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शुक्रवार, 14 मार्च 2014
मंगलवार, 14 जनवरी 2014
पतंग उड़ाओ
मकर सक्रांति पर्व और उत्तरायण के सूर्य आपके जीवन पथ को आलोकित करे ।सुख समृध्दि और उन्नति के नवीन मार्ग प्रशस्त करे शुभकामनाये है ।मकर सक्राति के पर्व पर शुभकामनाओ सहित मेरा यह गीत सादर प्रस्तुत है जो आपके लिये है ..
पतंग उड़ाओ
अपनी पतंग उड़ाओ
आसमान देखकर
तिल ताड़ मत बनाओ
आसमान देखकर
यूँ ही नहीं माजा से
कटती है उंगलियाँ
अपनी पतंग लड़ाओ
भाव ताव देखकर ।
जब भी उड़ाओ दूर तक
दिखती रहे पतंग
हाथों मे नियंत्रंण हो
चरखा हो संग संग
थोड़ी सी ढील से ही
घूमेगी चारो ओर
फिर देखते ही
युँ ही कट जायेगी पतंग ।
संग साथ गुनगुनाओ
आसमान देखकर
अपनी पतंग उड़ाओ
आसमान देखकर ।
कमलेश कुमार दीवान
14/01/14
अपनी पतंग उड़ाओ
आसमान देखकर
तिल ताड़ मत बनाओ
आसमान देखकर
यूँ ही नहीं माजा से
कटती है उंगलियाँ
अपनी पतंग लड़ाओ
भाव ताव देखकर ।
जब भी उड़ाओ दूर तक
दिखती रहे पतंग
हाथों मे नियंत्रंण हो
चरखा हो संग संग
थोड़ी सी ढील से ही
घूमेगी चारो ओर
फिर देखते ही
युँ ही कट जायेगी पतंग ।
संग साथ गुनगुनाओ
आसमान देखकर
अपनी पतंग उड़ाओ
आसमान देखकर ।
कमलेश कुमार दीवान
14/01/14
शनिवार, 28 दिसंबर 2013
सोमवार, 25 नवंबर 2013
मतदान दिवस
"लोकतंत्र मे जनता का मतदान करना महत्वपूर्ण है मेरा यह प्रेरणा गीत सादर समर्पित है "
मतदान दिवस
करो मतदान भाईयो
तजो अभिमान भाईयो
आज मतदान दिवस है
आज मतदान दिवस है ।
लोकतंत्र के इस उत्सब मे
हो सबकी भागीदारी
आजादी की यही मान्यता
हो सबकी पहरेदारी
आओ आज मनाये उत्सव
अधिकारो के शस्त्र का
रोजगार रोटी से लेकर
कोटि कोटि के वस्त्र का
लोकतंत्र के जन्मदिवस का
आज करे गुणगान साथियो
संविधान की मंशा के
अनुरूप करे मतदान साथियौ
करो मतदान भाईयो
तजो अभिमान भाईयो
आज मतदान दिवस है
आज मतदान दिवस है ।
कमलेश कुमार दीवान
25/11/2013
गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013
। धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
दुनियां भर मे लोकतँत्र नेतृत्व के खराब प्रर्दशन के कारण
विश्वसनीयता की कसौटी पर है जनता बार बार सरकारे बदलती है पर
परिवर्तन नही हो पाता है .आशाओं को सृजित करना जरूरी है ,मेरी यह नज्म लोकतंत्र
के लिये सादर समर्पित है .....कमलेश कुमार दीवान
धीरे धीरे निजाम बदलेगा
धीरे धीरे निजाम बदलेगा
खास बदलेगा आम बदलेगा
होते होते तमाम बदलेगा ।
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
जो कश्तियाँ फिर समुंदर की ओर आई है
जो करते रहते काफिलों की रहनुमाई है
बदल रही है फिजाएँ तो ढल रहे मौसम
उठाये रख्खो ये परचम मुकाम बदलेगा ।
धीरे धीरे पैगाम बदलेगा ।
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
अभी हवाये न जाने क्या रुख ,अख्तियार करे
निकल पड़े तो कातिल उन्ही पे बार करे
खबर है दुश्मनो को बन रही है बारूदें
चलेगी गोलियाँ जो दोस्तो पे बार करे ।
बनाये रखोगे दम खम तो काम बदलेगा
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
आज है कल वही नही रहता
जिन्दादिल जुल्म यूँ नही सहता
जो किया करते है बदनाम बस्तियो को सदा
जरा सा ठहरो उनका भी नाम बदलेगा ।
अमन की राह मे चलते रहो, चलते ही रहो
धीरे धीरे पयाम बदलेगा
गोया किस्सा तमाम बदलेगा ।
खास बदलेगा आम बदलेगा
होते होते तमाम बदलेगा ।
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
कमलेश कुमार दीवान
विश्वसनीयता की कसौटी पर है जनता बार बार सरकारे बदलती है पर
परिवर्तन नही हो पाता है .आशाओं को सृजित करना जरूरी है ,मेरी यह नज्म लोकतंत्र
के लिये सादर समर्पित है .....कमलेश कुमार दीवान
धीरे धीरे निजाम बदलेगा
धीरे धीरे निजाम बदलेगा
खास बदलेगा आम बदलेगा
होते होते तमाम बदलेगा ।
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
जो कश्तियाँ फिर समुंदर की ओर आई है
जो करते रहते काफिलों की रहनुमाई है
बदल रही है फिजाएँ तो ढल रहे मौसम
उठाये रख्खो ये परचम मुकाम बदलेगा ।
धीरे धीरे पैगाम बदलेगा ।
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
अभी हवाये न जाने क्या रुख ,अख्तियार करे
निकल पड़े तो कातिल उन्ही पे बार करे
खबर है दुश्मनो को बन रही है बारूदें
चलेगी गोलियाँ जो दोस्तो पे बार करे ।
बनाये रखोगे दम खम तो काम बदलेगा
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
आज है कल वही नही रहता
जिन्दादिल जुल्म यूँ नही सहता
जो किया करते है बदनाम बस्तियो को सदा
जरा सा ठहरो उनका भी नाम बदलेगा ।
अमन की राह मे चलते रहो, चलते ही रहो
धीरे धीरे पयाम बदलेगा
गोया किस्सा तमाम बदलेगा ।
खास बदलेगा आम बदलेगा
होते होते तमाम बदलेगा ।
धीरे धीरे निजाम बदलेगा ।
कमलेश कुमार दीवान
शनिवार, 24 अगस्त 2013
महासागर के आदेश...... सागर ने बादलो से कहा ( एक गीत)
महासागरो को स्वच्छ जल आपूर्ति पूर्व की तरह नही हो पाने के परिणामस्वरूप समुद्र
देवता शायद कुपित हो और बादलो को आदेश दे रहे है कि वहा वरसो जहा जल रूका रहता है
सूर्य देव भी अधिक ताप से उत्तरी गोलार्ध को जता रहे है अर्थात् आज समूचा जल थल और वायुमंडल
मौसम की उथलपुथल से प्रभावित हो रहा है अधिक बरसात अनेक देशो मे भयावह बाढ आ रही है तब कही अधिक तापमान से जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है ,निवेदन है कि महासागरो की और जाने वाले स्वच्छ जल की निश्चित आपूर्ति बनाये रखे ।मेरा लेख जनसत्ता मे दिनाँक23/4.1998 प्रकाशित हुआ था शीर्षक " समंदरो को भी चाहिये मीठा पानी "
इस संबंध मै यह एक गीत है .....
महासागर के आदेश
सागर ने बादलो से कहा
जाओ धरा पर
बरसा हुआ पानी जहाँ
ठहरा हुआ मिले ।
सब तार तार हो रहा है
मेरा आशियाँ
बहती हुई नदी से
नही पा रहा हूँ जल
सूरज की शिकायत है
कि उठती नही है भाप
कैसे बनाऊँ बादलो को
सोचता हर पल ।
मे तरसता रहा
एक नदी के लिये
सव ने पानी चुराया
आदमी के लिये
इसलिये चाहता जाके
बरसो वहाँ
जहाँ वर्षा हुआ पानी
ठहरा मिले ।
सागरो ने कहा
बादलों से यही
जाओ वरसो जहाँ
पानी ठहरा मिला ।
देवता शायद कुपित हो और बादलो को आदेश दे रहे है कि वहा वरसो जहा जल रूका रहता है
सूर्य देव भी अधिक ताप से उत्तरी गोलार्ध को जता रहे है अर्थात् आज समूचा जल थल और वायुमंडल
मौसम की उथलपुथल से प्रभावित हो रहा है अधिक बरसात अनेक देशो मे भयावह बाढ आ रही है तब कही अधिक तापमान से जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है ,निवेदन है कि महासागरो की और जाने वाले स्वच्छ जल की निश्चित आपूर्ति बनाये रखे ।मेरा लेख जनसत्ता मे दिनाँक23/4.1998 प्रकाशित हुआ था शीर्षक " समंदरो को भी चाहिये मीठा पानी "
इस संबंध मै यह एक गीत है .....
महासागर के आदेश
सागर ने बादलो से कहा
जाओ धरा पर
बरसा हुआ पानी जहाँ
ठहरा हुआ मिले ।
सब तार तार हो रहा है
मेरा आशियाँ
बहती हुई नदी से
नही पा रहा हूँ जल
सूरज की शिकायत है
कि उठती नही है भाप
कैसे बनाऊँ बादलो को
सोचता हर पल ।
मे तरसता रहा
एक नदी के लिये
सव ने पानी चुराया
आदमी के लिये
इसलिये चाहता जाके
बरसो वहाँ
जहाँ वर्षा हुआ पानी
ठहरा मिले ।
सागरो ने कहा
बादलों से यही
जाओ वरसो जहाँ
पानी ठहरा मिला ।
बुधवार, 7 अगस्त 2013
सावन गीत ... सोन चिरई आई है
सावन गीत ... अरजी है मेरी
सोन चिरई आई है
अमुआ की डार पर
सावन के झूले
कहीं और डारना ।
सोन चिरई आई है...
माई जा आँगन मे
याद तुम्हारे संग की
भैया की काका की
दादी कै जीवन की
आँऊ मे बार बार
बाते सुन ले मन की
घर की दिवारो मे
यादें है जन जन की
न हो तार तार
होले होले बुहारना
अरजी है मेरी यही
सावन के झूले
द्वार द्वार डालना
कमलेश कुमार दीवान
3/8/13
सोन चिरई आई है
अमुआ की डार पर
सावन के झूले
कहीं और डारना ।
सोन चिरई आई है...
माई जा आँगन मे
याद तुम्हारे संग की
भैया की काका की
दादी कै जीवन की
आँऊ मे बार बार
बाते सुन ले मन की
घर की दिवारो मे
यादें है जन जन की
न हो तार तार
होले होले बुहारना
अरजी है मेरी यही
सावन के झूले
द्वार द्वार डालना
कमलेश कुमार दीवान
3/8/13
रविवार, 9 जून 2013
लो आई गर्मियाँ
विछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ ।
लो आई गर्मियाँ ।
सुर्ख ,कोमल,लाल पखुरियाँ
लिए रहती,
अनेकों तान छत वाली
बहुत ऊँची,
गगन छूती डालियाँ
खिल उठी हैं
हो के मतवाली।
छा गई मैदान पर,
रक्तिम छटाएँ
चलो नंगे पाँव तो,
वे गुदगुदाएँ
खदबदाती सी खड़ी
वेपीर लगती है,
खुशी के पल भरा पूरा
नीड़ लगती हैं।
ग्रीष्म भर उड़ती रहेगीं रेशे ..रेशे
जो कभी विचलित,
कभी प्रतिकूल लगती है।
विछ गयें हैं शूल,
तन...मन के
लो आई गर्मियाँ ।
विछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ ।
कमलेश कुमार दीवान
१० मार्च २००८
नोटःः यह गीत ग्रीष्म ऋतु मे सेमल के पेड़ के फूलने फलने
और बीजों को लेकर उड़ते सफेद कोमल रेशों के द्श्य
परिस्थितियों पर लिखा गया है ।
अनुभूति मे नवगीत की पाठशाला मे प्रकाशित
शुक्रवार, 24 मई 2013
एक अकेला हंस
एक अकेला हंस
एक अकेला हंस
युगो से
सैर कराता रहा काग को
पर कौऔ ने
डींग हाँकना
जारी रख्खा है ।
रोज बताते
नये तरीके
ऐसे हम उडान भरते है
कभी पँख फैला देते है
और सिमट गोता भरते हैं
जब बारी आती उडान की
पीठ हँस की बैठ लिये है
करते मानसरोवर यात्रा
क्रम अब भी
जारी रख्खा है ।
एक अकेला हंस...
कमलेश कुमार दीवान
२२।०५।१३
गुरुवार, 11 अप्रैल 2013
नव वर्ष गीत आओ नव वर्ष
नव वर्ष गीत
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन।
खुश हो सब
सुखी रहें
हो अभिनंदन ।।
आओ नव वर्ष....
काल की कृपा होगी
सारे सुख पायेगें
पीकर हम हालाहल
अमृत बरसायेगें ।
धरती गुड़..धानी दे
पर्वतों पर पेड़ रहें
रेलो मे सड़को पर
हम सबकी खेर रहें।
माँग मे सिंदूर रहे
भाल पर तिलक चंदन
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन ।
नूतन वर्ष मंगलमय हो ।शुभकामनाओ सहित..
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
kamleshkumardiwan.youtube.com
॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥
भारतवर्ष के नव संवत् विक्रम संवत् २०७०
गुड़ी पड़वा चैत्र शुक्ल प्रथम के पावन पर्व पर
शुभमंगलकामनाएँ है। देशवाशियों को यह गीत
सादर समर्पित है......
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नक्षत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति वरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
चैत्र शुक्ल एकम् संवत् २०७०
बुधवार, 27 मार्च 2013
होली के रंग
होली के रंग
होली के रंग छाँयेगे
कोई न हो उदास ।
मौसम ही सब समायेगे
कोई न हो उदास ।
नदियाँ ही रँग लाई हैं
तितली के पँखों से
ध्वनियाँ मधुर सुनाई दें
पूजा के शँखो से
पँछी भी चहचहायेगे
आ जाये आस पास ।
होली के रँग छायेगे
कोई न हो उदास ।
पुरवाईयो ने बाग बाग
पात झराये
बागो से उड़ी खुशबूओं ने
भँबरे बुलाये
अमिया हुई सुनहरी
मौसम का है अंदाज ।
बोली के ढँग आयेगें
कोई न हो उदास ।
होली के रँग छाँयेगे
कोई न हो उदास ।
कमलेश कुमार दीवान
26/02/10
मंगलवार, 13 नवंबर 2012
गुरुवार, 1 नवंबर 2012
बंदे मध्य प्रदेश
बंदे मध्य प्रदेश
बंदे मध्य प्रदेश ।।
चम्बल केन ,सोन नर्मदा
विन्ध्य सतपुड़ा कैमूर सर्वदा
मालवा निमाड़ प्रदेश
बंदे हृदृय प्रदेश ।
बंदे मध्य प्रदेश ।।
हरित आवरण
उज्वल नदियाँ
उपजाऊ मैदान
गाँव गाँव और
शहर शहर हैं
भले भले इन्सान
रीति निति के
कर्ता धर्ता
बसते है इस देश।
बंदे मध्य प्रदेश ।।
यह स्वरचित गीत प्रदेश को सादर समर्पित है।।
कमलेश कुमार दीवान
शनिवार, 11 अगस्त 2012
श्री कृष्ण के लिये एक प्रार्थना गीत सादर समर्पित है "श्याम मोरे श्याम मोरे श्याम मोरे (प्रार्थना भजन)
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व
जो अनादि है,अजन्मा है ,अनंत आकाश का सृजनकर्ता एवम् नियंता है उसके स्वरूप मे
श्रीकृष्ण भगवान का जन्म कंस के कारगार मे दिन व्यतीत करते हुये देवकी॑-बसुदेव जी
की याद दिलाते है उनकी परिस्थितियाँ हमे जीवन संघर्षों की प्रेरणा देती है ।
लोकतंत्र ,समाज और अर्थव्यवस्थाओं सहित शासन व्यवस्थाओं की जो चुनौतियाँ
आधुनिक सभ्यताओं के समक्ष आ रही है उससे हमे लगता है कि भारतीय समाज को पशुपालन
की तरफ लौटना होगा ,तभी हम समृध्द बने रह सकते हैं ।
श्री कृष्ण के लिये एक प्रार्थना गीत सादर समर्पित है "श्याम मोरे श्याम मोरे
श्याम मोरे (प्रार्थना भजन)
श्याम मोरे ,श्याम मोरे ,श्याम मोरे
फिर तुझे आना पड़ेगा
फिर तुझे आना पड़ेगा ।
आज फिर मीरा को
विष देकर ,सुधारा जा रहा है
द्रोपदी के चीर से ,
पर्वत बनाया जा रहा है ।
सूर,उद्वव,नँद-जसुमति
देवकी बसुदेव सब है
पर बहुत है कंस,
फिर कारां बनाया जा रहा है ।
रूख्मणि -राधा अकेली
गोपियों की बँद बोली
ओ कन्हैया कालिया वध
के लिये आना पड़ेगा ।
श्याम मोरे,श्याम मोरे,श्याम मोरे
फिर तुझे आना पड़ेगा
फिर तुझे आना पड़ेगा।
कमलेश कुमार दीवान
21/09/1998
सोमवार, 30 जुलाई 2012
सावन आये रे सावन आये रे
रक्षा बँधन का पावन पर्व हमे निर्मलता प्रदान करे ,ताकि
हम लोकतंत्र, भारतीय संस्कृति और समाज के साथ साथ
पारिवारिक जीवन मूल्यो के प्रवाह को बनाये रखने मे समर्थ
हो सके ।
शुभकामनाओ सहित
स्वरचित गीत आप सभी को सादर समर्पित है..
