुरित हुये परिताप के मध्य झुलते है
अर्थात् दुःख जो दिखाई देते है
चहूँ ओर
संसार मे जीवन मे
पेड़,नदी ,पर्वतऔर आकाश मे
उन सबके बीच भी
खुश होना सीखो मेरे बच्चो
मेरे बच्चो
तुम सभी खुश रहो ,
बच्चो ...जो दुःख है
जो पल क्लाँत करते है
जो बिचार मलिनता देते है
वह सब मुझे दे दो
मे थोड़ा और
मुस्कुराना चाहता हूँ
तुम सब को खूश देखकर
मे कुछ और रमना चाहता हूँ
ये संसार रूपी नदी
शूरू होकर, बहती रहती है निरंतर...
जो तुमने बनाई है  
वे कागज की नावे ही
पार उतारती चली जायेगी अनंत तक
यह सृष्टि तुम्हारे सपनो के लिये है
यह आकाश उड़ान भरने के लिये है
बच्चो....तुम सब खुश रहो
आनंद से परिपूर्ण रहो
दुःख संताप विचार मलिनता सब
मुझे दे दो मेरे बच्चो
समय के साथ चलते हुये
मे भी उन्ही रास्तों से
कदमताल करना चाहता हूँ
मेरे बच्चो .......
तुम सभी खूश रहो
आनंद से जीवन बिताओं
पर आने बाले दुःखो को भी पहचानो ।

कमलेश कुमार दीवान
लेखक
23/05/2016
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Sunday, April 10, 2016

॥लोकगीत॥ १ थोड़ा सा समझ के " लोकतंत्र "

॥लोकगीत॥ १
थोड़ा सा समझ के

थोड़ा सा समझ के
दबइयो बटन भैया
दबइयो बटन बहना
जा मे से.......
लोकतंत्र आयेगो ।
सबके मन भायेगो।
हम सबको निबाहेगो।

जाति पाँति धर्माधरम
बात करत बड़ी बड़ी
बाँटे है देश और
घात करत घड़ी घड़ी
जीत के जो
फूलो न समायेगो ।

थोड़ा सा समझ के,
दबइयो बटन भैया
सबके मन भायेगो।
ओ भैया ,ओ बहना,
जा मे से लोकतंत्र आयेगो ।

थोड़ा सा समझ के
दबइयो बटन भैया
दबइयो बटन बहना
जा मे से लोकतंत्र आयेगो
सबके मन भायेगो
हम सबको निबाहगो ।

कमलेश कुमार दीवान
१९ अप्रेल २००९ 

Thursday, April 7, 2016

"तो अच्छा होगा " ..मानव जीवन के संबंध मे एक गीत

जिन्दगी के बारे मे हम बहुत चिंतिंत रहते है सोचते है क्या होगा कैसे बीतेगी इस संदर्भ मे मेरा यह गीत प्रस्तुत है गुनगुनाये तो अच्छा लगेगा ....

तो अच्छा होगा  ..मानव जीवन के संबंध मे एक गीत

जिन्दगी ऐसी निकल जाये
तो अच्छा होगा ।
किसी से खुशियाँ मिले
और कोई दुआयें दे
जिन्दगी ऐसी सँभल जाये
तो अच्छा होगा ।

कभी दुख भी मिले
तो हसरते भी पूरी हो
दिल के अरमान
संजोने भी तो जरूरी हो
भीगे कोरे मेरी आँखो की
तुम्हारी नम हो
निकल आये अगर आँसू
तब तुम्हारे गम हो

खुशनुमा भोर हो
दोपहरी हो
साँझ भी ऐसी ही ढल जाये
तो अच्छा होगा
जिन्दगी ऐसी ही बन जाये
तो अच्छा होगा ।
कमलेश कुमार दीवान
22/3/2016
kamleshkumardiwan.blogspot.com
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Sunday, March 20, 2016

