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रविवार, 10 मई 2026

मां की फिर याद आई

 ‌‌  "मां की फिर याद आई "

                  कमलेश कुमार 'दीवान'

फिर खिला फूल, मां की फिर याद आई 

याद आये वे घरौंदे वो नदी पहाड़ के खेल 

गुड्डे गुड़ियों के साथ झूठी कुट्टी और मेल 

ढूंढते इसे उसे  कूक हा हू छुपम छुपाई 

फिर हुई शाम तो मां की फिर याद आई 

फिर खिला फूल  मां की फिर याद आई 

कमलेश कुमार 'दीवान' 

10/6/26

@सर्वाधिकार सुरक्षित 

#happymothersday

मां जीवन में हमेशा साथ होती है उनकी यादें और बचपन भूले भी नहीं जाते हैं मां के लिए तो हर दिन हर घड़ी हर पल है पर आज विशेष है मातृ दिवस पर शुभकामनाएं Happy mother's day 💐 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

तुम जो मिलते हो.... नज़्म

तुम जो मिलते हो .... नज़्म 

                     कमलेश कुमार दीवान 

 तुम जो मिलते हो ख्यालों में धूप आती है 

यूं पास रहते तो हवाएं भी चुप लगाती है 

गुनगुनाने लगे इस झील का पानी ऐसे 

जैसे नदियां ज्यों पहाड़ों से उतर आती है 

रंग फूलों का भी खिल के निखर आता है 

बाग  में खुशबू का हर रंग नज़र आता है 

मुस्कुराते पात डालियां भी लहलहाती हैं 

उड़ती फिरती हुई चिड़ियाएं चहचहाती है 

अब बहुत दूर हुए पास भी आएं तो क्या 

बस तेरी याद ही  होले से धप्प जमाती है 

तुम जो मिलते हो ख्यालों में धूप आती है 

यूं पास रहते तो हवाएं भी चुप लगाती है 

कमलेश कुमार दीवान 

22/4/26

@सर्वाधिकार सुरक्षित 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

यार किससे कहें.... ग़ज़ल

 💐💐यार किससे कहे💐💐

                      कमलेश कुमार दीवान
हर एक रंग होता है प्यार ,यार किससे कहें
सभी तो होते हैं तलबगार ,यार किससे कहें
बहारें देख, खिलते हैं मन,और गुल गुलिस्तां मे
सभी होते हैं,बागों मे शुमार ,यार किससे कहें
ये तितलियां वो भंवरे यूं तो नहीं आते हैं यहाँ
स्वाद है रस भी है बेशुमार, यार किससे कहें
वो खुशबू को उड़ाते है यूं बार बार इन हवाओं मे
जिबह भी हो दिलो मे खुमार, यार किससे कहे
ये तमाशा भी बैठकर यहां देखता है "दीवान"
रगो मे ,रंग मे, रंग की बयार, यार किससे कहे
कमलेश कुमार दीवान
14/2/26

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

दरिया -2

 दरिया या नदी की हालातों पर हम अनेक तरह से अपनी बात कह सकते हैं अर्ज़ किया है कि....

 ‌              *दरिया -2

                       कमलेश कुमार दीवान 

अपनी ही रवानी से अनजान है दरिया 

झरनो की मेहरबानी से पशेमान है दरिया 

जाना था  बहुत दूर समुंदर की तरफ ही 

साहिल है निगहबानी से परेशान है दरिया 

धारा भी थक गई है रूक रूक के बह रहा 

थमने की इस कहानी से बेजान है दरिया 

आया था पहाड़ों से बड़ी धार में लेकिन 

फिर किसकी निगरानी से हैरान है दरिया 

लहरें हवा से आज क्यों ऊंची उठे 'दीवान '

पानी तो निशानी भी तेरी पहचान हैं दरिया 

कमलेश कुमार दीवान 

19/3/25

#दरिया 

@सर्वाधिकारसुरक्षित

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

दरिया.... ग़ज़ल

          दरिया 

                       कमलेश कुमार दीवान 

यूं अपनी ही रवानी से अनजान है दरिया 

इस उसकी मेहरबानी से पशेमान है दरिया 

जाना था अभी उसको समुंदर की तरफ ही 

घाटी की बेईमानी से बहुत परेशान  है दरिया 

कभी कम तो तेज अब थमा सा ही रह गया 

अपनी ही इस कहानी से कुछ हैरान है दरिया 

पहाड़ों से सरकते आ रहा एक सैलाब सा धीरे

अपनी ही निगहबानी से असमान हैं दरिया 

लहरें हवा से आज भी क्यों उठ रही 'दीवान '

कुछ छोड़ निशानी से तेरी पहचान हैं दरिया 

कमलेश कुमार दीवान 

19/3/25

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

आवाज से तेरी

 बहुत दिनों के बाद बेटी की फोन पर आवाज सुनकर दिल को जो तसल्ली मिली वह इन शब्दों में बयां हुई है ....