सावन आये रे
सावन आये रे....
बादल बिजुरी और हवायें
घिर आये घनघोर घटाएँ
घन बरसाएँ रे...
सावन आये रे....।
सरवन के कच्चे धागों से
बहना करे श्रृंगार भाई का
जग जाने भारत की रीति
मूल्य जाने बहना कलाई का
सब मन भाये रे.....
सावन आये रे ...।
कमलेश कुमार दीवान
24/08/2010
होशंगाबाद म.प्र.
रविवार, 29 जुलाई 2012
जनसंख्या शिक्षा पर कविता
छोटा सा आशियाँ
आओ एक छोटा सा
आशियाँ बनाये ।
आओ एक छोटा सा
आशियाँ बनाये ।
भीड़ भरी सड़को पर
चलना दुश्वार है
रेलो की छत पर भी
आदमी सवार है
पानी की धार नही
रोटी रोजगार नही
छोटे से आँगन की
भूमिका बनाये
आओ एक छोटा सा
आशियाँ बनाये ।
कमलेश कुमार दीवान
नोट॥.....यह कविता सन् १९९२ मे शासकीय शिक्षण महाविद्यालय खंड़वा म.प्र.मै आयोजित कविता प्रतियोगिता के अवसर पर छात्राध्यापक के रूप मे सुनाई थी ।
रविवार, 25 मार्च 2012
कुछ तो अच्छा है
साधु भाई..... ,
कुछ तो अच्छा है
साधु भाई ,कुछ तो अच्छा है ।
दिन है और रात होती है
धरती पर जीवन ज्योति है
मौसम और रिश्ते बदले हैं
आपस मे बाते होती है
समय बावस्ता है
साधु भाई ....,
कुछ तो अच्छा है ।
कल के काम आज करना है
क्षण जीना क्षण क्षण मरना है
कठिन परीक्षा है
साधु भाई सब कुछ अच्छा है ।
कमलेश कुमार दीवान
18/12/2011
गुरुवार, 8 मार्च 2012
बुधवार, 29 फ़रवरी 2012
रविवार, 5 फ़रवरी 2012
आओ प्रगति करे हम
आओ प्रगति करे हम ...
धरा छोड़ आकाश ओर
जाने से क्या होगा
बेघरवार न जाने कितने
भुवन बशाने से क्या होगा .
आओ प्रगति करे हम....।
आओ प्रगति करे हम ....
खेतो को धानी चुनर दो
पर्वत को पेड़ों से ढक दो
पक्षी करें पेड़ पर कलरव
नदियों मे पानी बहने दो
खेले म्रगछौने घर घर मे
ऐसी गति करे हम
आओ प्रगति करे हम ...।
कमलेश कुमार दीवान
1/5/2010
रविवार, 29 जनवरी 2012
गुरुवार, 12 जनवरी 2012
ॠतु गीत ..शीत
सर्द हवाएँ
अबकी बार,बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को ।
लौटी सर्द हवाओं को ।
काँप गई थी ,धूँप
चाँदनी कितनी शीतल थी
नदियाँ गाढी हुई
हवाएँ बेहद विचलित थी।
व्यर्थ हुये आलाव
आँच के धीमे होने से
फसलें ठिठुरी और फुगनियाँ
सहमी ..सहमी सी ।
अबकी बार बहुत दिन सहते
रहे विवाई पावों की।
अबकी बार बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को।
लौटी सर्द हवाओं को।
कमलेश कुमार दीवान
८ जनवरी ९५
सर्द हवाएँ
अबकी बार,बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को ।
लौटी सर्द हवाओं को ।
काँप गई थी ,धूँप
चाँदनी कितनी शीतल थी
नदियाँ गाढी हुई
हवाएँ बेहद विचलित थी।
व्यर्थ हुये आलाव
आँच के धीमे होने से
फसलें ठिठुरी और फुगनियाँ
सहमी ..सहमी सी ।
अबकी बार बहुत दिन सहते
रहे विवाई पावों की।
अबकी बार बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को।
लौटी सर्द हवाओं को।
कमलेश कुमार दीवान
८ जनवरी ९५
सोमवार, 9 जनवरी 2012
इन्हे नहीं होना चाहिये था
कमलेश कुमार दीवान
हम सोचते रह जाते हैं
क्या क्या होने और कुछ भी नहीं रहने के बीच से
गुणा भाग कर रास्ते बनाते बनाते
सन्नाटो और वियावानों मे खेत रह जाते हैं।
मेरी समझ से इन्हे होना ही चाहिये था ....
बच्चो और माओं को ताई और धायों को
किस्सो कहानियों को राजा और रानियों को
परियों राजकुमार राक्षस के त्रिकोण बनाती बूढ़ी बाईयों को
यदि इन सबसे अलहदा भुआ,संसार के चित्र
बचपन मे ही नहीं दे जाती
तब गुड्डे गुड़ियो मे सिमट आई बड़ी दुनियाँ
सपनो मे भी जरा सी रह जाती ।
पगडंडियो ,कच्चे पक्के मार्गो,कारबाँ पथों को
ऊबड़ खाबड़ पहाड़ ,घाटियों मैदानो घौड़ा जुते रथो को
होना ही चाहिये था ,
पछुआ पुरवाई के साथ पालदार नौकाओं को
मेगलन,बेसपुक्की,कोलम्बस की शानदार यात्राओं को
होना ही चाहिये था ।
हमने जब जब भी रेगिस्तानो को पार कर आबादी बढ़ाई है
सागर को नापकर ,आसमान तक मे अपनी चक्करघिन्नी लगाई है
दुनिया और बड़ी होती गई है ,
नील,दजला.फरात,मीनाँग मीकाँग
सिन्धु गंगा,ह्वाँगहो यांगतीसीक्याँग आदि नदियाँ
मानव सभ्यताओं के पालने नहीं रह गई है
तकनीकी के जादू और बारूदी उगलियों पर नाचती इतराती दुनियाँ
आज भी बची रह सकती है बस
साम्राज्य बनाने ,फैलाने उन्हे बचाये रखने के सपने न हों
बहुत कुछ है ढिर भी
पिता की ऊगलियों को छोड़कर
रास्तो से दौड़ पड़ते बच्चो के लिये गुजाइश नहीं है
कि बह काधों से उतर समा सके
जानी पहचानी गोद मे,
उफ ये भीड़ भरी सड़कें ,पालदार नौकाएँ
ये कारबाँ मार्ग,नक्शे और दिशायें
बाहर का रास्ता दिखाती पगडंडियाँ ,
आदमी को
घनी बसी आबादियो के जंगल मे ले जाती है ,
इन्हे नहीं होना चाहिये था ।
कमलेश कुमार दीवान
जनवरी 1997
रविवार, 1 जनवरी 2012
नव वर्ष गीत
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन।
खुश हो सब
सुखी रहें
हो अभिनंदन ।।
आओ नव वर्ष....
काल की कृपा होगी
सारे सुख पायेगें
पीकर हम हालाहल
अमृत बरसायेगें ।
धरती गुड़..धानी दे
पर्वतों पर पेड़ रहें
रेलो मे सड़को पर
हम सबकी खेर रहें।
माँग मे सिंदूर रहे
भाल पर तिलक चंदन
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन ।
नूतन वर्ष मंगलमय हो ।शुभकामनाओ सहित..
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
सोमवार, 26 दिसंबर 2011
शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011
आकाश छोटा
रहम की बस्ती मे आये
जलजले इतने बड़े थै
कि हुआ आकाश छोटा ।
सब पता था इन हवाओं को,
सिरफिरे तूफान को
उसने न टोका ।
कि हुआ आकाश छोटा ।
रेत के घर को हिमालय मानते थे
ईट गारे को शिवालय जानते थे
एक बड़ा जल से भरा गढ्ढा,सागर हुआ था
एक झरने को नदी सा जानते थे
बहम की किश्ती मे आए
महकमें इतने बड़े थे
कि हुआ आभास थोथा ।
कि हुआ आकाश छोटा ।
कमलेश कुमार दीवान
२५ मार्च १९०६
रविवार, 2 अक्टूबर 2011
बुधवार, 31 अगस्त 2011
रविवार, 28 अगस्त 2011
रविवार, 31 जुलाई 2011
सींच रहा कोई
सींच रहा कोई
मंद पवन मुस्काये
मेघ नेह गीत गाये
शीतल जल बूँद बूँद मारे फुहार रे
सींच रहा कोई मन द्वार रे ।
अँखियो और आंगन मे
सपने ही सपने है
दूर से बटोही भी
लगते है अपने ही
भीगते नहाते
आर पार रे
सींच रहा कोई
मन द्वार रे ।
कमलेश कुमार दीवान
गुरुवार, 7 जुलाई 2011
दादा दादी रहे नही अब
दादा दादी रहे नही अब
दादा दादी
रहे नही अब
न निम्बूँ का पेड़ ,
ढोर बछेरू ,बाड़ा बागुड़
न खेतो की मेड़ ।
सुखुआ भैया
छोड़ काम को
पहुँच गया परदेश
गांव के आधे घर सूने है
कैसे रहे विदेह ।
बेटा बेटी
बसे विदेशवा
न झूला न टेर
गीत गालियाँ और भुजलियाँ
न बँडा न बेर ।
दादा दादी
रहे नही अब
न निम्बूँ का पेड़ ।
कमलेश कुमार दीवान
30/07/09
मंगलवार, 19 अप्रैल 2011
समाचार है खेत जले है खड़ी फसल वाले
समाचार है
समाचार है
खेत जले है
खड़ी फसल वाले ।
पड़ी फसल वाले ।
बस्ती उजड़ी
और छिने है
मुँह के निबाले
खड़ी फसल वाले ।
नरवाई मे आग लगी
तो कई बहाने से
क्या मशीन का दोष
या कि फिर बीड़ी चूल्हे से
बिजली की चिंगारी से या
कोई करता घात
रहा नही विश्वास परस्पर
एक दूजे की बात ।
ओ किसान के पुत्र
समझ लो
पशुचारे का मोल
कोई नही तुम्हारे ये सब
साख रहे है तौल
इसी भूमि से
पशुओ के पेट पले है ।
समाचार है
खेत जले है ।
पड़ी फसल वाले
खड़ी फसल वाले ।
कमलेश कुमार दीवान
नोट..यह गीत भारत मे म.प्र के होशँगाबाद जिले मे
गेहूँ की खड़ी फसल जलने की घटनाओ पर है ।किसानो से अनुरोध है कि एकल फसल प्रणाली के अतिरिक्त मिश्रित फसल प्रणाली और
पशुपालन के लिये भी विचार करेँ
शनिवार, 16 अप्रैल 2011
अखबारो मे
अखबारो मे
अखबारो मे आम हुये है
खास खास चरचे
खास खास चरचे ।
दीवारो पर लिखे इबारत
अबकी बारी इनकी हैं
ढोल मढ़ैया ,चौसर चंका
सारी बाजी इनकी है
हरकारो के दाम हुये है
सड़को पर पर्चे ।
खास खास चरचे ।
कीमत बढ़ी आसमानो सी
सुलतानो के होश उड़े
दरबारी को नींद न आई
रहे ऊँघते खड़े खड़े
लोकतंत्र मे आई खराबी
फिर जनता पर दोष मढ़े
द्वार द्वार बदनाम हुये है
दौलत और खर्चे ।
खास खास चरचे ।
अखबारो मे आम हुये है
खास खास चरचे
खास खास चरचे ।
कमलेश कुमार दीवान
दिनाँक २७ । १०। १९९८
मंगलवार, 5 अप्रैल 2011
भारतवर्ष के नव संवत् विक्रम संवत् २०६८
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नक्षत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति वरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नक्षत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति वरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
सोमवार, 4 अप्रैल 2011
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
करें बँदना
मैया तोरी ।
रहे सब सुखी
हो समृध्दशाली,
बहू बेटियाँ
हों सौभाग्य वाली।
यही अर्चना
मैया मोरी ।
करे बँदना मैया तौरी।
करे कामना जो
माँ शेरों वाली
तेरे दर से कोई न
जा पाये खाली
यही प्रार्थना है
मैया मोरी ।
करे बँदना ,मैया तोरी ।
कमलेश कुमार दीवान
अध्यापक एवम् लेखक
24/09/2009
होशंगाबाद म.प्र. मो.91+9425642458
email..kamleshkumardiwan.yahoo.com
बुधवार, 23 मार्च 2011
ऐसे फागुन आये
ऐसे फागुन आये
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ ।
जो न गाऍ गीत,गऐ हो रीत
खूब बतियाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
दरक गई है प्रीत परस्पर
ढूढै मिले न मन के मीत
हारे हुये ,समय के संग संग
कहां मिली है सबको जीत।
दुख सुख साथ साथ चलते हैं
हम सबको ललचाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
नये सृजन हों, नव आशाऍ
नये रंग हों नव आभाऍ
नया समय है ,नव विचार से
पा जाये हम नई दिशाये
कोई न छूटे सँगी साथी
साथ साथ चल पाये ..
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
कमलेश कुमार दीवान
१० मार्च ०९
बुधवार, 16 मार्च 2011
होली के रंग
होली के रंग
होली के रंग छाँयेगे
कोई न हो उदास ।
मौसम ही सब समायेगे
कोई न हो उदास ।
नदियाँ ही रँग लाई हैं
तितली के पँखों से
ध्वनियाँ मधुर सुनाई दें
पूजा के शँखो से
पँछी भी चहचहायेगे
आ जाये आस पास ।
होली के रँग छायेगे
कोई न हो उदास ।
पुरवाईयो ने बाग बाग
पात झराये
बागो से उड़ी खुशबूओं ने
भँबरे बुलाये
अमिया हुई सुनहरी
मौसम का है अंदाज ।
बोली के ढँग आयेगें
कोई न हो उदास ।
होली के रँग छाँयेगे
कोई न हो उदास ।
कमलेश कुमार दीवान
26/02/10
रविवार, 6 मार्च 2011
मै जानता हूँ यह बजट नहीं है
मै जानता हूँ यह बजट नहीं है
मै जानता हुँ,तुम जरूर आओगे
अपनी बगल मे दबाए कुछ दस्तावेजो के साथ
लगभग दर्जन भर कटौतियाँ होंगी और
एक -आद कल्याणकारी योजना
सौ पचास पाँच सौ हजार के नये नोट छापने और
एक आद अंको के सिक्के आयात करने की घोषणाओ के साथ
सब कुछ मिलेनियम होगा पर........