"चिड़ियाँ रानी आना"...बच्चों के लिये गीत


"चिड़ियाँ रानी आना"...बच्चों के लिये गीत
आज विश्व गौरया दिवस है(20 मार्च)अपनी नन्ही सी प्यारी  बेटियो के लिये यह गीत लिखा और उन्हे सुनाया करता था जिससे वे खूश हो जाती थी ।छप्पर छानी तो सब गाँव मे छूट से गये किन्तु शहर के घर मे आज भी चिड़ियाये घौंसले बनाती है उनके बच्चौ की चहचहाहट से घर भरा रहता है जिससे बच्चियों की याद निरंतर बनी हुई है ।वे बाहर है कभी कहती है कि पापा चिड़िया रानी वाला गीत सुनाओं  तब समूचा बचपन एक साथ जेहन मे समा जाता है जिसे परे ढकेलना बहुत मुश्किल हो जाता है ।मुझे लगता है कि बेटीयों और चिड़ियों मे कोई अधिक फर्क नही है काश उनके भी पंख होते आकाश मे वे भी ऊँची उड़ान भर सकती पर कोई बात नहीं हवाई जहाज तो है जिनमे बचपन से काँधो पर सवार रहती बेटियाँ  उड़ रही हैं समूची पृथ्वी  और आकाश उसके साथ हैं । मेरा यह गीत विश्व गौरेया दिवस पर विश्व भर की बेटियों को समर्पित है .....

चिड़ियाँ रानी

चिड़िया रानी आना
धूल मत नहाना
छोटी सी कटोरी मे
दाना रखा है ।

छोटे छोटे पँख तेरे
सारा है आकाश
दूर दूर जाती उड़ के
आती पास पास

मेरी छप्पर छानी मे
घौंसला बनाना
चिड़ियाँ रानी आना
चिड़िया रानी आना
   कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र
3जुलाई 1993

Thursday, March 17, 2016

समय के साथ चलना

मै निवेदन के साथ यह गीत प्रस्तूत कर रहा हूँ  मित्रो सदस्यौ से अनुरौध है कि वे पढ़े और खुले मन से प्रतिक्रिया देवे ।
17/03/2016

समय के साथ चलना

हम समय के साथ
चलना चाहते है
पर समय तो हो ।

निकल आये दूर
पथ विस्मृत हुये है
क्या करे अब सुझती
मंजिल नहीं है
भीड़ अट्टहास करती
गुम हुई सड़के पुरानी
शहर को जैसे बताती थी
दादी नानी की कहानी
बहुत बदला है
ठहरना चाहते है
पर समय तो हो।

कमलेश कुमार दीवान
30/7/2015 

Thursday, March 3, 2016

पात पात झर रहे है ... गीत

पात  पात झर रहे है

पात पात झर रहे है
महके महके गात गात
रिश्तो मे अनबन है
फिर भी थोड़ी समात ।
वन उपवन बहके है
महुये की सुगंध से
फागुन के रंगो से
बांसती अनूबँध से

थोड़ी सी आस पर
बहकी सी कायनात
रिश्तो मे अनबन है
फिर भी थोड़ी समात ।

कमलेश कुमार दीवान
6 मार्च 2015
kamleshkumardiwan.youtube.com

Saturday, February 27, 2016

क्या लिखें .... क्या लिखें गीत

क्या लिखें
क्या लिखें गीत
क्यों गायें ,
गुनगुनाये क्या
जो पास था वो
चला गया सारा ।
हम जब आजाद थे
गुलामी में
लड़ गये
बेहतरी के लिये
अब ये आजादी
कहाँ हैं यारो
कि मुखाफलत हो
असलियत के लिये
क्या लिखे जीत
क्यों मनाये ,
फहरायें क्या ?
जो पास था
छला गया सारा ।
क्या लिखे गीत
क्यों गाये
गुनगुनाये क्या
जो पास था
चला गया सारा ।