आवाज से तेरी 

                 कमलेश कुमार दीवान 

कुछ तो सुकून मिलता है आवाज से तेरी 

खुश होता आसमान भी परवाज़ से तेरी 

कायनात सज गई है फिर यूं ही इस तरह 

महफ़िल सितारों की भी सुर साज़ से तेरी 

अपने लिए भी किसने यहां तान ये छेड़ी 

सरगम सुनाई देती हैं  साज़ बाज से तेरी 

तूने झुकाया आसमां धरती पे इस तरह 

मौसम है खुशगवार काम काज से तेरी 

यूं ही किसे आवाज दे रहे हो तुम 'दीवान '

सब और हैं खुशियां भी अरबाज से तेरी 

कमलेश कुमार दीवान 

13/12/25


अरबाज =शक्ति, स्वतंत्रता,ऊंची उड़ान के गुणों का प्रतीक 


सोमवार, 8 दिसंबर 2025

ख्वाब की ताबीर में... ग़ज़ल

 ख्वाब की ताबीर में 

                        कमलेश कुमार दीवान 

अपने एक ख्बाव की ताबीर में ऐसा ही हुआ

चाहा था चांद को आफताब भी वैसा ही हुआ 

धूप और छांव का  कोई फ़र्क नहीं लगता है 

दिन कायनात में भी  चांदनी जैसा ही हुआ 

हवाएं थी कि हम उसको पकड़ के चलते रहे 

नदी में पांव रख्खे  उड़ने का अंदेशा ही हुआ 

फूल कांटों से चुभे  झाड़ पेड़ आसमान में थे 

खेत घर बार महकते थे ये सब कैसा ही हुआ 

हम भी क्या क्या सोचते रहते हैं यहां 'दीवान'

पानी जला आग महक उठी तमाशा ही हुआ 

कमलेश कुमार दीवान 

7/11/25

अपने ही हैं बाजार में... ग़ज़ल

 अपने ही हैं बाजार में 

                     कमलेश कुमार 'दीवान'

अपने ही है बाजार में खरीददार भी अपने 

बीमार भी अपने ही हैं तीमारदार भी अपने 

सब कुछ बिखर गया  कुछ भी तो नहीं रहा 

ग़म दे रहे हैं अपने ही  गमख्वार भी अपने 

अपने लिबास देखते या फिर उनके पैराहन 

तार तार भी अपने ही हैं गमगुसार भी अपने 

अब कौन कहां  किसके लिए जी रहे 'दीवान'

बेजार भी अपने हैं और जार जार भी अपने 

                          कमलेश कुमार दीवान 

                               5/12/25


1- गमख्वार  =दुख दर्द में साथ देने वाला , दुःख दर्द बांटने वाला, सहानुभूति रखने वाला, सहिष्णु, सहनशील 

1-तार तार =बिखर जाना, टुकड़े टुकड़े हो जाना, छवि का पूरी तरह धूमिल हो जाना 

3-गम गुसार =हमदर्द,दुख दर्द बांटने वाला, दिलासा देने वाला 

4-बेजार=ऊब जाना,तंग आ जाना, विमुख, नाखुश, अप्रसन्न,खिन्न 

5-जार जार=फूट फूटकर रोना, अत्य

धिक दुखी होना 



मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

रास्ते..... कमलेश कुमार दीवान

 रास्ते 

                     कमलेश कुमार दीवान 

ये रास्ते अच्छे लगे  पर सच्चे नहीं लगते 

क्षितिज से आसमां तक देखते जाओ 

धरा की आश है सब ओर  मिलता छोर 

पर ये सब ही स्वप्न है, सच्चे नहीं लगते । 

ये रास्ते......