शायद कटे फटे टुकड़ों मे मुड़े तुड़े नोट खूब चलैगें
ढेर सारी रियायतें ,सपनों को पूरा करने की कवायदें हो्गी पर
शायद नहीं होंगी गूँजाइश उन पैबँदों के लिये
जिन्हे आबादी अपनी कमीज पर चिपकाकर तन ढँक सके।
कूछ मेजें हैं जो थपथपायी जाती रही है ..आजादी के बाद से
कुछ कोने हैं जहाँ से शर्म शर्म के नारे गूँजते हैं ...आजादी के बाद से
तुम्ही बताओं इस देश ने
बच्चों के आँगन कहाँ छिपा लिये है
युवाओं के सपने किसकी आँखों मे भर दिये है
सुनो दहकते पलाश के रंगों की आभाएँ
फैल रही है जुआघर मे तब्दील हो चुके शेयर बाजारों मे
सटोरियों,दलालो नव दौलतियों की कोठियाँ
उद्योगपतियों के शाही उद्यान
बड़ी कम्पनियों के कारोबारी परिसर
सब कुछ विराट हुये है मुगल गार्डन से पर
शायद आम आदमी के पास अब बसंत नही है
फिर भी तुम जरूर आओगे बसंत
इस जाती हूई बहार मे खुशगबार कुछ नही होता है
एक आद खिलखिलाते हैं,सारा जंगल रोता है
मै जानता हूँ ये बसंत
ये कागज हैं कोई मौसम नहीं हैं
यहाँ सब कुछ जो दिखाई दे रहा है
वह बजट नही है ।
कमलेश कुमार दीवान
28/02/2000
शनिवार, 26 फ़रवरी 2011
बसंत बजट और हम
बसंत बजट और हम
मै जानता हूँ बसंत,
तुम जरूर आओगे
हर बार की तरह
लगभग हर तरफ बिछ जाती है
पीली पड़कर गिरती उड़ती पत्तियाँ
लगभग हर तरफ उठता है धुँआ
और बाड़ो से छनकर फैलती है एक गंध
जो नथुनो मै समाती हुईदहका जाती है
अंदर तक पल रहे बीहड़ उजाड़ वनों को ।
ओह! बसंत
तुम फिर फिर सुलगाओगे ,
हर बार जलाओगे
लगभग हर ओर से बुझते हुये मन को ,
अपनी आभाएँ बिखेरते
दहकते ,अकेले खड़े रहते पलाश
जंगल मे होते हुये भी हमारे दिल मे है
जो प्राकृतिक बजट के साथ
फूलते फलते ,झरते ..खिरते जाते हैं
बसंत आने से उधर वन सहमते है
बजट आने से इधर मन थरथराते हैं
समझ नही आता कि आखिर क्यों दोनो
साथ साथ आते है ।
मैं जानता हूं बसंत
तुम जरूर आओगे
हर बार की तरह
तुम, फिर फिर सुलगाओगे
हर बार जलाओगे
क्योकि तुम्हे आना है उन सपनो को रौंधने
जो उसनींदे युवाओं के अन्दर महक रहे है
ये महुये के फूल, तेदूये पत्ते आँवले अचार
और वनो की बहार
सब कि सब बजट हो गई है
जो कटौतियाँ लाती है
निर्जीव मेजे पितवाती है ,
किसी बच्चे की पीठ ठोकने के अवसर
जाने कबके हिरा गये है
ये *नासमिटे बजट और *धुआँलिये बसंत फिर फिर आ जाते
*नासमिटे और धुआलिये ग्रामीण क्षैत्रौ मे माँ द्वारा दी जाने वाली मीठी झिड़कियाँ है।
कमलेश कुमार दीवान
15/38 मित्र विहार कालोनी
सिविल लाइंस मालाखेड़ी रोड होशंगाबाद (म.प्र)
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
बसंत के बारे मे
बसंत के बारे मे
ऐसे बसंत आये।
ऐसे बसंत आये।
मौसम हो खुशुबगार
और पँछी चहचहाये ।
नदिया बहे और खेतों मे
धानी चुनर लहराये।
ऐसे बसंत आये ।
ऐसे बसंत आये ।
कमलेश कुमार दीवान
27/11/09
शुक्रवार, 7 जनवरी 2011
नव वर्ष गीत
नव वर्ष गीत
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन।
खुश हो सब
सुखी रहें
हो अभिनंदन ।।
आओ नव वर्ष....
काल की कृपा होगी
सारे सुख पायेगें
पीकर हम हालाहल
अमृत बरसायेगें ।
धरती गुड़..धानी दे
पर्वतों पर पेड़ रहें
रेलो मे सड़को पर
हम सबकी खेर रहें।
माँग मे सिंदूर रहे
भाल पर तिलक चंदन
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन ।
नूतन वर्ष मंगलमय हो ।शुभकामनाओ सहित..
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन।
खुश हो सब
सुखी रहें
हो अभिनंदन ।।
आओ नव वर्ष....
काल की कृपा होगी
सारे सुख पायेगें
पीकर हम हालाहल
अमृत बरसायेगें ।
धरती गुड़..धानी दे
पर्वतों पर पेड़ रहें
रेलो मे सड़को पर
हम सबकी खेर रहें।
माँग मे सिंदूर रहे
भाल पर तिलक चंदन
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन ।
नूतन वर्ष मंगलमय हो ।शुभकामनाओ सहित..
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
हमे कुछ करना चाहिये
हमे कुछ करना चाहिये
जब भी हम उदास होते हैं
अपने हालात पर लिखते हैं,कविताएँ
गाते गुनगुनाते है,कोई मनपसंद गीत
या फिर चलते चले जाते है उस ओर
जहाँ रास्तो मे मंजिले नही होती
नहीं होते है घर,शोर मचाते बच्चे
लोरियाँ सुनाती धाँय माँ,
कहानियाँ कहती दादी नानी
किस्से हाँकते बाबा और बचपन के दिन
सब पास और अधिक पास आ जाते हैं
तब लगता है ,हमे कुछ करना चाहिये ।
हम जो चाहते हैं वह यही है कि.....
नदियाँ तालाब पोखर या समुंदर के किनारे जाएँ
फेके उनमे पतली चिप्पियाँ और छपाक उछलती कूद गिनें
कुये के पाट पर जाये ,उनमे ढूँके,बोम मारे
फैक दे बड़ी सी ईट और सुने धमाक।
अमियाँ तोड़े या डाली
या पेड़ों पर चढकर झूले और कूद पड़े
बागों से चुने फूल या निहारे खूबसूरती
माली की प्रशंसा मे गीत लिखे या खाये गाली
सच तो यही है कि हम
करना चाहते बही सब कुछ जो करते रहे है पर
ओहदों की याद,शहर की आदतें और
उत्तर आधुनिक समय
हाँक रहा होता है हमें
तब लगता है
हमे कुछ और करना चाहिये
उनमे से कुछ होती है..
बड़े होते बच्चों पर झिड़कियाँ
नौकरी पर जाती औरतो पर फिकरे
खाँसते..खखारते पिता पर ताने और
बर्तन माँजती माँ..बीबी पर टिप्पणियाँ
भाई बहन के लिये उलाहनें
बचे हुये लोगो के लिये लानत ..मनालत
हम यही सब तो करते हैं
जो नहीं करना चाहिये ,फिर भी.
क्या हमे कुछ करना चाहिये ?
कमलेश कुमार दीवान
१७ अप्रेल २००५
जब भी हम उदास होते हैं
अपने हालात पर लिखते हैं,कविताएँ
गाते गुनगुनाते है,कोई मनपसंद गीत
या फिर चलते चले जाते है उस ओर
जहाँ रास्तो मे मंजिले नही होती
नहीं होते है घर,शोर मचाते बच्चे
लोरियाँ सुनाती धाँय माँ,
कहानियाँ कहती दादी नानी
किस्से हाँकते बाबा और बचपन के दिन
सब पास और अधिक पास आ जाते हैं
तब लगता है ,हमे कुछ करना चाहिये ।
हम जो चाहते हैं वह यही है कि.....
नदियाँ तालाब पोखर या समुंदर के किनारे जाएँ
फेके उनमे पतली चिप्पियाँ और छपाक उछलती कूद गिनें
कुये के पाट पर जाये ,उनमे ढूँके,बोम मारे
फैक दे बड़ी सी ईट और सुने धमाक।
अमियाँ तोड़े या डाली
या पेड़ों पर चढकर झूले और कूद पड़े
बागों से चुने फूल या निहारे खूबसूरती
माली की प्रशंसा मे गीत लिखे या खाये गाली
सच तो यही है कि हम
करना चाहते बही सब कुछ जो करते रहे है पर
ओहदों की याद,शहर की आदतें और
उत्तर आधुनिक समय
हाँक रहा होता है हमें
तब लगता है
हमे कुछ और करना चाहिये
उनमे से कुछ होती है..
बड़े होते बच्चों पर झिड़कियाँ
नौकरी पर जाती औरतो पर फिकरे
खाँसते..खखारते पिता पर ताने और
बर्तन माँजती माँ..बीबी पर टिप्पणियाँ
भाई बहन के लिये उलाहनें
बचे हुये लोगो के लिये लानत ..मनालत
हम यही सब तो करते हैं
जो नहीं करना चाहिये ,फिर भी.
क्या हमे कुछ करना चाहिये ?
कमलेश कुमार दीवान
१७ अप्रेल २००५
बुधवार, 3 नवंबर 2010
दीपावली के मंगलमय पर्व पर
दीपावली के मंगलमय पर्व पर आप सभी को शुभ हो ,स्वरचित पक्तियाँ
सादर प्रस्तुत है.......
आलोकित हो गये
तिमिर पथ
लघु विस्तृत
आकाश और वृत
प्रमुदित प्राण
अर्थ अर्पित है
दीप.. दीप का पर्व
मंगलकामनाओं सहित
कमलेश कुमार दीवान
दीपावली 1983
सादर प्रस्तुत है.......
आलोकित हो गये
तिमिर पथ
लघु विस्तृत
आकाश और वृत
प्रमुदित प्राण
अर्थ अर्पित है
दीप.. दीप का पर्व
मंगलकामनाओं सहित
कमलेश कुमार दीवान
दीपावली 1983
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
करें बँदना
मैया तोरी ।
रहे सब सुखी
हो समृध्दशाली,
बहू बेटियाँ
हों सौभाग्य वाली।
यही अर्चना
मैया मोरी ।
करे बँदना मैया तौरी।
करे कामना जो
माँ शेरों वाली
तेरे दर से कोई न
जा पाये खाली
यही प्रार्थना है
मैया मोरी ।
करे बँदना ,मैया तोरी ।
कमलेश कुमार दीवान
अध्यापक एवम् लेखक
24/09/2009
होशंगाबाद म.प्र. मो.91+9425642458
email..kamleshkumardiwan.yahoo.com
करें बँदना
मैया तोरी ।
रहे सब सुखी
हो समृध्दशाली,
बहू बेटियाँ
हों सौभाग्य वाली।
यही अर्चना
मैया मोरी ।
करे बँदना मैया तौरी।
करे कामना जो
माँ शेरों वाली
तेरे दर से कोई न
जा पाये खाली
यही प्रार्थना है
मैया मोरी ।
करे बँदना ,मैया तोरी ।
कमलेश कुमार दीवान
अध्यापक एवम् लेखक
24/09/2009
होशंगाबाद म.प्र. मो.91+9425642458
email..kamleshkumardiwan.yahoo.com
मंगलवार, 21 सितंबर 2010
नावों के लिये
नावों के लिये
इन पालदार नावो के लिये
नदियाँ होनी चाहिये
नदियों के लिये जल
जल के लिये पेड़
और
पेड़ो के लिये पहाड़
पहाड़ बनने के युग
कभी कभी ही आते है
पैड़ उगाने के मौसम हर वरस,
पौधा रोपने वाले नही देखते गर्मी,
काटने वाले कहाँ देखते है सर्दी..बरसात
जहाँ वन होना चाहिये वहाँ नही है पेड़
जहाँ जल होना चाहिये वहाँ नहीं है नदियाँ
नावे अब जहाज हो गई है
उनके पाल अब नहीं बचे हैं।
कमलेश कुमार दीवान
21/07/06
इन पालदार नावो के लिये
नदियाँ होनी चाहिये
नदियों के लिये जल
जल के लिये पेड़
और
पेड़ो के लिये पहाड़
पहाड़ बनने के युग
कभी कभी ही आते है
पैड़ उगाने के मौसम हर वरस,
पौधा रोपने वाले नही देखते गर्मी,
काटने वाले कहाँ देखते है सर्दी..बरसात
जहाँ वन होना चाहिये वहाँ नही है पेड़
जहाँ जल होना चाहिये वहाँ नहीं है नदियाँ
नावे अब जहाज हो गई है
उनके पाल अब नहीं बचे हैं।
कमलेश कुमार दीवान
21/07/06
सोमवार, 6 सितंबर 2010
भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे (स्वरचित)
॥श्री गणेशाय नमः॥
भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे
मेरो मन न
अंत को पावे ।
मेरो मन न अंत को पावे।
कोटि कोटि
ब्रम्हाण्ड रचियता
नित नवीन उपजावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।
लोग कहत
उजियार जगत् में
जित देखा तम है,
एक सूरज से
क्या होता है
कई करोड़ कम हैं ।
टिम टिमाते
तारे.... तारे से
बार बार भरमावे ।
जगा जोत सम लागे।
मेरा मन न, अंत को पावे।
जो दीखें न
अँधकार है
तब प्रकाश भ्रम है
भरम मिटे न
इस दुनियाँ का
आदि ... अनादि क्रम है।
तृण.... तृण
अनंत हो जावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।
कमलेश कुमार दीवान
गणेश चतुर्थी रविवार
दिनाँक २३ अगस्त २००९
भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे
मेरो मन न
अंत को पावे ।
मेरो मन न अंत को पावे।
कोटि कोटि
ब्रम्हाण्ड रचियता
नित नवीन उपजावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।
लोग कहत
उजियार जगत् में
जित देखा तम है,
एक सूरज से
क्या होता है
कई करोड़ कम हैं ।
टिम टिमाते
तारे.... तारे से
बार बार भरमावे ।
जगा जोत सम लागे।
मेरा मन न, अंत को पावे।
जो दीखें न
अँधकार है
तब प्रकाश भ्रम है
भरम मिटे न
इस दुनियाँ का
आदि ... अनादि क्रम है।
तृण.... तृण
अनंत हो जावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।
कमलेश कुमार दीवान
गणेश चतुर्थी रविवार
दिनाँक २३ अगस्त २००९
बुधवार, 25 अगस्त 2010
सावन आये रे सावन आये रे....
सावन आये रे
सावन आये रे....
बादल बिजुरी और हवायें
घिर आये घनघोर घटाएँ
घन बरसाएँ रे...
सावन आये रे....।
सरवन के कच्चे धागों से
बहना करे श्रृंगार भाई का
जग जाने भारत की रीति
मूल्य जाने बहना कलाई का
सब मन भाये रे.....
सावन आये रे ...।
कमलेश कुमार दीवान
24/08/2010
होशंगाबाद म.प्र.
सावन आये रे....
बादल बिजुरी और हवायें
घिर आये घनघोर घटाएँ
घन बरसाएँ रे...
सावन आये रे....।
सरवन के कच्चे धागों से
बहना करे श्रृंगार भाई का
जग जाने भारत की रीति
मूल्य जाने बहना कलाई का
सब मन भाये रे.....