कमलेश कुमार दीवान
लेखक
18/02/2016

Sunday, December 27, 2015

मेरे बच्चो ......एक कविता

मेरे बच्चो ......एक कविता

मेरे बच्चो
कुछ न दे सका तुम्हे ऐसा
जिस पर गौरवान्वित हो सकुँ
ये उदासी, नीरसता , और एकाँकीपन
मेरे ही कारण है
तुम्हारी भावनायें और
संसार की भौतिक चीजों के प्रति आकर्षण
मेरे ही कारण है
मैने अब मान लिया है कि
सारे दोष मुझमे ही है
किन्तु तुम सब भी तो थे
मेरे साथ बड़े होते हुये
देखों अपना छोटा आँगन
सीमित जगह
जहाँ खेले कुदे सुरक्षित रहे
काँधो पर सेर करते करते
हवाई जहाज से आकाश छूँ रहे हो
पर यह सही है
मैरे बच्चो
कुछ न दे सका हूँ तुम्हे ऐसा
जिस पर तुम्हे गर्व हो
अब तुम खूद हासिल करो
अच्छे दोस्त
जो नाटक के पात्र न हो
पता लगाओं  ,बनाओं
उम्दा घर जो रेतं के घरोदों की मानिंद भुर भूरे न हो
मै मेरा घर छौटा आँगन और
मेरी भागम भाग भरी नौकरी की दुनियाँ
कुछ न कूछ तो देती रही है तुम्हे
पर वह कुछ नही जो
सब चाहते है
मेरे बच्चो अब तुम सीख लो ।

कमलेश कुमार दीवान
27/12/2015

Saturday, October 24, 2015

***कुछ लोग ही तय कर रहे हैं*****

दुनियां मे कुछ लोगो  समस्त अधिकारो कानूनो और शीर्ष पदो पर काबिज होकर आबाम् को संचालित कर सब कुछ अपनी मूट्ठि मे कैद रखने की कवायद करते रहे हैं जो स्वतँत्रता और लोकतँत्र के इस दौर मे   गैरजरूरी और अनूचित है जिसके भयावह परिणाम हमारे सामने आ रहे है ।मेरी यह कविता दिशा संवाद के बुलेटि मे प्रकाशित है अनुरीध है आप भी  पढ़े और इस दौर को समझें जिसकी पृष्टभुमि मे बीता हुआ वह समय है जिसमे अमेरिका मे  क्लिंटन और सोवियत रूस मे येल्तसिन थे।
**सबके सापेक्ष मे कूछ लोग**

कुछ लोग ही तय कर रहे हैं
बहुत कुछ इस दुनियाँ के लिये
कुछ लोगो के कानो मे पीतल के टैग लगाये गये है
(क्योकि वे प्रगतिशील हैं)
कूछ लोगौ ने छाती पर गुदने गुदवा लिये है
(क्योंकि वे अपने को परम्परावादी मानते है )
कुछ लोग पूछ रहे है कि भाई तुम किस तरफ हो
कुछ लोग बाकी लोगो के लिये रबर की सील लिये दौड़ रहे हैं
क्योकि इस सदी के अंत अंत तक
तय कर देना चाहते है कि वे इस तरफ हैं या उस ओर
सच मानो आदमी सिध्द करने के खाँचे
अब नहीं बचे हैं उनके पास
जो पहले आदमी थे
आज हम तुम बैंको व्दारा ऋण मे दिये गये रेबड़ के
बैल भैस गाय भेड़ बकरी और मेमने हैं
आधुनिक बाजार मे अपने अपने निशानों से
बिकते चले जाते है सभी के सभी
कुछ लोग समूची दुनियाँ पर
आई.एस. आई.या एगमार्क जैसे निशान बनाना चाहते है
क्योकि उन्ही के पास तो तपती सलाखे हैं
गर्म करते रहने की धमनभट्टियाँ भी ।
देखो येल्त्सिन के पास लाल बटन है और
क्लिन्टन लोकतंत्र की  चावी घुमा रहे हैं
हमारे देश मे एक ही प्रधान मंत्री है
पर लोग देश का फेडरल स्ट्रक्चर समझा रहे है
दौस्तौ दुनियाँ कैसी हो?
उसमे कौन कौन हों और कौन कौन नहीं
समाज कैसे चले
औरते कैसी हों ,उसके नाखून कितने बढ़ें,कैसे रंगे जाये
कुछ ही लोग तय कर देना चाहते है
इन कुछ लोगो के सब कुछ तय कर देने से
बाकी सब,कुछ नहीं कर पा रहें है
इसलिये कुछ लोगो के पास कारखाने हैं
जिनमे बनाये जा रहें है स्टाम्प पेड रबर मोहर और टैग
चड्ढी हाफपेंट और टोपी से लेकर लाल कुर्ते तक
सिलने सिलवाने ,पहनने या दूसरो को पहनाने
या सब कुछ को उतार फेंकने का सिलसिला चल निकला है
बिल्लो को फटी कमीज पर चिपकाये रखने
छोटे छोटे सपनो को खूँटी पर टाँगे रखने
या मूँह ढाँपकर सोते रहने से
आदमी और दुनियाँ दोनो ही बदल रही है
लोगो जरा सोचो और मालुम करो कि
हिस्से मे आये जिन्दी जिन्दी नोट
बच्चो का गला फाड़ रहे नारे और देश की छाती मे छेद करते बोट
बूढ्ढो के खँसते खंखारते रहे से क्यो झड़ रहें हैं
दुनियाँ के पास बहुत कूछ है पर
हमारे पास पा सकने लायक कुछ बी नहीं
क्योंकि कुछ ही लोग हैं
जो सभी कुछ तय कर चुके है ।