किनारों से सटी रहकर सरकती जा रही नदियां 

किसी की कोख भरती और फिर खाली करती हैं 

यूं ही संघर्ष से नरसंहार में मरती जा रही सदियां 

किसे फिर याद होगा जी रहे हैं लोग मर मर कर 

किसी के वास्ते से वो सब ही हैं अच्छे लगे हैं 

पर ये सब कभी सच्चे नहीं लगते।

ये रास्ते.....

बुनियाद में कुछ झूठ हो थोड़ा फरेब भी 

फिर तमाशे भी वही निभने-निबाहने के 

वायदे हो कसम भी साथ आने के 

कभी इन वास्तों को देख लो अनुभव करो 

क्या ये वास्ते कच्चे बहुत कच्चे  नहीं होते ?

जो रास्ते सुखकर लगे वो रास्ते अच्छे नहीं होते 

ये रास्ते.......

कमलेश कुमार दीवान 

18/8/25

नर्मदा पुरम मध्यप्रदेश 

461001 



रविवार, 7 सितंबर 2025

सबा न थी .... गज़ल कमलेश कुमार 'दीवान''

 सबा न थी  --गजल 

                    कमलेश कुमार दीवान 

हम जिस हवा के साथ थे वो तो सबा न थी 

वो गुलिस्तां में थी मगर बाद ए सबा न थी 

कैसे जले चिराग़ ये सब, तूफान आए तब 

कोई मेहरबां न थी वो कोई हम नवा न थी 

माजी से थक गया हूं अब मौसम भी नहीं है 

चाहत थी गुल खिले  वहां रूह ए रवा न थी 

दरिया में था महताब तब दिल में अलाव सा 

बागों में तितलियां तो थी आब ओ हवा न थी 

किसने छुपाया कौन सा वो राज फिर 'दीवान '

चलता रहा वो रात भर कोह ए फिजा न थी 

कमलेश कुमार दीवान 

15/4/25



बुधवार, 3 सितंबर 2025

इंसान ने किया.....गजल

 इंसान ने किया -गजल 

                कमलेश कुमार दीवान 

कुछ हवा ने किया कुछ तूफान ने किया 

आंधी का काम भी यहां इंसान ने किया 

बादल के फूट पड़ने से खिसके पहाड़ भी 

बाकी बचा ही क्या सब आसमान ने किया 

बहुतेरी सड़क बन गई जंगल के बीच से 

रूठे हैं पेड़ पौधे ये क्या अनजान ने किया 

कुछ तो कुसूर अपना कुछ जरूरतों का था 

सब ढह गया है  जो यहां नादान ने किया 

क्या क्या गिनाए दुःख यहां घाटी पहाड़ के 

'दीवान 'इस जहां में सब पहचान ने किया 

'कमलेश कुमार दीवान' 

26/8/25

सोमवार, 28 जुलाई 2025

फूल और बेटियां

फूल और बेटियां 

      कमलेश कुमार दीवान 

जब जब घर के गमले में गुलाब खिलते हैं 

बेटियां याद आती है 

जो पढ़ने गई है विदेश में नौकरी पर हैं देश में 

और जो ब्याह दी गई बहुत दूर 

ये फूल क्यों खिलते हैं घर के गमले में याद दिलाने 

बेटियों के संघर्ष जद्दोजहद आद्योपांत 

भीड़ भरी सड़कें,कोलाहल दफ्तर

छोटे छोटे कमरों वाली दड़बे नुमा हास्टल 

क्यों इन कांटों में ही खिल उठते हैं गुलाब 

जो याद दिला जाते हैं बेटियों की 

उनके संघर्ष अपने से कष्ट चुभते हैं कांटो की तरह 

बस खुशियां ही थोड़ी कम लगती है 

गुलाब तुम गमलों में मत खिलो ऐसे 

जिनमें बेटियां दिखे गुलाब सी 

बेटियां और फूल एक से ही हैं 

खिलते हैं तो खुशियां बिखेरते हैं 

और मुरझाते है तब........?