सावन आये रे ...।
कमलेश कुमार दीवान
24/08/2010
होशंगाबाद म.प्र.
गुरुवार, 19 अगस्त 2010
सावन झूले पड़े भाई परदेश मे,
सावन झूले पड़े
सावन झूले पड़े
भाई परदेश मे,
कैसे जश्न मनाएँ
जायें देश मे।
माँ ने सोचा
पिता आयेगें
पर वो गये नौकरी ,
भुआ आयेगी
राखी लेकर
पर हो गई डोकरी ।
बूढा बूढी
बच्चा बच्ची
युवा किशोरी
सव ही नये परिवेश में
छौड़ गये सब तैश मे ,
कैसे जश्न मनाये
जायें देश मे ।
सावन झूले पड़े
भाई परदेश मे
कैसे जश्न मनाये
जाये देश मे ।
कमलेश कुमार दीवान
२अगस्त २००९
सावन झूले पड़े
भाई परदेश मे,
कैसे जश्न मनाएँ
जायें देश मे।
माँ ने सोचा
पिता आयेगें
पर वो गये नौकरी ,
भुआ आयेगी
राखी लेकर
पर हो गई डोकरी ।
बूढा बूढी
बच्चा बच्ची
युवा किशोरी
सव ही नये परिवेश में
छौड़ गये सब तैश मे ,
कैसे जश्न मनाये
जायें देश मे ।
सावन झूले पड़े
भाई परदेश मे
कैसे जश्न मनाये
जाये देश मे ।
कमलेश कुमार दीवान
२अगस्त २००९
रविवार, 15 अगस्त 2010
tiranga ke liye geet
तिरंगा गीत
हरी भरी धरती हो नीला आसमान रहे
फहराता तिरंगा चाँद तारों के समान रहे।
त्याग शूरवीरता महानता का मन्त्र है
मेरा यह देश एक अभिनव गणतन्त्र है।
शान्ति अमन चैन रहे खुशहाली छाए
बच्चों को बूढों को सबको हर्षाए
सबके चेहरों पर फैली मुसकान रहे।
लहराता तिरंगा चाँद तारों के समान रहे.
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
हरी भरी धरती हो नीला आसमान रहे
फहराता तिरंगा चाँद तारों के समान रहे।
त्याग शूरवीरता महानता का मन्त्र है
मेरा यह देश एक अभिनव गणतन्त्र है।
शान्ति अमन चैन रहे खुशहाली छाए
बच्चों को बूढों को सबको हर्षाए
सबके चेहरों पर फैली मुसकान रहे।
लहराता तिरंगा चाँद तारों के समान रहे.
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
गुरुवार, 10 जून 2010
मेघ गीत मेघ बरसो रे
मेघ गीत मेघ बरसो रे
मेघ बरसो रे
प्यासे देश,
बहां सब रीत गये ।
ताल तलैया ,नदियाँ सूखी
रीता हिया का नेह
मेघ बरसो रे पिया के देश ...
बहाँ सब बीत गये ।
कुम्लाऍ है
कमल कुमुदनी
घास पात और देह
उड़ उड़ टेर लगाये पपीहा
होते गये विदेह ।
मेघ हर्षो रे
प्यासे देश
यहाँ सब रीत गये ।
मेघ बरसो रे
पिया के देश
बहाँ सब रीत गये ।
कमलेश कुमार दीवान
दिनाँक २३अगस्त २००९
मेघ बरसो रे
प्यासे देश,
बहां सब रीत गये ।
ताल तलैया ,नदियाँ सूखी
रीता हिया का नेह
मेघ बरसो रे पिया के देश ...
बहाँ सब बीत गये ।
कुम्लाऍ है
कमल कुमुदनी
घास पात और देह
उड़ उड़ टेर लगाये पपीहा
होते गये विदेह ।
मेघ हर्षो रे
प्यासे देश
यहाँ सब रीत गये ।
मेघ बरसो रे
पिया के देश
बहाँ सब रीत गये ।
कमलेश कुमार दीवान
दिनाँक २३अगस्त २००९
गुरुवार, 3 जून 2010
कल क्या हो ?
पृथ्वी दिवस केअवसर पर गीत
कल क्या हो ?
कोई मुझसे पूछे ,
कल क्या हो ?
मैं कहता ,यह संसार रहे ।
हम रहें ,न रहें
फिर भी तो
घूमेगी दुनियाँ इसी तरह।
चमकेगा आसमान सारा
नदियाँ उमड़ेगी उसी तरह।
ये सात समुंदर, बचे रहें
कोई व्दीप न डूबें
सागर में,
सब कुछ बिगड़े
पर थोड़ा सा
जल बचा रहे
इस गागर मे।
सब कुछ तो
खत्म नहीं होता
जो बचा आपसी प्यार रहे
कोई मुझसे पूछे
कल क्या हो
मे कहता हूँ ,संसार रहे ।
कमलेश कुमार दीवान
नोटःःप्राकृतिक पर्यावरण के केन्द्र मे मानव है।जलवायु परिवर्तनशील तत्वो का
समुच्य है।परिवर्तन होते रहें हैं और होंगें,परन्तु हमे आशाओं का सृजन
करना चाहिये।संसार की आबादियो को यह गीत सादर समर्पित है।
कल क्या हो ?
कोई मुझसे पूछे ,
कल क्या हो ?
मैं कहता ,यह संसार रहे ।
हम रहें ,न रहें
फिर भी तो
घूमेगी दुनियाँ इसी तरह।
चमकेगा आसमान सारा
नदियाँ उमड़ेगी उसी तरह।
ये सात समुंदर, बचे रहें
कोई व्दीप न डूबें
सागर में,
सब कुछ बिगड़े
पर थोड़ा सा
जल बचा रहे
इस गागर मे।
सब कुछ तो
खत्म नहीं होता
जो बचा आपसी प्यार रहे
कोई मुझसे पूछे
कल क्या हो
मे कहता हूँ ,संसार रहे ।
कमलेश कुमार दीवान
नोटःःप्राकृतिक पर्यावरण के केन्द्र मे मानव है।जलवायु परिवर्तनशील तत्वो का
समुच्य है।परिवर्तन होते रहें हैं और होंगें,परन्तु हमे आशाओं का सृजन
करना चाहिये।संसार की आबादियो को यह गीत सादर समर्पित है।
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
कुछ देर सही .... गीत
कुछ देर सही गीत
आओ कुछ देर सही
दूर तक चले हम
जीवन मे रास्तो के
फाँसले करे कम ।
आओ कुछ देर ...
हौसले बहुत है अब
आगे ही बढ़ना है
ऊँचे पर मुकाम
पाँव पाँव चढ़ना है
अपने जब दे शिकस्त
गिरकर सभँलना है
सपने हो ढेर सही
पूर्ण कर चले हम ।
आओ कुछ देर सही
दूर तक चले हम।
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
31/12/09
आओ कुछ देर सही
दूर तक चले हम
जीवन मे रास्तो के
फाँसले करे कम ।
आओ कुछ देर ...
हौसले बहुत है अब
आगे ही बढ़ना है
ऊँचे पर मुकाम
पाँव पाँव चढ़ना है
अपने जब दे शिकस्त
गिरकर सभँलना है
सपने हो ढेर सही
पूर्ण कर चले हम ।
आओ कुछ देर सही
दूर तक चले हम।
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
31/12/09
रविवार, 11 अप्रैल 2010
लो आई गर्मियाँ ....... विछ गये हैं फूल,सेमल के
लो आई गर्मियाँ
विछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ ।
लो आई गर्मियाँ ।
सुर्ख ,कोमल,लाल पखुरियाँ
लिए रहती,
अनेकों तान छत वाली
बहुत ऊँची,
गगन छूती डालियाँ
खिल उठी हैं
हो के मतवाली।
छा गई मैदान पर,
रक्तिम छटाएँ
चलो नंगे पाँव तो,
वे गुदगुदाएँ
खदबदाती सी खड़ी
वेपीर लगती है,
खुशी के पल भरा पूरा
नीड़ लगती हैं।
ग्रीष्म भर उड़ती रहेगीं रेशे ..रेशे
जो कभी विचलित,
कभी प्रतिकूल लगती है।
विछ गयें हैं शूल,
तन...मन के
लो आई गर्मियाँ ।
विछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ ।
कमलेश कुमार दीवान
१० मार्च २००८
नोटःः यह गीत ग्रीष्म ऋतु मे सेमल के पेड़ के फूलने फलने
और बीजों को लेकर उड़ते सफेद कोमल रेशों के द्श्य
परिस्थितियों पर लिखा गया है ।
विछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ ।
लो आई गर्मियाँ ।
सुर्ख ,कोमल,लाल पखुरियाँ
लिए रहती,
अनेकों तान छत वाली
बहुत ऊँची,
गगन छूती डालियाँ
खिल उठी हैं
हो के मतवाली।
छा गई मैदान पर,
रक्तिम छटाएँ
चलो नंगे पाँव तो,
वे गुदगुदाएँ
खदबदाती सी खड़ी
वेपीर लगती है,
खुशी के पल भरा पूरा
नीड़ लगती हैं।
ग्रीष्म भर उड़ती रहेगीं रेशे ..रेशे
जो कभी विचलित,
कभी प्रतिकूल लगती है।
विछ गयें हैं शूल,
तन...मन के
लो आई गर्मियाँ ।
विछ गये हैं फूल,
सेमल के
लो आई गर्मियाँ ।
कमलेश कुमार दीवान
१० मार्च २००८
नोटःः यह गीत ग्रीष्म ऋतु मे सेमल के पेड़ के फूलने फलने
और बीजों को लेकर उड़ते सफेद कोमल रेशों के द्श्य
परिस्थितियों पर लिखा गया है ।
शुक्रवार, 19 मार्च 2010
स्वरचित भजन
चलते चलो
चलते चलो,चलते चलो ,चलते चलो रे.....
मैया रानी का
दरबार आयेगा ।
बढ़ते चलो ,चढ़ते चलो ,चलते चलों रे
मैया रानी का
घर द्वार आयेगा ।
मैया के भुवन मे
दस दरवाजे (दस दिशाओं मे )
काम..क्रोध ,लोभ मद मोह
समा जावेगा ।
मैया रानी का दरबार ।
चलते चलो, चलते चलो, चलते चलो रे...... ।
कमलेश कुमार दीवान
18/09/o9
चलते चलो
चलते चलो,चलते चलो ,चलते चलो रे.....
मैया रानी का
दरबार आयेगा ।
बढ़ते चलो ,चढ़ते चलो ,चलते चलों रे
मैया रानी का
घर द्वार आयेगा ।
मैया के भुवन मे
दस दरवाजे (दस दिशाओं मे )
काम..क्रोध ,लोभ मद मोह
समा जावेगा ।
मैया रानी का दरबार ।
चलते चलो, चलते चलो, चलते चलो रे...... ।
कमलेश कुमार दीवान
18/09/o9
सोमवार, 15 मार्च 2010
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥
भारतवर्ष के नव संवत् विक्रम संवत् २०६७
गुड़ी पड़वा चैत्र शुक्ल प्रथम के पावन पर्व पर
शुभमंगलकामनाएँ है। देशवाशियों को यह गीत
सादर समर्पित है......
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नक्षत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति वरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
चैत्र शुक्ल एकम् संवत् २०६६
भारतवर्ष के नव संवत् विक्रम संवत् २०६७
गुड़ी पड़वा चैत्र शुक्ल प्रथम के पावन पर्व पर
शुभमंगलकामनाएँ है। देशवाशियों को यह गीत
सादर समर्पित है......
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नक्षत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति वरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
चैत्र शुक्ल एकम् संवत् २०६६
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
ऐसे फागुन आऍ ।
होली शुभ हो
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ ।
जो न गाऍ गीत,गऐ हो रीत
खूब बतियाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
दरक गई है प्रीत परस्पर
ढूढै मिले न मन के मीत
हारे हुये ,समय के संग संग
कहां मिली है सबको जीत।
दुख सुख साथ साथ चलते हैं
हम सबको ललचाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
नये सृजन हों, नव आशाऍ
नये रंग हों नव आभाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
कमलेश कुमार दीवान
१० मार्च ०९
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ ।
जो न गाऍ गीत,गऐ हो रीत
खूब बतियाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
दरक गई है प्रीत परस्पर
ढूढै मिले न मन के मीत
हारे हुये ,समय के संग संग
कहां मिली है सबको जीत।
दुख सुख साथ साथ चलते हैं
हम सबको ललचाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
नये सृजन हों, नव आशाऍ
नये रंग हों नव आभाऍ
ओ भाई ,ऐसे फागुन आऍ।
कमलेश कुमार दीवान
१० मार्च ०९
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
मुझे खत लिखना
मुझे खत लिखना
भूल जाओ अगर कोई बात
मुझे खत लिखना ।
याद रखना हो मुलाकात
मुझे खत लिखना ।
एक दिन आयेगा सैलाव
या संमुदर से ऊफान
खाली रह जायेगी कश्ती
और किनारे से मुकाम
तुम उठाओ अगर कोई पात
मुझे खत लिखना ।
भूल जाओ अगर कोई बात
मुझे खत लिखना ।
कमलेश कुमार दीवान
१७ मार्च २००९
भूल जाओ अगर कोई बात
मुझे खत लिखना ।
याद रखना हो मुलाकात
मुझे खत लिखना ।
एक दिन आयेगा सैलाव
या संमुदर से ऊफान
खाली रह जायेगी कश्ती
और किनारे से मुकाम
तुम उठाओ अगर कोई पात
मुझे खत लिखना ।
भूल जाओ अगर कोई बात
मुझे खत लिखना ।
कमलेश कुमार दीवान
१७ मार्च २००९
बुधवार, 20 जनवरी 2010
ॠतु गीत ....बसंत
ॠतु गीत ....बसंत
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ मन ।
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ वन ।।
कुछ देर डालियों पर ठहरो
पाती पर नाम लिखूँगा
अजनवी हवाओ,सखा साथियों
के तन मन पैठूँगा
धूँ धूँ जल रहे पहाड़ और
भाए भरमाये मन।
मुझसे इस अंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ वन।
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ मन ।।
कमलेश कुमार दीवान
०८ मार्च १९९५
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ मन ।
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ वन ।।
कुछ देर डालियों पर ठहरो
पाती पर नाम लिखूँगा
अजनवी हवाओ,सखा साथियों
के तन मन पैठूँगा
धूँ धूँ जल रहे पहाड़ और
भाए भरमाये मन।
मुझसे इस अंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ वन।
मुझसे बसंत के गीत नहीं
गाए जाते ओ मन ।।
कमलेश कुमार दीवान
०८ मार्च १९९५
शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
आओ नव वर्ष गीत २०१०
आओ नव वर्ष गीत २०१०
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन।
खुश हो सब
सुखी रहें
हो अभिनंदन ।।
आओ नव वर्ष....
काल की कृपा होगी
सारे सुख पायेगें
पीकर हम हालाहल
अमृत बरसायेगें ।
धरती गुड़..धानी दे
पर्वतों पर पेड़ रहें
रेलो मे सड़को पर
हम सबकी खेर रहें।
माँग मे सिंदूर रहे
भाल पर तिलक चंदन
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन ।
नूतन वर्ष मंगलमय हो ।शुभकामनाओ सहित..
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन।
खुश हो सब
सुखी रहें
हो अभिनंदन ।।
आओ नव वर्ष....
काल की कृपा होगी
सारे सुख पायेगें
पीकर हम हालाहल
अमृत बरसायेगें ।
धरती गुड़..धानी दे
पर्वतों पर पेड़ रहें
रेलो मे सड़को पर
हम सबकी खेर रहें।
माँग मे सिंदूर रहे
भाल पर तिलक चंदन
आओ नव वर्ष
हम करे बँदन ।
नूतन वर्ष मंगलमय हो ।शुभकामनाओ सहित..
कमलेश कुमार दीवान
होशंगाबाद म.प्र.