कमलेश कुमार दीवान
लेखक
होशंगाबाद म.प्र
9425642458
kamleshkumardiwan.blogspot.com
kamleshkumardiwan.youtube.com
24/10 /15
 

Friday, October 23, 2015

बंजारे तू गीत न गा रे

""बंजारे तू गीत न गा रे""

बंजारे तू गीत न गा रे
बस्ती बस्ती प्यार के
बस्ती बस्ती प्यार के ।।
किसी से तेरी प्रीत नहीं है
कोई तेरा मीत नहीं है
तू तो चलता ही जाता है
मंजिल कभी नहीं पाता हैं
आजा रे तू मीत बना ले
मान और मनुहार से
बँजारे तू गीत न गा रे
बस्ती बस्ती  प्यार के
हो न सके उस यार के
बंजारे तू गीत न गा रे
बस्ती बस्ती प्यार के ।

कमलेश कुमार दीवान
लेखक
18/12/2000
kamleshkumardiwan.youtube.com

Saturday, September 5, 2015

##पाठशालाओं की तरफ लौटौ मेरे बच्चौ ##""शिक्षक दिवस के अवसर पर विद्यार्थियो को पत्र""

""शिक्षक दिवस के अवसर पर विद्यार्थियो को पत्र""
##पाठशालाओं की तरफ लौटौ मेरे बच्चौ ##

मेरे प्रिय विद्यार्थियो
आज शिक्षक दिवस है मेरे जीवन के 29 वर्ष आपके साथ बीत गये।आप सभी ने स्नेह दिया सम्मान दिया ।
 आप सभी ने ज्ञान प्राप्त कर अपनी अपनी दुनियाँ बनाई मेरे लिये स्कूल पाठशालाये या शिक्षण संस्थानईट गारे मिट्टी या सीमेंट काँक्रीट से बनाई गई दीवारे या खपरैल भर नहीं है इनमे अपने समय की जीवंतताँये है। पाठशालायें समय के साथ हमारे आसपाश और हमसे सटकर होने वाली घटनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं जो दृश्य संसार मे कभी न कभि व्यक्त होता ही है ।
हमने अभावो मे भी तुम्हे भरपूर ज्ञान दिया। जीवन जीने का ,व्यवहारिक पाठ पढ़ाया ।आपने ,समाज ने भरपूर सम्मान दिया ।सरकारो ने विद्यार्थियो के  हित मे दिये गये  सूझावो को लागू किया हम आभारी हैं। धन्यवाद ।

इस पत्र के माध्यम से  यह कहना चाहते है कि ##विद्यार्थी शिक्षक समाज और लोकतँत्र एक दूसरे के पूरक है ।शिक्षक एक प्लेटफार्म है जहाँ से कक्षा रुपी रेलगाड़ियाँ धड़धड़ाती हुई निकलती जाती है पर उस प्लेटफार्म की खूबसुरती को एकाद विद्यार्थी ही निहारता और  समझ पाता है।##

आपने कभी सोचा है कि समूची दुनियां मे कितावो का अंबार लगा होने के बाद भी शिक्षक क्यो जरूरी है ? मै समझता हूँ कि ज्ञान देने वाली किताबे हमारे दरवाजे पर लगा हुआ एक बड़ा ताला है और शिक्षक उसकी चावी है जब हम चावी का उपयोग करते है तब ज्ञान के कपाट खुलते है ।इसलिये शिक्षक की आवश्यकता है।
मेरे बच्चो अपने स्कूलो की तरफ लौटकर देखो वे अब वैसे नही रहे है ।सामाजिक माहौल पुर्ववत् नही रह गया है। शैक्षिक प्रशासन लोकताँत्रिक नही रह गया है । सब कुछ बदल गया है किन्तु हमारे शिक्षक  कमोवेश परिवर्तनो के बाबजूद वेसे ही अपने दायित्वो का निर्वहन कर रहे है ।

आपकी पाठशालाये अब भोजन शालाओ मे बदल चुकी है ।पढ़ने वाले मेधावी विद्यार्थियौ के स्थान पर कक्षाओं मे पुस्तक न बाँच सकने वाले विद्यार्थी निकल रहे है । हमारे देश मे आजादी लोकतंत्र की बयार मे पाठशालाओं, शिक्षको, विद्यार्थियों का अनिवर्णनीय योगदान है । बच्चौ ने ही तिरँगे फहराये है अपनी पीठ से क्रान्ति की सूचना वाले पोस्टर चिपकाये है ।शिक्षको ने आजादी के गीत गाँव गाँव फैलाये है।  हमारी पाठशालाओं की दरो दीवार और दरीचे इसके मूक  गवाह है ।
 आपको यह पता हो कि अमेरिका के स्व.राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन जी के पत्र की हमारे देश मे चर्चा होती है पर हमारे देश मे शिक्षको के पत्रो और प्रतिवेदनो की कोई बात नही की जाती है यह कितना दुखद है। शिक्षा के भव्य कार्यालय आनन फानन मे खड़े कर दिये जाते है  किन्तू पुर्व मे देशवाशियो व्दारा दान की जमीनो पर एकत्रित धन से निर्मित पाठशालाओ के भवन दरकते हुये जर्जर खड़े रहते है ।आज प्रशासन हर कार्य शिक्षको से ही करवाने की जुगत मे लगा रहता है और  मंशा यह है कि शिक्षको के खुन से बिजली भी बना ली जावे  उनसे मध्याँन्ह भोजन के वर्तन मंजवाये जावें उनसे ही टायलेट साफ करवाये जावे ।मैला धुलवाया जावे ।गंदगी साफ करायी जावे ।

मेरे बच्चो पढ़ लिखकर डाक्टर इंजीनियर वैज्ञानिक और कूशल कारीगर बनो पर ऐसी मशीनो की ईजाद करना जो हमारे कार्य को आसान बनाये जिससे हम समाज और संसार को बदल सके । तुम संहार करने बाले अस्त्र शस्त्रो को तरजीह मत देना मेरा अनुरौध है कि ऐसे ायध निर्मित करना जिससे फेकें गये परमाणु बम का प्रभाव पल भर मे  शून्य हो जावे ।हमे इस संसार से भूख मिटाना है गरीबी दूर करना है तुम ऐसा एँटिना बनाना जिसके व्दारा सीधे सौर्य उर्जा से जीव मात्र भिजन प्राप्त कर अपनी भूख मिटा सके । साफ सफाई के लिये स्वचालित यंत्र बनाना ।मौसम को मनोनुकूल बनाने के लिये वैज्ञानिक कवायद करना जिससे हवा पानी बादल बरसात बेहतर हो । ऐसि तकनीकी विकसित करना जिसके एक कण से अगणित वर्ष बाहन चलता रहे ऐसा रसायन बनाना जो नुकसान पहुँचाते रसायनो को शुध्द कर परिशोधित कर सके ।
मेरे बच्चो चहँऔर ऐसा वातावरण बनाना जिसमे मानव करूणा प्रेम दया ममता जैसे शाश्वत मानवीय मूल्यो से ओत प्रोत रहे ताकि यह दुनियां तन मन से स्वस्थ रहे अर्थात् संरचना करना जिससे यह सृष्टि निरंतरता को प्राप्त हो सके ।