बुधवार, 30 दिसंबर 2009
नव वर्ष 2010
.नव वर्ष
सुख बिखर सिमटते रहे
तिमिर घन
घटते बढ़ते रहें
प्रण टूटे ,
मौन और विस्तृत
स्वीकारे उत्कर्ष ,
नये आये है,वर्ष ।
शुभ मँगलकामनाओ सहित सादर समर्पित है।
कमलेश कुमार दीवान
सुख बिखर सिमटते रहे
तिमिर घन
घटते बढ़ते रहें
प्रण टूटे ,
मौन और विस्तृत
स्वीकारे उत्कर्ष ,
नये आये है,वर्ष ।
शुभ मँगलकामनाओ सहित सादर समर्पित है।
कमलेश कुमार दीवान
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
ॠतु गीत ..शीत सर्द हवाएँ
ॠतु गीत ..शीत
सर्द हवाएँ
अबकी बार,बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को ।
लौटी सर्द हवाओं को ।
काँप गई थी ,धूँप
चाँदनी कितनी शीतल थी
नदियाँ गाढी हुई
हवाएँ बेहद विचलित थी।
व्यर्थ हुये आलाव
आँच के धीमे होने से
फसलें ठिठुरी और फुगनियाँ
सहमी ..सहमी सी ।
अबकी बार बहुत दिन सहते
रहे विवाई पाँवों की।
अबकी बार बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को।
लौटी सर्द हवाओं को।
कमलेश कुमार दीवान
८ जनवरी ९५
सर्द हवाएँ
अबकी बार,बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को ।
लौटी सर्द हवाओं को ।
काँप गई थी ,धूँप
चाँदनी कितनी शीतल थी
नदियाँ गाढी हुई
हवाएँ बेहद विचलित थी।
व्यर्थ हुये आलाव
आँच के धीमे होने से
फसलें ठिठुरी और फुगनियाँ
सहमी ..सहमी सी ।
अबकी बार बहुत दिन सहते
रहे विवाई पाँवों की।
अबकी बार बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को।
लौटी सर्द हवाओं को।
कमलेश कुमार दीवान
८ जनवरी ९५
शनिवार, 19 दिसंबर 2009
राम चरण मे
राम चरण मे
लगा ले मन
राम चरण में प्रीत ।
सुख.. सम्पति सब
धरी रहत है
यही जगत की रीत।
लगा ले मन
राम चरण मे प्रीत ।
कमलेश कुमार दीवान
१६ मई २००८
लगा ले मन
राम चरण में प्रीत ।
सुख.. सम्पति सब
धरी रहत है
यही जगत की रीत।
लगा ले मन
राम चरण मे प्रीत ।
कमलेश कुमार दीवान
१६ मई २००८
गुरुवार, 17 दिसंबर 2009
रे मन
भजन....
रे मन
रे मन
काहे तू इतना डरे ।
पवन पुत्र तेरे
संग..साथ है
गणपति विध्न हरे ।।
रे मन..
काहे तू इतना डरे ।
कमलेश कुमार दीवान
25/10/09
रे मन
रे मन
काहे तू इतना डरे ।
पवन पुत्र तेरे
संग..साथ है
गणपति विध्न हरे ।।
रे मन..
काहे तू इतना डरे ।
कमलेश कुमार दीवान
25/10/09
रविवार, 8 नवंबर 2009
कैसी बीत रही है (एक गीत )
कैसी बीत रही है
मै अचछा हूँ
आप बताये
कैसी बीत रही है ।
घर आँगन
सूना सूना है
खाली खाली दिन और रात ,
अपने है सब
रूठे रूठे
कही न कोई ऐसी बात,
मै बचता हूँ
आप बताये
कैसे जीत रही ।
क्या तुमने
माँ बाबा के बीच
सुलह करबाई है
बहन भाई के बीच
हुई क्यों
मार पिटाई है ,
क्या कक्षा में
डाँट पड़ी या
फिर मौसम की मार
क्या बस्तो के बोझ तले
हो रही पढाई है ।
मै अच्छा हूँ
आप बताये
कैसे सीख रहीं है
कैसे बीत रही है ।
कमलेश कुमार दीवान
१३ अगस्त २००९
मै अचछा हूँ
आप बताये
कैसी बीत रही है ।
घर आँगन
सूना सूना है
खाली खाली दिन और रात ,
अपने है सब
रूठे रूठे
कही न कोई ऐसी बात,
मै बचता हूँ
आप बताये
कैसे जीत रही ।
क्या तुमने
माँ बाबा के बीच
सुलह करबाई है
बहन भाई के बीच
हुई क्यों
मार पिटाई है ,
क्या कक्षा में
डाँट पड़ी या
फिर मौसम की मार
क्या बस्तो के बोझ तले
हो रही पढाई है ।
मै अच्छा हूँ
आप बताये
कैसे सीख रहीं है
कैसे बीत रही है ।
कमलेश कुमार दीवान
१३ अगस्त २००९
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
करें बँदना
मैया तोरी ।
रहे सब सुखी
हो समृध्दशाली,
बहू बेटियाँ
हों सौभाग्य वाली।
यही अर्चना
मैया मोरी ।
करे बँदना मैया तौरी।
करे कामना जो
माँ शेरों वाली
तेरे दर से कोई न
जा पाये खाली
यही प्रार्थना है
मैया मोरी ।
करे बँदना ,मैया तोरी ।
कमलेश कुमार दीवान
24/09/2009
करें बँदना
मैया तोरी ।
रहे सब सुखी
हो समृध्दशाली,
बहू बेटियाँ
हों सौभाग्य वाली।
यही अर्चना
मैया मोरी ।
करे बँदना मैया तौरी।
करे कामना जो
माँ शेरों वाली
तेरे दर से कोई न
जा पाये खाली
यही प्रार्थना है
मैया मोरी ।
करे बँदना ,मैया तोरी ।
कमलेश कुमार दीवान
24/09/2009
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009
हमे कुछ करना चाहिये
हमे कुछ करना चाहिये
कमलेश कुमार दीवान
जब भी हम उदास होते हैं
अपने हालात पर लिखते हैं,कविताएँ
गाते गुनगुनाते है,कोई मनपसंद गीत
या फिर चलते चले जाते है उस ओर
जहाँ रास्तो मे मंजिले नही होती
नहीं होते है घर,शोर मचाते बच्चे
लोरियाँ सुनाती धाँय माँ,
कहानियाँ कहती दादी नानी
किस्से हाँकते बाबा और बचपन के दिन
सब पास और अधिक पास आ जाते हैं
तब लगता है ,हमे कुछ करना चाहिये ।
हम जो चाहते हैं वह यही है कि.....
नदियाँ तालाब पोखर या समुंदर के किनारे जाएँ
फेके उनमे पतली चिप्पियाँ और छपाक उछलती कूद गिनें
कुये के पाट पर जाये ,उनमे ढूँके,बोम मारे
फैक दे बड़ी सी ईट और सुने धमाक।
अमियाँ तोड़े या डाली
या पेड़ों पर चढकर झूले और कूद पड़े
बागों से चुने फूल या निहारे खूबसूरती
माली की प्रशंसा मे गीत लिखे या खाये गाली
सच तो यही है कि हम
करना चाहते बही सब कुछ जो करते रहे है पर
ओहदों की याद,शहर की आदतें और
उत्तर आधुनिक समय
हाँक रहा होता है हमें
तब लगता है
हमे कुछ और करना चाहिये
उनमे से कुछ होती है..
बड़े होते बच्चों पर झिड़कियाँ
नौकरी पर जाती औरतो पर फिकरे
खाँसते..खखारते पिता पर ताने और
बर्तन माँजती माँ..बीबी पर टिप्पणियाँ
भाई बहन के लिये उलाहनें
बचे हुये लोगो के लिये लानत ..मनालत
हम यही सब तो करते हैं
जो नहीं करना चाहिये ,फिर भी.
क्या हमे कुछ करना चाहिये ?
कमलेश कुमार दीवान
१७ अप्रेल २००५
कमलेश कुमार दीवान
जब भी हम उदास होते हैं
अपने हालात पर लिखते हैं,कविताएँ
गाते गुनगुनाते है,कोई मनपसंद गीत
या फिर चलते चले जाते है उस ओर
जहाँ रास्तो मे मंजिले नही होती
नहीं होते है घर,शोर मचाते बच्चे
लोरियाँ सुनाती धाँय माँ,
कहानियाँ कहती दादी नानी
किस्से हाँकते बाबा और बचपन के दिन
सब पास और अधिक पास आ जाते हैं
तब लगता है ,हमे कुछ करना चाहिये ।
हम जो चाहते हैं वह यही है कि.....
नदियाँ तालाब पोखर या समुंदर के किनारे जाएँ
फेके उनमे पतली चिप्पियाँ और छपाक उछलती कूद गिनें
कुये के पाट पर जाये ,उनमे ढूँके,बोम मारे
फैक दे बड़ी सी ईट और सुने धमाक।
अमियाँ तोड़े या डाली
या पेड़ों पर चढकर झूले और कूद पड़े
बागों से चुने फूल या निहारे खूबसूरती
माली की प्रशंसा मे गीत लिखे या खाये गाली
सच तो यही है कि हम
करना चाहते बही सब कुछ जो करते रहे है पर
ओहदों की याद,शहर की आदतें और
उत्तर आधुनिक समय
हाँक रहा होता है हमें
तब लगता है
हमे कुछ और करना चाहिये
उनमे से कुछ होती है..
बड़े होते बच्चों पर झिड़कियाँ
नौकरी पर जाती औरतो पर फिकरे
खाँसते..खखारते पिता पर ताने और
बर्तन माँजती माँ..बीबी पर टिप्पणियाँ
भाई बहन के लिये उलाहनें
बचे हुये लोगो के लिये लानत ..मनालत
हम यही सब तो करते हैं
जो नहीं करना चाहिये ,फिर भी.
क्या हमे कुछ करना चाहिये ?
कमलेश कुमार दीवान
१७ अप्रेल २००५
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
दीप पर्व शुभ हो
।।ॐ श्री गणेशाय नमः।।
दीप पर्व शुभ हो
आलोकित हो गये
तिमिर पथ
लघु विस्तृत,आकाश और वृत्
प्रमुदित प्राण अर्थ अर्पित है
और
दीपोत्सव के पर्व।
कमलेश कुमार दीवान
अध्यापक एवम् लेखक
होशंगाबाद म.प्र.
दीप पर्व शुभ हो
आलोकित हो गये
तिमिर पथ
लघु विस्तृत,आकाश और वृत्
प्रमुदित प्राण अर्थ अर्पित है
और
दीपोत्सव के पर्व।
कमलेश कुमार दीवान
अध्यापक एवम् लेखक
होशंगाबाद म.प्र.
बुधवार, 14 अक्टूबर 2009
दो कदम साथ हो ले
दो कदम साथ हो ले
ये तन्हाईयाँ भी
डराने लगी हैं
मेरे हमसफर ,दो कदम साथ हो ले ।
बहुत पास थे ,रास्ते
मुड़ के देखा
कदम दो मिलाते
तो मँजिल ही होती
कई खौफ थे जिनसे
डरते रहे हम
नकाबों,लिबासों में
मरते रहे हम
बड़े सपने आँखों मे
बसते गये थे
बही आज फिर भय
सजाने लगी हैं
ये तन्हाईयाँ भी
डराने लगी हैं
मेरे हमसफर दो कदम साथ हो लें ।
कमलेश कुमार दीवान
ये तन्हाईयाँ भी
डराने लगी हैं
मेरे हमसफर ,दो कदम साथ हो ले ।
बहुत पास थे ,रास्ते
मुड़ के देखा
कदम दो मिलाते
तो मँजिल ही होती
कई खौफ थे जिनसे
डरते रहे हम
नकाबों,लिबासों में
मरते रहे हम
बड़े सपने आँखों मे
बसते गये थे
बही आज फिर भय
सजाने लगी हैं
ये तन्हाईयाँ भी
डराने लगी हैं
मेरे हमसफर दो कदम साथ हो लें ।
कमलेश कुमार दीवान
रात चाँद बच्चे और सूरज
रात चाँद बच्चे और सूरज
(कमलेश कुमार दीवान)
चाँद से राते नहीं नापी जा सकती
रातो के माप नींद और सपने भी नहीं हैं
उसनींदे मरते लोगो की रातें लम्बी दोपहर तक खिचतीं है
इसलिये पैमाइश सूरज का प्रकाश भी नहीं हो सकता हैं
दूर टिमटिमाते तारे और ज्यादा तेज चमककर जताते तो है कि
रातें अब समाप्त होने वाली है ,पर
भोर के आकाशदीप भी अब
राते समाप्त नहीं कर सकते हैं
रातें अब
मुर्गे की बाँग और चिड़ियों के कलरव से भी नहीं सिमट रही हैं
बूढ़ों के खाँसते खकारते रहने,नही सोने,जागते रहने
बच्चों के रोते रहने और बाकी सबके खर्राटे लेने से भी
नहीं खुटती है रातें
आधुनिक गुफाओं जैसे घर में
छोटे छोटे सूरज टाँगकर आदमी सोता ही कहाँ है
इन सबके बाबजूद सूरज ही तय करता है दिन
कोई तो है जो बादलों की तरह अनियमित नहीं है
बसों ,रेलगाड़ियों,हवाई जहाजों की तरह लेट लतीफ भी नहीं हैं
बिजली की तरह आता जाता और मशीनो की तरह घनघनाता नहीं हैं
उसका अपना समय है और उस काल के साथ वह है
यदि ऐसा नहीं हो तब चिल्लाते रहें मुर्गे,बूढ़े खाँसते खँकारते सिधार जायें
बच्चे कितने ही रिरियायें,रोते बिलखते रहें
चिड़ियों के झुँड के झुँड कलरव करें
औरतें दहशत से सिहर जायें
आदमी मुँह ढाँपकर मर जाएँ
कुछ नहीं होगा तब राते ही रातें होगीं
हजारो हजार घोड़ों के रथ पर सवार सूरज
तुम यदि दिशाएँ याद रखना भूल जाओं तो
मेरी बच्ची का दिशा सूचक यंत्र ले जाना
प्रश्नो का व्यापार करते विश्व मे
उत्तर का बोध सबसे जरुरी है
बच्चों की,हवाओं और पानी बाले बादलों की दिशाएँ
उसी से तय हो रहीं हैं
बच्चो के सर के ऊपर उत्तर और पेरो के नीचे दक्षिण है
बच्चो के दाहिने बाएँ बदलती रहती है दिशाएँ
यहाँ कुछ तो रातें तय करती है
कुछ चाँद तारे और सूरज
बाँकी सब बच्चों के हिस्से मे हैं
आधी रात तक जागते और देर तक सोते लोगों के पास
शायद कुछ नहीं है
रातो ने तय कर दिया है सबकी सुबह दोपहर तक होगी ।
कमलेश कुमार दीवान
नोट.. यह कविता समकालीन भारतीय साहित्य नई दिल्ली के
अंक 84 जुलाई अगस्त 1999 मे प्रकाशित हुई है।
(कमलेश कुमार दीवान)
चाँद से राते नहीं नापी जा सकती
रातो के माप नींद और सपने भी नहीं हैं
उसनींदे मरते लोगो की रातें लम्बी दोपहर तक खिचतीं है
इसलिये पैमाइश सूरज का प्रकाश भी नहीं हो सकता हैं
दूर टिमटिमाते तारे और ज्यादा तेज चमककर जताते तो है कि
रातें अब समाप्त होने वाली है ,पर
भोर के आकाशदीप भी अब
राते समाप्त नहीं कर सकते हैं
रातें अब
मुर्गे की बाँग और चिड़ियों के कलरव से भी नहीं सिमट रही हैं
बूढ़ों के खाँसते खकारते रहने,नही सोने,जागते रहने
बच्चों के रोते रहने और बाकी सबके खर्राटे लेने से भी
नहीं खुटती है रातें
आधुनिक गुफाओं जैसे घर में
छोटे छोटे सूरज टाँगकर आदमी सोता ही कहाँ है
इन सबके बाबजूद सूरज ही तय करता है दिन
कोई तो है जो बादलों की तरह अनियमित नहीं है
बसों ,रेलगाड़ियों,हवाई जहाजों की तरह लेट लतीफ भी नहीं हैं
बिजली की तरह आता जाता और मशीनो की तरह घनघनाता नहीं हैं
उसका अपना समय है और उस काल के साथ वह है
यदि ऐसा नहीं हो तब चिल्लाते रहें मुर्गे,बूढ़े खाँसते खँकारते सिधार जायें
बच्चे कितने ही रिरियायें,रोते बिलखते रहें
चिड़ियों के झुँड के झुँड कलरव करें
औरतें दहशत से सिहर जायें
आदमी मुँह ढाँपकर मर जाएँ
कुछ नहीं होगा तब राते ही रातें होगीं
हजारो हजार घोड़ों के रथ पर सवार सूरज
तुम यदि दिशाएँ याद रखना भूल जाओं तो
मेरी बच्ची का दिशा सूचक यंत्र ले जाना
प्रश्नो का व्यापार करते विश्व मे
उत्तर का बोध सबसे जरुरी है
बच्चों की,हवाओं और पानी बाले बादलों की दिशाएँ
उसी से तय हो रहीं हैं
बच्चो के सर के ऊपर उत्तर और पेरो के नीचे दक्षिण है
बच्चो के दाहिने बाएँ बदलती रहती है दिशाएँ
यहाँ कुछ तो रातें तय करती है
कुछ चाँद तारे और सूरज
बाँकी सब बच्चों के हिस्से मे हैं
आधी रात तक जागते और देर तक सोते लोगों के पास
शायद कुछ नहीं है
रातो ने तय कर दिया है सबकी सुबह दोपहर तक होगी ।
कमलेश कुमार दीवान
नोट.. यह कविता समकालीन भारतीय साहित्य नई दिल्ली के
अंक 84 जुलाई अगस्त 1999 मे प्रकाशित हुई है।
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009
मै तन्हा तन्हा तेरे
मैं तन्हा..तन्हा,तेरे रास्तों से गुजरा हूँ
मुकाम मेरे ,रहबरों ने ही तलाश किये ।
लम्हें खुशी के भी आए,दुःखों के ठहरे शहर
तमाम मेरे मुखबिरो ने ही खलाश किये ।
नए नए से असर फितरतों से पलते गये
शमाएँ रोशनी में आठों पहर जलते गये
निशाँ जमीं पे बने,बिगड़े डगमगाए कदम
सदाएँ मौसमी सहते गये सिहरते गये।
मैं जहाँ जहाँ भी तेरे रास्ते से गुजरा हूँ
मुकाम मेरे सिरफिरों ने ही तलाश किये।
गलत सही के हिसाबो..किताब कौन रखें
चला चलूँ तो,मालों.आसबाब कौन रखे।
एक अदद दिल पे ही काबूँ नहीं रखा जाता
उतार फेंकूँ तो फिर ये लिबास कौन रखें।
मेरी तासीर मँजिलों को ढूँढना तो नहीं
एक मकसद कि सारा जहाँन मौन रहे
मै कहाँ कहाँ से तेरे वास्ते से गुजरा हूँ
मुकाम मेरे दिलजलों ने ही तलाश किये।
मै तन्हाँ तन्हाँ तेरे रास्तों से गुजरा हूँ
मुकाम मेरे रहबरों ने ही तलाश किये।
कमलेश कुमार दीवान
८ जून १९९४
मुकाम मेरे ,रहबरों ने ही तलाश किये ।
लम्हें खुशी के भी आए,दुःखों के ठहरे शहर
तमाम मेरे मुखबिरो ने ही खलाश किये ।
नए नए से असर फितरतों से पलते गये
शमाएँ रोशनी में आठों पहर जलते गये
निशाँ जमीं पे बने,बिगड़े डगमगाए कदम
सदाएँ मौसमी सहते गये सिहरते गये।
मैं जहाँ जहाँ भी तेरे रास्ते से गुजरा हूँ
मुकाम मेरे सिरफिरों ने ही तलाश किये।
गलत सही के हिसाबो..किताब कौन रखें
चला चलूँ तो,मालों.आसबाब कौन रखे।
एक अदद दिल पे ही काबूँ नहीं रखा जाता
उतार फेंकूँ तो फिर ये लिबास कौन रखें।
मेरी तासीर मँजिलों को ढूँढना तो नहीं
एक मकसद कि सारा जहाँन मौन रहे
मै कहाँ कहाँ से तेरे वास्ते से गुजरा हूँ
मुकाम मेरे दिलजलों ने ही तलाश किये।
मै तन्हाँ तन्हाँ तेरे रास्तों से गुजरा हूँ
मुकाम मेरे रहबरों ने ही तलाश किये।
कमलेश कुमार दीवान
८ जून १९९४
शनिवार, 26 सितंबर 2009
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
।।करें बँदना मैया तोरी ।।
करें बँदना
मैया तोरी ।
रहे सब सुखी
हो समृध्दशाली,
तेरे दर से कोई
न जाये खाली ।
यही कामना है
माँ शेरावाली
यही प्रार्थना है
मैया मोरी ।
करे बँदना ,मैया तोरी ।
कमलेश कुमार दीवान
24/09/2009
करें बँदना
मैया तोरी ।
रहे सब सुखी
हो समृध्दशाली,
तेरे दर से कोई
न जाये खाली ।
यही कामना है
माँ शेरावाली
यही प्रार्थना है
मैया मोरी ।
करे बँदना ,मैया तोरी ।
कमलेश कुमार दीवान
24/09/2009
सोमवार, 21 सितंबर 2009
श्याम मोरे (प्रार्थना भजन)
श्याम मोरे (प्रार्थना भजन)
श्याम मोरे ,श्याम मोरे ,श्याम मोरे
फिर तुझे आना पड़ेगा
फिर तुझे आना पड़ेगा ।
आज फिर मीरा को
विष देकर ,सुधारा जा रहा है
द्रोपदी के चीर से ,
पर्वत बनाया जा रहा है ।
सूर,उद्वव,नँद-जसुमति
देवकी बसुदेव सब है
पर बहुत है कंस,
फिर कारां बनायाँ जा रहा है ।
रूख्मणि -राधा अकेली
गोपियों की बँद बोली
ओ कन्हैया कालिया वध
के लिये आना पड़ेगा ।
श्याम मोरे,श्याम मोरे,श्याम मोरे
फिर तुझे आना पड़ेगा
फिर तुझे आना पड़ेगा।
कमलेश कुमार दीवान
21/09/1998
श्याम मोरे ,श्याम मोरे ,श्याम मोरे
फिर तुझे आना पड़ेगा
फिर तुझे आना पड़ेगा ।
आज फिर मीरा को
विष देकर ,सुधारा जा रहा है
द्रोपदी के चीर से ,
पर्वत बनाया जा रहा है ।
सूर,उद्वव,नँद-जसुमति
देवकी बसुदेव सब है
पर बहुत है कंस,
फिर कारां बनायाँ जा रहा है ।
रूख्मणि -राधा अकेली
गोपियों की बँद बोली
ओ कन्हैया कालिया वध
के लिये आना पड़ेगा ।
श्याम मोरे,श्याम मोरे,श्याम मोरे
फिर तुझे आना पड़ेगा
फिर तुझे आना पड़ेगा।
कमलेश कुमार दीवान
21/09/1998
शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
नर्मदा मैया
नर्मदा मैया
नर्मदा मैया ,
ऐसी बहे रे........
अमरकंटक से खम्बात हो ।
नर्मदा मैया है रे ..।
घाटन घाट
पुजावे शँकर ,
घाट घाट पे राम ।
जिनने भी परिक्रमा
कर लई
कर लये चारो धाम ।
नर्मदा मैया
ऐसी बहे रे ....।.
कमलेश कुमार दीवान
18/09/2009
नर्मदा मैया ,
ऐसी बहे रे........
अमरकंटक से खम्बात हो ।
नर्मदा मैया है रे ..।
घाटन घाट
पुजावे शँकर ,
घाट घाट पे राम ।
जिनने भी परिक्रमा
कर लई
कर लये चारो धाम ।
नर्मदा मैया
ऐसी बहे रे ....।.
कमलेश कुमार दीवान
18/09/2009
नर्मदा मैया
नर्मदा मैया
नर्मदा मैया ,
ऐसी बहे रे........
अमरकंटक से खम्बात हो ।
नर्मदा मैया है रे ..।
घाटन घाट
पुजावे शँकर ,
घाट घाट पे राम ।
जिनने भी परिक्रमा
कर लई
कर लये चारो धाम ।
नर्मदा मैया
ऐसी बहे रे ....।.
कमलेश कुमार दीवान
18/09/2009
नर्मदा मैया ,
ऐसी बहे रे........
अमरकंटक से खम्बात हो ।
नर्मदा मैया है रे ..।
घाटन घाट
पुजावे शँकर ,
घाट घाट पे राम ।
जिनने भी परिक्रमा
कर लई
कर लये चारो धाम ।
नर्मदा मैया
ऐसी बहे रे ....।.
कमलेश कुमार दीवान
18/09/2009
बुधवार, 2 सितंबर 2009
॥ॐ श्री गणेशाय नमः॥ स्तुति बँदना
॥ॐ श्री गणेशाय नमः॥
स्तुति बँदना
गजानन रखियो सबकी लाज।
हे गणपति हे विध्न विनाशक
होवे सुफल सब काज
गजानन रखियो सबकी लाज ।
कोई माँगे रिध्दि सिध्दि
कोई चाहे शुभ लाभ
देना सबको विद्या बुध्दि
और सुमति के साज
गजानन रखियो सबकी लाज ।
कमलेश कुमार दीवान
२३ अगस्त २००९ गणेश चतुर्थी
स्तुति बँदना
गजानन रखियो सबकी लाज।
हे गणपति हे विध्न विनाशक
होवे सुफल सब काज
गजानन रखियो सबकी लाज ।
कोई माँगे रिध्दि सिध्दि
कोई चाहे शुभ लाभ
देना सबको विद्या बुध्दि
और सुमति के साज
गजानन रखियो सबकी लाज ।
कमलेश कुमार दीवान
२३ अगस्त २००९ गणेश चतुर्थी
सोमवार, 31 अगस्त 2009
मेघ गीत मेघ बरसो रे
मेघ गीत मेघ बरसो रे
मेघ बरसो रे
प्यासे देश,
बहां सब रीत गये ।
ताल तलैया ,नदियाँ सूखी
रीता हिया का नेह
मेघ बरसो रे पिया के देश ...
बहाँ सब बीत गये ।
कुम्लाऍ है
कमल कुमुदनी
घास पात और देह
उड़ उड़ टेर लगाये पपीहा
होते गये विदेह ।
मेघ हर्षो रे
प्यासे देश
यहाँ सब रीत गये ।
मेघ बरसो रे
पिया के देश
बहाँ सब रीत गये ।
कमलेश कुमार दीवान
दिनाँक २३अगस्त २००९
मेघ बरसो रे
प्यासे देश,
बहां सब रीत गये ।
ताल तलैया ,नदियाँ सूखी
रीता हिया का नेह
मेघ बरसो रे पिया के देश ...