शिक्षक दिवस पर विद्यार्थियो की दुनियाँ प्रकाशवान बने मेरे बच्चो आपके अंदर जितना भी अँधेरा है वह सब मुझे सौपकर उजाले की और बढ़ो यह दुनियाँ तुम्हारा इंतजार कर रही है।
""आप कहीं भी रहो "अपने स्कूलो की तरफ लौटो ,उन्हे देखो उन्हे अपनाओ मेरे बच्चौ आज भी तुम्हे उन पाठशालाओ की जरूरत है जहाँ से पाठ पढ़ते हये दुनियां मे ऊँचाई पर पहुँचे हो।समुन्दर को मापने के पैमाने पाठशालाओ के बगैर कितने कितने अधूरे है ।बच्चौ तुम सुन  रहे हो न "। अब कोई शिक्षक नही बनना चाहता है ।
यह गीत टिमरनी जिला होशँगाबाद म.प्र.मे सन् 1989 ..90 मे  विद्यार्थियो को प्रेरणा हेतु लिखा था ।हमे  आशाओं के सृजन का यह गीत गाते रहना है आपको समर्पित है                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               आशाओं के सृजन का गीत

ओ सूरज

ओ सूरज तुम हटो ,मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है ।

चाहे अँधियारे घिर आएँ
सिर फोड़े  तूफान
मेरी राह नहीं आयेगें
नदियों के उँचे ऊफान

ओ चँदा तुम किरन बिखेरों
तारों मे छिप जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है।

ओ सूरज तुम हटो, मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।

यह गीत टिमरनी जिला होशँगाबाद म.प्र.मे सन् 1989 ..90 मे विद्यार्थियो को प्रेरणा हेतु लिखा था ।हमे  आशाओं के सृजन का यह गीत गाते रहना है आपको समर्पित है                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                
       कमलेश कुमार दीवान                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    
शुभकामनाये सहित

कमलेश कुमार दीवान
प्राचार्य एवम् लेखक
होशंगाबाद म.प्र.
5 सितम्बर 2015
kamleshkumardiwan.blogspot.com

Thursday, August 27, 2015

.सोन चिरई आई है ...सावन गीत

सावन गीत ...सोन चिरई आई है


सोन चिरई आई है
अमुआ की डार पर
सावन के झूले
कहीं और डारना ।
सोन चिरई आई है...

माई जा आँगन मे
याद तुम्हारे संग की
भैया की काका की
दादी कै जीवन की
आँऊ मे बार बार
बाते सुन ले मन की
घर की दिवारो मे
यादें है जन जन की
न हो तार तार
होले होले बुहारना
अरजी है मेरी यही
सावन के झूले
द्वार  द्वार डालना

         कमलेश कुमार दीवान
                   3/8/13
 सावन पर बहने भुआ  अपने पीहर को कितना याद करती है यह सब्दो से वयाँ नही होता है पर कविता से..........

Friday, August 14, 2015

मुझे उस लौ की चिन्ता है


स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये है यह पर्व मंगलमय हो ।देश के नागरिक सूख समृध्दि से परिपूर्ण हो शांति और अमन चैन रहे । सभी परस्पर सम्मान बनाये रखे यही कामनाये है  ।मंगलकामनाये
मुझे दूख है कि हम सब लोग लोकतँत्र को अपनी अपनी पक्षधरता के साथ किस ओर ले जा रहे है ।हम सब जिम्मेबार है ।कम से कम आजादी के लिये परवान चढ़े बलिदानियो के सपनो को थोड़ा बहुत पुर्ण करते तो अच्छा होता।
मै अपनी बात को अपने गीतो मे कह रहा हूँ यह  गीत 10मई 1989 को लिखा था आज भी प्रासंगिक है ।
 जो आजादी के बारे मे है जरुर पढ़े ...


मुझे उस लौ की चिन्ता है  लोकतंत्र  की चिंता मे एक गीत


सुनहरे स्वपंन मे
जलकर हुए है
खाक परवाने,
मुझे उस लौ की चिंता है
जो बुझती जा रही यारो।

किसी के हाथ में
तस्वीर है कल की
कोई आँसू बहाता 
जा रहा है आज पर,
जिन्हे भ्रम हो गया
होगा ,उजालों का
वही आँगन अँधेरा 
ला रहा है,काज कर

तरसते काम को दो हाथ
उघड़ जाता है तन और मन
करें क्या हर लिवासों मे
अँधेरे ही अँधेरे है।

मुझे उस लौ की चिन्ता है
जो बुझती जा रही यारो ।

 कमलेश कुमार दीवान
  १०मई १९८९