बहाँ सब बीत गये ।
कुम्लाऍ है
कमल कुमुदनी
घास पात और देह
उड़ उड़ टेर लगाये पपीहा
होते गये विदेह ।
मेघ हर्षो रे
प्यासे देश
यहाँ सब रीत गये ।
मेघ बरसो रे
पिया के देश
बहाँ सब रीत गये ।
कमलेश कुमार दीवान
दिनाँक २३अगस्त २००९
रविवार, 23 अगस्त 2009
भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे
॥श्री गणेशाय नमः॥
भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे
मेरो मन न
अंत को पावे ।
मेरो मन न अंत को पावे।
जहाँ कोटि
ब्रम्हाण्ड बने हैं
जगा....जोत सम लागे।
मेरो मन न अंत को पावे ।
लोग कहत
उजियार जगत् में
जित देखा तम है,
एक सूरज से
क्या होता है
कई करोड़ कम हैं ।
टिम टिमाते
तारे.... तारे से
बार बार भरमावे ।
मेरा मन न, अंत को पावे।
जो दीखें न
अँधकार है
तब प्रकाश भ्रम है
भरम मिटे न
इस दुनियाँ का
आदि ... अनादि क्रम है।
तृण.... तृण
अनंत हो जावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।
कमलेश कुमार दीवान
गणेश चतुर्थी रविवार
दिनाँक २३ अगस्त २००९
भजन ःः मेरो मन न अंत को पावे
मेरो मन न
अंत को पावे ।
मेरो मन न अंत को पावे।
जहाँ कोटि
ब्रम्हाण्ड बने हैं
जगा....जोत सम लागे।
मेरो मन न अंत को पावे ।
लोग कहत
उजियार जगत् में
जित देखा तम है,
एक सूरज से
क्या होता है
कई करोड़ कम हैं ।
टिम टिमाते
तारे.... तारे से
बार बार भरमावे ।
मेरा मन न, अंत को पावे।
जो दीखें न
अँधकार है
तब प्रकाश भ्रम है
भरम मिटे न
इस दुनियाँ का
आदि ... अनादि क्रम है।
तृण.... तृण
अनंत हो जावे ।
मेरो मन न, अंत को पावे ।
कमलेश कुमार दीवान
गणेश चतुर्थी रविवार
दिनाँक २३ अगस्त २००९
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
चिड़ियाँ रानी
चिड़ियाँ रानी
चिड़िया रानी आना
धूल मत नहाना
छोटी सी कटोरी मे
दाना रखा है ।
छोटे छोटे पँख तेरे
सारा है आकाश
दूर दूर जाती उड़ के
आती पास पास
मेरी छप्पर छानी मे
घौंसला बनाना
चिड़ियाँ रानी आना
चिड़िया रानी आना
कमलेश कुमार दीवान
चिड़िया रानी आना
धूल मत नहाना
छोटी सी कटोरी मे
दाना रखा है ।
छोटे छोटे पँख तेरे
सारा है आकाश
दूर दूर जाती उड़ के
आती पास पास
मेरी छप्पर छानी मे
घौंसला बनाना
चिड़ियाँ रानी आना
चिड़िया रानी आना
कमलेश कुमार दीवान
शनिवार, 8 अगस्त 2009
याद आये नानी
याद आये नानी
आओ सब मिल सोचे रे भैया
क्यों इतनी खींचातानी
बार..बार याद आए नानी ।
आओ सब मिल .............।
ताम झाम तो बढे
पुटरिया ज्यों की त्यों है
टाबर ऊँचे हुये
झोपड़ियाँ ऐसी क्यों है
फक्कड़ ही रह गये आज
बस्ती बस्ती के लोग
कुछ बन गये अमीर
कुछेक मे बनने के सँजोग
आओ सब मिल सोचे रे भैया
क्यों इतनी है ,मनमानी
बार बार याद आए नानी ।
घर आँगन जगमग करते पर
मन मे हुये अँधेरे
दुनिया कहती जाये सुन रे
ये माया के फेरे
बनते गये समुद्र
नदी भी न रह पाई छुद्र
सबके सब है धुत्त
रमैया फिर भी रहता क्रुध
मनाएँ आजादी के जश्न
ढुकरिया रूठीं क्यों है
आओ सब मिल सोचे रे भैया
क्यों इतनी है बेईमानी
बार बार याद आए नानी ।
कमलेश कुमार दीवान
१४ अक्तूबर १९९७
आओ सब मिल सोचे रे भैया
क्यों इतनी खींचातानी
बार..बार याद आए नानी ।
आओ सब मिल .............।
ताम झाम तो बढे
पुटरिया ज्यों की त्यों है
टाबर ऊँचे हुये
झोपड़ियाँ ऐसी क्यों है
फक्कड़ ही रह गये आज
बस्ती बस्ती के लोग
कुछ बन गये अमीर
कुछेक मे बनने के सँजोग
आओ सब मिल सोचे रे भैया
क्यों इतनी है ,मनमानी
बार बार याद आए नानी ।
घर आँगन जगमग करते पर
मन मे हुये अँधेरे
दुनिया कहती जाये सुन रे
ये माया के फेरे
बनते गये समुद्र
नदी भी न रह पाई छुद्र
सबके सब है धुत्त
रमैया फिर भी रहता क्रुध
मनाएँ आजादी के जश्न
ढुकरिया रूठीं क्यों है
आओ सब मिल सोचे रे भैया
क्यों इतनी है बेईमानी
बार बार याद आए नानी ।
कमलेश कुमार दीवान
१४ अक्तूबर १९९७
गुरुवार, 6 अगस्त 2009
प्रार्थनाओ के युगों में..मीत मेरे
प्रार्थनाओ के युगों में..मीत मेरे
प्रार्थनाओं के युगो मे
मीत मेरे,
तुम हमारे साथ मिलकर
गुनगुनाओ ,गीत गाओ ।
बीज वोये थे सृजन के
आज अँकुराने लगे हैं
कारवाँ को रोककर
ये रास्ते जाने लगे हैं
मँजिले है दूर उनके
सिलसिले भर रह गये हैं
अर्हताओं के युगो में
मीत मेरे
तुम हवा के साथ मिलकर
खुद ही खुद ही गाना सीख जाओ ।
प्रार्थनाओं के युगों मे
मीत मेरे
तुम हमारे साथ मिलकर
गुनगुनाओ,गीत गाओ ।
प्रार्थनाएँ की अहिल्या ने
युगों से ठुकराई वही नारी बनी थी
प्रार्थना से भिल्लनी..शबरी
भक्ति पथ की सही अधिकारी बनी थी
प्रार्थनाएँ दुःखों के संहार की थी
प्रार्थनाएँ एक नये अवतार की थी
प्रार्थनाओं से हम बनाते राम
वही फिर दुःख भोगता,अभिषाप ढोता है
वर्जनाओ के युगो मे
मीत मेरे
तुम हमारे साथ मिलकर बीत जाओ।
प्रार्थनाओ के युगो मे
तुम हमारे साथ मिलकर
गुनगुनाओ, गीत गाओ ।
कमलेश कुमार दीवान
०२ अप्रेल ०६
प्रार्थनाओं के युगो मे
मीत मेरे,
तुम हमारे साथ मिलकर
गुनगुनाओ ,गीत गाओ ।
बीज वोये थे सृजन के
आज अँकुराने लगे हैं
कारवाँ को रोककर
ये रास्ते जाने लगे हैं
मँजिले है दूर उनके
सिलसिले भर रह गये हैं
अर्हताओं के युगो में
मीत मेरे
तुम हवा के साथ मिलकर
खुद ही खुद ही गाना सीख जाओ ।
प्रार्थनाओं के युगों मे
मीत मेरे
तुम हमारे साथ मिलकर
गुनगुनाओ,गीत गाओ ।
प्रार्थनाएँ की अहिल्या ने
युगों से ठुकराई वही नारी बनी थी
प्रार्थना से भिल्लनी..शबरी
भक्ति पथ की सही अधिकारी बनी थी
प्रार्थनाएँ दुःखों के संहार की थी
प्रार्थनाएँ एक नये अवतार की थी
प्रार्थनाओं से हम बनाते राम
वही फिर दुःख भोगता,अभिषाप ढोता है
वर्जनाओ के युगो मे
मीत मेरे
तुम हमारे साथ मिलकर बीत जाओ।
प्रार्थनाओ के युगो मे
तुम हमारे साथ मिलकर
गुनगुनाओ, गीत गाओ ।
कमलेश कुमार दीवान
०२ अप्रेल ०६
छोटे छोटे हाशियाँ
छोटे छोटे हाशियाँ
छोटे छोटे हाशियाँ है
कितनी बड़ी जमात,
जात पाँत के खाने बढते
घटती गई समात।
कागज पत्तर दौड़ रहे हैं
बड़े बड़े गिनतारे ले
घूमे राम रहीमा चाचा
बड़े चढे गुणतारे ले
सड़के और मदरसे होंगे
गाँव गाँव की दूरी पर
नहीं रखेगा कोई किसी को
फोकटिया मजदूरी पर
साहूकार नही हाँकेगा
रेबड़ अपने ढोरों की
यह सरकार बनी है अपनी
नही चलेगी औरों की
समझाये पर कौन क्या हुआ
सब अग्रेजी भाषा मे
लुटते रहे पतंगों जैसे
आसमान की आशा मे
बड़े बड़े सपने है भैया
छोटी छोटी मात ।
जाति पाँति के खाने बढते
घटती गई समात।
कमलेश कुमार दीवान
९ मार्च १९९४
छोटे छोटे हाशियाँ है
कितनी बड़ी जमात,
जात पाँत के खाने बढते
घटती गई समात।
कागज पत्तर दौड़ रहे हैं
बड़े बड़े गिनतारे ले
घूमे राम रहीमा चाचा
बड़े चढे गुणतारे ले
सड़के और मदरसे होंगे
गाँव गाँव की दूरी पर
नहीं रखेगा कोई किसी को
फोकटिया मजदूरी पर
साहूकार नही हाँकेगा
रेबड़ अपने ढोरों की
यह सरकार बनी है अपनी
नही चलेगी औरों की
समझाये पर कौन क्या हुआ
सब अग्रेजी भाषा मे
लुटते रहे पतंगों जैसे
आसमान की आशा मे
बड़े बड़े सपने है भैया
छोटी छोटी मात ।
जाति पाँति के खाने बढते
घटती गई समात।
कमलेश कुमार दीवान
९ मार्च १९९४
रविवार, 26 जुलाई 2009
गगन मै
गगन मै
गगन मै
उड़ते बिहग अनेक।
गगन मे
उड़ते ,बिहग अनेक ।
कोई अकेला
कोई सखा सँग
कोई..कोई विशेष ।
गगन में,
उड़ते बिहग अनेक ।
कमलेश कुमार दीवान
गगन मै
उड़ते बिहग अनेक।
गगन मे
उड़ते ,बिहग अनेक ।
कोई अकेला
कोई सखा सँग
कोई..कोई विशेष ।
गगन में,
उड़ते बिहग अनेक ।
कमलेश कुमार दीवान
मंगलवार, 7 जुलाई 2009
चिड़ियों की चिंताओं मे
चिड़ियों की चिंताओं मे
ओ चिड़ियो , ओ चिड़ियो
पंख फड़फड़ाओ मत
उड़ के तुम दूर कहीं जाओ मत
गाओ गुनगुनाओं मत
खिलखिला के हँसना सब दूर मना
ये पर्वत ,नदियाँ ,झील, सागर के साथ साथ
नीला आकाश खूब बना ठना है
आसपास एक छोटा पिंजरा बना है
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
फंख फड़फड़ाओ मत
गाओ गुनगुनाओ मत
खिलखिला के हँसना सब दूर मना है।
अब कितना मुश्किल है
खोखले से बरगद पर घौसला बनाना
खतरनाक हो गया है
दूर हरे खेतों से चुग्गा ले आना
दुनका दाना पानी सब यहीं बुलाने दो
उड़ना पर तौलना सब दूर मना है।
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
फंख फड़फड़ाओ मत
उनको फुरफुराने दो
गाओ मत गीत कोई
उनको ही गाने दो
आस पास आओ मत
उनको मँडराने दो
नीला आकाश खूब बना ठना है।
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
आस पास एक छोटा पिंजरा बना है।
कमलेश कुमार दीवान
०८ मार्च १९९५
ओ चिड़ियो , ओ चिड़ियो
पंख फड़फड़ाओ मत
उड़ के तुम दूर कहीं जाओ मत
गाओ गुनगुनाओं मत
खिलखिला के हँसना सब दूर मना
ये पर्वत ,नदियाँ ,झील, सागर के साथ साथ
नीला आकाश खूब बना ठना है
आसपास एक छोटा पिंजरा बना है
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
फंख फड़फड़ाओ मत
गाओ गुनगुनाओ मत
खिलखिला के हँसना सब दूर मना है।
अब कितना मुश्किल है
खोखले से बरगद पर घौसला बनाना
खतरनाक हो गया है
दूर हरे खेतों से चुग्गा ले आना
दुनका दाना पानी सब यहीं बुलाने दो
उड़ना पर तौलना सब दूर मना है।
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
फंख फड़फड़ाओ मत
उनको फुरफुराने दो
गाओ मत गीत कोई
उनको ही गाने दो
आस पास आओ मत
उनको मँडराने दो
नीला आकाश खूब बना ठना है।
ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो ओ चिड़ियो
आस पास एक छोटा पिंजरा बना है।
कमलेश कुमार दीवान
०८ मार्च १९९५
रविवार, 7 जून 2009
क्या करूँ मेरे मना....... गीत
suniye
क्या करूँ मेरे मना....... गीत
क्या करूँ , मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है,रहता अनमना।
ऐसा लगता,भागते रहने से
सब कुछ खो रहा है
जिंदगी के गीत गाये साथ साथ
अब खुशी के साथ भी कुछ हो रहा है।
दिल नहीं लगता है ,रहता अनमना
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना ।
ठहरना ,चलना,ठिठकना, याद रखना भूलना
शुष्क ॠतुओं मे उपजना,लहलहाना
और फलना फूलना
आए मौसम जब बहारों का
मुस्कराने ,मचलने और श्रृगारों का
भूलकर होती नहीँ है कल्पना ।
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।
क्या अधेंरी रात का आकाश या तारा बनूँ
बादलों बरसात की एक बूँद ,जल सारा बनूँ
या कि सागर झील का मोती रहूँ
सीप में पलते हुए संसार का कारा बनूँ
पीर हरने का सहारा जन्मना.
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।
कमलेश कुमार दीवान
०१ मई २००६
क्या करूँ मेरे मना....... गीत
क्या करूँ , मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है,रहता अनमना।
ऐसा लगता,भागते रहने से
सब कुछ खो रहा है
जिंदगी के गीत गाये साथ साथ
अब खुशी के साथ भी कुछ हो रहा है।
दिल नहीं लगता है ,रहता अनमना
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना ।
ठहरना ,चलना,ठिठकना, याद रखना भूलना
शुष्क ॠतुओं मे उपजना,लहलहाना
और फलना फूलना
आए मौसम जब बहारों का
मुस्कराने ,मचलने और श्रृगारों का
भूलकर होती नहीँ है कल्पना ।
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।
क्या अधेंरी रात का आकाश या तारा बनूँ
बादलों बरसात की एक बूँद ,जल सारा बनूँ
या कि सागर झील का मोती रहूँ
सीप में पलते हुए संसार का कारा बनूँ
पीर हरने का सहारा जन्मना.
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।
क्या करूँ मै क्या करूँ मेरे मना
दिल नहीं लगता है रहता अनमना ।
कमलेश कुमार दीवान
०१ मई २००६
बुधवार, 20 मई 2009
दरबारों मे खास हुए हैं
दरबारों मे खास हुए हैं
दरबारो मे
खास हुए हैं
आम लोग सारे ,
आम लोग सारे ।
गलियारो मे
पहरे...पहरे
जनता दरवाजो पर ठहरे ,
मुट्ठी भर जनत्तंत्र यहाँ पर
अधिनायक सारे ,।
दरबारो मे खास हुए हैं
आम लोग सारे ,।
आम लोग सारे ।
राज निरंकुश
काज निरंकुश
इनके सारे बाज निरंकुश
लोक नही
मनतंत्र यहाँ पर
गणनायक हारे ।
दरबारो मे खास हुए हैं
आम लोग सारे ।
आम लोग सारे।
ठहर गए
कानून नियम सब
खाली सब आदेश
मुफलिस की
आँखों मे आँसू
हरकारे दरवेश,
ऊँच..नीच के भेद वही हैं
काले वही ,सफेद वही है
स्वेच्छाचारी और अनिवारक
मणिबाहक सारे।
दरबारो मे खास हुए है्
आम लोग सारे ।
आम लोग सारे ।
कमलेश कुमार दीवान
मई १९९३
दरबारो मे
खास हुए हैं
आम लोग सारे ,
आम लोग सारे ।
गलियारो मे
पहरे...पहरे
जनता दरवाजो पर ठहरे ,
मुट्ठी भर जनत्तंत्र यहाँ पर
अधिनायक सारे ,।
दरबारो मे खास हुए हैं
आम लोग सारे ,।
आम लोग सारे ।
राज निरंकुश
काज निरंकुश
इनके सारे बाज निरंकुश
लोक नही
मनतंत्र यहाँ पर
गणनायक हारे ।
दरबारो मे खास हुए हैं
आम लोग सारे ।
आम लोग सारे।
ठहर गए
कानून नियम सब
खाली सब आदेश
मुफलिस की
आँखों मे आँसू
हरकारे दरवेश,
ऊँच..नीच के भेद वही हैं
काले वही ,सफेद वही है
स्वेच्छाचारी और अनिवारक
मणिबाहक सारे।
दरबारो मे खास हुए है्
आम लोग सारे ।
आम लोग सारे ।
कमलेश कुमार दीवान
मई १९९३
मंगलवार, 5 मई 2009
आज गाने,गुनगुनाने का,नहीं मौसम...
suniye
नहीं मौसम...
आज गाने,गुनगुनाने का,
नहीं मौसम
नाते रिश्ते आजमाने का ,
नहीं मौसम
घर बनाने और बसाने का,
समय है
उनको ढेलो से ढहानें का,
नहीं मौसम
आज गाने गुनगुनाने का
नही मौसम ।
मेरे तेरे,इसके उसके
फेर मे हम सब पड़े है
कुछ लकीरे खींचकर एक
चौखटे मे सब जड़े हैं
कायदा है समय से
सब कुछ भुनाने का
आज अपने दिल जलाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
एक मकसद,एकमँजिल,
एक ही राहें हमारी
क्रातियाँ ,जेहाद्द से दूने हुये दुःख
फिर कटी बाहें हमारी
जलजलों ,बीमारियों का कहर
बरपा है,
गुम हुई हैं बेटियाँ जब शहर
तड़फा है
यातनायें,मौत पर दो चार आँसू
और फिर मातम,मनाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
दूर हो जाये गरीबी जब
जलजलों के कहर
सालेंगें नहीं
गोलियाँ ,बारूद बम और एटम का
क्या करेगें युध्द
पालेंगे नहीं
दरकते,और टूटते रिश्तों के पुल
बनानें का समय है
सरहदों को खून की
नदियाँ बनाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
कमलेश कुमार दीवान
८ जून १९९४
नहीं मौसम...
आज गाने,गुनगुनाने का,
नहीं मौसम
नाते रिश्ते आजमाने का ,
नहीं मौसम
घर बनाने और बसाने का,
समय है
उनको ढेलो से ढहानें का,
नहीं मौसम
आज गाने गुनगुनाने का
नही मौसम ।
मेरे तेरे,इसके उसके
फेर मे हम सब पड़े है
कुछ लकीरे खींचकर एक
चौखटे मे सब जड़े हैं
कायदा है समय से
सब कुछ भुनाने का
आज अपने दिल जलाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
एक मकसद,एकमँजिल,
एक ही राहें हमारी
क्रातियाँ ,जेहाद्द से दूने हुये दुःख
फिर कटी बाहें हमारी
जलजलों ,बीमारियों का कहर
बरपा है,
गुम हुई हैं बेटियाँ जब शहर
तड़फा है
यातनायें,मौत पर दो चार आँसू
और फिर मातम,मनाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
दूर हो जाये गरीबी जब
जलजलों के कहर
सालेंगें नहीं
गोलियाँ ,बारूद बम और एटम का
क्या करेगें युध्द
पालेंगे नहीं
दरकते,और टूटते रिश्तों के पुल
बनानें का समय है
सरहदों को खून की
नदियाँ बनाने का
नहीं मौसम ।
आज गाने गुनगुनाने का
नहीं मौसम ।
कमलेश कुमार दीवान
८ जून १९९४
सोमवार, 4 मई 2009
आशाओं के सृजन का गीत ...." ओ सूरज "
suniye
आशाओं के सृजन का गीत
ओ सूरज
ओ सूरज तुम हटो ,मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है ।
चाहे अँधियारे घिर आएँ
सिर फोड़े तूफान
मेरी राह नहीं आयेगें
नदियों के उँचे ऊफान
ओ चँदा तुम किरन बिखेरों
तारों मे छिप जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है।
ओ सूरज तुम हटो, मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।
कमलेश कुमार दीवान
आशाओं के सृजन का गीत
ओ सूरज
ओ सूरज तुम हटो ,मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है ।
चाहे अँधियारे घिर आएँ
सिर फोड़े तूफान
मेरी राह नहीं आयेगें
नदियों के उँचे ऊफान
ओ चँदा तुम किरन बिखेरों
तारों मे छिप जाना है ।
पँख लगा उड़ जाना है।
ओ सूरज तुम हटो, मुझे भी
आसमान मे आना है
पँख लगा उड़ जाना है ।
कमलेश कुमार दीवान
शनिवार, 2 मई 2009
छूने को आकाश बहुत
छूने को आकाश बहुत
छूने को आकाश,
बहुत मन करता है
जाने कब ये हाथ और उँचे होंगें।
घुटनो चलते तारों को पाने मे रोया
चाँद पकड़ पाने की ,जिद करते..करते सोया
आज लगा यह सूरज ,
देखो सब कुछ हाँक रहा
अँधियारे को इस दुनिया से
कैसे ढाक रहा
सब कुछ खत्म हो पर दुनिया मे
बची रहें आशाएँ
जाने कब विश्वास और दूने होगें।
छूने को आकाश बहुत
मन करता है
जाने कब ये हाथ और उँचे होगें।
कमलेश कुमार दीवान
छूने को आकाश,
बहुत मन करता है
जाने कब ये हाथ और उँचे होंगें।
घुटनो चलते तारों को पाने मे रोया
चाँद पकड़ पाने की ,जिद करते..करते सोया
आज लगा यह सूरज ,
देखो सब कुछ हाँक रहा
अँधियारे को इस दुनिया से
कैसे ढाक रहा
सब कुछ खत्म हो पर दुनिया मे
बची रहें आशाएँ
जाने कब विश्वास और दूने होगें।
छूने को आकाश बहुत
मन करता है
जाने कब ये हाथ और उँचे होगें।
कमलेश कुमार दीवान
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
कल क्या हो ?
suniye
पृथ्वी दिवस केअवसर पर गीत
कल क्या हो ?
कोई मुझसे पूछे ,
कल क्या हो ?
मैं कहता ,यह संसार रहे ।
हम रहें ,न रहें
फिर भी तो
घूमेगी दुनियाँ इसी तरह।
चमकेगा आसमान सारा
नदियाँ उमड़ेगी उसी तरह।
ये सात समुंदर, बचे रहें
को व्दीप न डूबें
सागर में,
सब कुछ बिगड़े
पर थोड़ा सा
जल बचा रहे
इस घाघर मे।
सब कुछ तो
खत्म नहीं होता
जो बचा आपसी प्यार रहे
कोई मुझसे पूछे
कल क्या हो
मे कहता हूँ ,संसार रहे ।
कमलेश कुमार दीवान
नोटःःप्राकृतिक पर्यावरण के केन्द्र मे मानव है।जलवायु परिवर्तनशील तत्वो का
समुच्य है।परिवर्तन होते रहें हैं और होंगें,परन्तु हमे आशाओं का सृजन
करना चाहिये।संसार की आबादियो को यह गीत सादर समर्पित है।
पृथ्वी दिवस केअवसर पर गीत
कल क्या हो ?
कोई मुझसे पूछे ,
कल क्या हो ?
मैं कहता ,यह संसार रहे ।
हम रहें ,न रहें
फिर भी तो
घूमेगी दुनियाँ इसी तरह।
चमकेगा आसमान सारा
नदियाँ उमड़ेगी उसी तरह।
ये सात समुंदर, बचे रहें
को व्दीप न डूबें
सागर में,
सब कुछ बिगड़े
पर थोड़ा सा
जल बचा रहे
इस घाघर मे।
सब कुछ तो
खत्म नहीं होता
जो बचा आपसी प्यार रहे
कोई मुझसे पूछे
कल क्या हो
मे कहता हूँ ,संसार रहे ।
कमलेश कुमार दीवान
नोटःःप्राकृतिक पर्यावरण के केन्द्र मे मानव है।जलवायु परिवर्तनशील तत्वो का
समुच्य है।परिवर्तन होते रहें हैं और होंगें,परन्तु हमे आशाओं का सृजन
करना चाहिये।संसार की आबादियो को यह गीत सादर समर्पित है।
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
गगन मै
गगन मै
गगन मै
उड़ते बिहग अनेक।
गगन मे उड़ते ,बिहग अनेक ।
कोई अकेला
कोई सखा सँग
कोई..कोई विशेष ।
गगन में,उड़ते बिहग अनेक ।
कमलेश कुमार दीवान
गगन मै
उड़ते बिहग अनेक।
गगन मे उड़ते ,बिहग अनेक ।
कोई अकेला
कोई सखा सँग
कोई..कोई विशेष ।
गगन में,उड़ते बिहग अनेक ।
कमलेश कुमार दीवान
सोमवार, 20 अप्रैल 2009
ओ पंछी उड़ जा रे
suniye
ओ पंछी उड़ जा रे
ओ पंछी उड़ जा रे
साँझ हो रही है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
छुई मुई से पँख तेरे
सारा आकाश
दूर ऊँचे पर्वत और बादलों के पास
आज घनें पैड़ नहीं
न छप्पर...छानी
पानी के खप्पर मे
न होती दानी
घोंसलें के तिनकों की,तान खो गयी है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
बरगद की खोहो मे
प्राण नहीं हैं
बूढे रखवारे मे
जान नहीं हैं
रात के बसेरों पर
बिजली के सूरज हैं
दाना..पानी मे ईमान नही है
चारे चुन चुनकर
घोंसले बनाये जो
आज वही ,कमरों की शान हो गई हैं
ओ पँछी उड़ जा रे
साँझ हो गई है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
कमलेश कुमार दीवान
ओ पंछी उड़ जा रे
ओ पंछी उड़ जा रे
साँझ हो रही है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
छुई मुई से पँख तेरे
सारा आकाश
दूर ऊँचे पर्वत और बादलों के पास
आज घनें पैड़ नहीं
न छप्पर...छानी
पानी के खप्पर मे
न होती दानी
घोंसलें के तिनकों की,तान खो गयी है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
बरगद की खोहो मे
प्राण नहीं हैं
बूढे रखवारे मे
जान नहीं हैं
रात के बसेरों पर
बिजली के सूरज हैं
दाना..पानी मे ईमान नही है
चारे चुन चुनकर
घोंसले बनाये जो
आज वही ,कमरों की शान हो गई हैं
ओ पँछी उड़ जा रे
साँझ हो गई है
डेरों के पास आयेगा न बहेलियाँ ।
कमलेश कुमार दीवान
मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
अकेले मन का गीत
suniye
अकेले मन का गीत
ओ अकेले मन ,
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे ,कारबाँ मे,कारबाँ मे ।
बहुत झगड़े हैं ,झमेले हैं
ठहरकर आबाद रहने मे
सब तरफ से उगलियाँ उठती
भीड़ मे अपबाद रहने से
बात को बर्दाश्त करने का
समय अब चुक गया है
श्वाँस की उष्माएँ सहने का भी
मौसम रुक गया है
पर रुका न सिलसिला ,दुनियावी मेलो का
ओ अकेले तन
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे, कारबाँ ,मे कारबाँ मे ।
मान्यतायें अनगिनत
अपनी जमातों मे
बाँटकर देखा
शहर और गाँव ,जातों मे
सोचते षड़यंत्र करते
दें किसी को मात
मेल इतना सा और
अनबन ढेर नातों मे
हाथ मे झँडें हैं खँजर हैं
पर न बदला रूप भी,मिट्टी के ढेलों का
ओ अकेले कण तुझे
मिलना पड़ेगा
कारबाँ मे,कारबाँ मे,कारबाँ मे।
ओ अकेले मन
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे, कारबाँ मे, कारबाँ मे ।
कमलेश कुमार दीवान
अकेले मन का गीत
ओ अकेले मन ,
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे ,कारबाँ मे,कारबाँ मे ।
बहुत झगड़े हैं ,झमेले हैं
ठहरकर आबाद रहने मे
सब तरफ से उगलियाँ उठती
भीड़ मे अपबाद रहने से
बात को बर्दाश्त करने का
समय अब चुक गया है
श्वाँस की उष्माएँ सहने का भी
मौसम रुक गया है
पर रुका न सिलसिला ,दुनियावी मेलो का
ओ अकेले तन
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे, कारबाँ ,मे कारबाँ मे ।
मान्यतायें अनगिनत
अपनी जमातों मे
बाँटकर देखा
शहर और गाँव ,जातों मे
सोचते षड़यंत्र करते
दें किसी को मात
मेल इतना सा और
अनबन ढेर नातों मे
हाथ मे झँडें हैं खँजर हैं
पर न बदला रूप भी,मिट्टी के ढेलों का
ओ अकेले कण तुझे
मिलना पड़ेगा
कारबाँ मे,कारबाँ मे,कारबाँ मे।
ओ अकेले मन
तुझे चलना पड़ेगा
कारबाँ मे, कारबाँ मे, कारबाँ मे ।
कमलेश कुमार दीवान
मंगलवार, 7 अप्रैल 2009
आजादी की याद मे एक गीत
आजादी की याद मे एक गीत
उन सपनो को ,कौन गिनाएँ
जो बारी से छूठ गये
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये।
होना दूर गरीबी को था
पर विलासता बढती क्यो
परिवर्तन की चाह मे निकली
राह सियासी लगती क्यों?
पसरा रहता घोर अँधेरा
इन बिजली के तारों से
जान न पाए पीढाओं को
बाते चाँद सितारों से।
उन अपनों को कौन मनाएँ
जो यारी से छूठ गये
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये ।
हमलो के बढते खतरों में
लोग अकेले रहते हैं
बीहड में डाकू, राहों पर
कई लुटेरें रहतें हैं
गजब हुए हैं दिल्ली बाले
गबई गाँव सब छूट गये।
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये।
कमलेश कुमार दीवान
११ जनवरी १९९८
उन सपनो को ,कौन गिनाएँ
जो बारी से छूठ गये
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये।
होना दूर गरीबी को था
पर विलासता बढती क्यो
परिवर्तन की चाह मे निकली
राह सियासी लगती क्यों?
पसरा रहता घोर अँधेरा
इन बिजली के तारों से
जान न पाए पीढाओं को
बाते चाँद सितारों से।
उन अपनों को कौन मनाएँ
जो यारी से छूठ गये
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये ।
हमलो के बढते खतरों में
लोग अकेले रहते हैं
बीहड में डाकू, राहों पर
कई लुटेरें रहतें हैं
गजब हुए हैं दिल्ली बाले
गबई गाँव सब छूट गये।
ऐसा लगता कोई देवता
इन अपनो से रूठ गये।
कमलेश कुमार दीवान
११ जनवरी १९९८
अब अंधकार भी जाने कितने
suniye
अब अंधकार भी जाने कितने
अब अंधकार भी
जाने कितने स्हाय घने होंगे,
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल ।
हम ढूँढ रहे हैं क्यों
अनंत के छोर
दुख के प्रहार अब
द्रवित नहीं करते हैँ ।
नित नई वेदनाओं
के प्रवाह मे लोग
सूखे अँतस से
क्रमिक नहीं झरते हैं ।
दिल के सुराख भी
जाने कितनें और बड़े होंगें ।
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल
अब अँधकार भी जाने कितने
स्हाय घने होंगें ।
टुकड़ों टुकड़ों मे बटे हुये
कैसे एक देश बनाएँगें
सूखीं बगियाँ ,मरते माली
कैसे एक फूल उगायेंगें
धन लुटा,अस्मिता नग्न हुई
नोंचे जाते पथ पर सुहाग
बसते संसार भी
जानै कितनें उजड़ गये होगें
अब अँधकार भी जाने कितने
स्हाय घने होंगें
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल ।
कमलेश कुमार दीवान
अब अंधकार भी जाने कितने
अब अंधकार भी
जाने कितने स्हाय घने होंगे,
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल ।
हम ढूँढ रहे हैं क्यों
अनंत के छोर
दुख के प्रहार अब
द्रवित नहीं करते हैँ ।
नित नई वेदनाओं
के प्रवाह मे लोग
सूखे अँतस से
क्रमिक नहीं झरते हैं ।
दिल के सुराख भी
जाने कितनें और बड़े होंगें ।
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल
अब अँधकार भी जाने कितने
स्हाय घने होंगें ।
टुकड़ों टुकड़ों मे बटे हुये
कैसे एक देश बनाएँगें
सूखीं बगियाँ ,मरते माली
कैसे एक फूल उगायेंगें
धन लुटा,अस्मिता नग्न हुई
नोंचे जाते पथ पर सुहाग
बसते संसार भी
जानै कितनें उजड़ गये होगें
अब अँधकार भी जाने कितने
स्हाय घने होंगें
पथ धूल धूसरित और दिशाएँ
हुई नयन से ओझल ।
कमलेश कुमार दीवान
सोमवार, 30 मार्च 2009
कविताओं के संदर्भ मे एक कविता
कविताओं के संदर्भ मे एक कविता
कविताएँ ज्यादा कहती है्
वे अर्थ और जीवन के बीच
नदी सी बहती है्।
कविताएँ ज्यादा कहती है।
वे राग रँग
सच और प्रसंग की धार बनाती है
आनंद और उत्सर्ग सहित
जन जन से आती है
वे पीड़ाओं की एक
सदी सी सहती हैं ।
कविताएँ ज्यादा कहती हैं।
कमलेश कुमार दीवान
२५ मार्च १९०६
कविताएँ ज्यादा कहती है्
वे अर्थ और जीवन के बीच
नदी सी बहती है्।
कविताएँ ज्यादा कहती है।
वे राग रँग
सच और प्रसंग की धार बनाती है
आनंद और उत्सर्ग सहित
जन जन से आती है
वे पीड़ाओं की एक
सदी सी सहती हैं ।
कविताएँ ज्यादा कहती हैं।
कमलेश कुमार दीवान
२५ मार्च १९०६
शुक्रवार, 27 मार्च 2009
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥
भारतवर्ष के नव संवत् विक्रम संवत् २०६६
गुड़ी पड़वा चैत्र शुक्ल प्रथम के पावन पर्व पर
शुभमंगलकामनाएँ है। देशवाशियों को यह गीत
सादर समर्पित है......
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नछत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति बरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
चैत्र शुक्ल एकम् संवत् २०६६
भारतवर्ष के नव संवत् विक्रम संवत् २०६६
गुड़ी पड़वा चैत्र शुक्ल प्रथम के पावन पर्व पर
शुभमंगलकामनाएँ है। देशवाशियों को यह गीत
सादर समर्पित है......
नव संवत् शुभ..फलदायक हों
नव संवत् शुभ..फलदायक हों।
ग्रह नछत्र
काल गणनाएँ
मानवता को सफल बनाएँ
नव मत..सम्मति बरदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो।
जीवन के संघर्ष
सरल हों
आपस के संबंध
सहज हों
नया भोर यह,नया दौर है
विपत्ति निबारक सुखदायक हो।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
नव संवत् शुभ...फलदायक हो ।
कमलेश कुमार दीवान
चैत्र शुक्ल एकम् संवत् २०६६
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