कमलेश कुमार दीवान 

26/7/25

सोमवार, 14 जुलाई 2025

रहें हैं लोग.... ग़ज़ल कमलेश कुमार दीवान

 रहे हैं लोग ... ग़ज़ल 

                    कमलेश कुमार दीवान 

जिन सीढ़ियों से चढ़ते उतरते रहे हैं लोग 

उन्ही सीढ़ियों से लुढ़कते गिरते रहे हैं लोग 

सुनते रहे हैं ज़श्न मनाने की तालियां सभी 

नीचे  गिरे तो गिर के सिहरते रहें हैं लोग

खुशियों से भरें दिखते हैं दुःख भोगते हुए 

खुद को ही भूलकर यूं उबरते रहें हैं लोग 

ऊंचाई पर भी और भी उठने की हसरतें 

घायल हुए हैं ज़ख्म को भरते रहें हैं लोग 

कुछ देर और देखो तमाशा भी ये 'दीवान' 

चलने से ज्यादा अब तो ठहरते रहे हैं लोग 

कमलेश कुमार दीवान 

5/3/25







रविवार, 8 जून 2025

जला है दीया

               *जला है दिया *

                                कमलेश कुमार दीवान 

कभी हवाओं से तो कभी तूफान से जला है दीया 

कि बुझाने वालों के ही अभिमान से जला है दीया 

मिटाने आई है कितनी ही बार हस्तियां फिर भी 

बार बार हर मक़ाम उसी शान से जला है दीया 

बहुत उजाला था बस्ती में  कहीं अंधेरा ही न था 

दिखाएं ऐसे नजारे  बड़े अरमान से जला है दीया 

समय की धार तेज है उस भंवर में घूमते  'दीवान'

सच है कि बार बार अपने  ईमान से जला है दीया 

कमलेश कुमार दीवान 

12/4/25

मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

एक खिलौना हो जाए

 दुनिया एक खिलौना हो जाए 

                            कमलेश कुमार दीवान 

सोच रहे हैं यह दुनिया भी एक खिलौना हो जाए 

बदला बदला आसमान हो जो भी होना हो जाए 

चांद सितारे ग्रह उपग्रह यूं मुट्ठी में कर ले सबको 

पुच्छल तारें बैठ फिरें हम जो भी होना हो जाए

देखें पुंज पुंज को छूकर कैसे बन मिट सिमट रहे

ब्लैक होल में घूमे हम भी जो भी होना हो जाए 

निहारिकाएं छुए टटोले टुकड़े टुकड़े फिर जोड़ें 

सूरज पर अपना डेरा हो जो भी होना हो जाए 

सब कुछ छोड़ हवा को ढूंढें प्यास बुझाने पानी 

धरती जैसी और ज़मीं हो जो भी होना हो जाए 

कैसे कैसे ख्बाव हमारे ख्यालों में खोये 'दीवान' 

हम भी चले हवाओं जैसे जो भी होना हो जाए 

                             कमलेश कुमार दीवान 

                                   2/1/25

सोमवार, 7 अप्रैल 2025

राम जी

         ।।राम जी ।।  ‌‌ 

                    कमलेश कुमार दीवान 

अच्छे बुरे हैं सबका ध्यान रखते हैं राम जी

पहचानते हैं सबका मान रखते हैं राम जी 

वे राज में है काज में और समाज में भी हैं

वो जानते हैं सबकी शान रखते हैं राम जी 

रोटी गरीब को मिले खुशियां भी बढ़े बहुत 

सही ओ ग़लत की पहचान रखते हैं राम जी 

कैसे बताएं वे बसते सभी के दिल दिमाग में 

वन में जटायु का एहसान रखते हैं राम जी 

क्या क्या बताएं और भी महिमा है राम की 

'दीवान' सबमें जान प्राण रखते हैं राम जी 

कमलेश कुमार दीवान 

6/4/25

बुधवार, 12 मार्च 2025

लुत्फ़

 कभी कभी हम कुछ लिखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की जल्दबाजी में शब्दों के प्रभाव को नजरंदाज कर देते हैं परन्तु जो शब्द होते हैं वे भी नाद करते हैं नृतन करते हुए हमे आलोड़ित करते जाते हैं ऐसा ही एक शब्द है लुत्फ़ जिसका आशय आनंद से है हमारे विचार ये है....

          *लुत्फ़"

अब लुफ़्त जिंदगी के भी उठाए नहीं जाते 

गाने हंसी खुशी के भी तो गाए नहीं जाते 

दुनिया का ये माहौल भी जुदा जुदा सा है 

मौसम जो आएं  अब वे आ के नहीं जाते 

कमलेश कुमार दीवान 

12/3/25

#लुत्फ़_मौसम_खुशी

शुक्रवार, 17 जनवरी 2025

ख्यालों से चलों.... कमलेश कुमार दीवान

 ख्यालों से चलों 

                        कमलेश कुमार दीवान 

तुम कहीं दूर बहुत,अपने ख्यालों से चलों 

गम के सायों से चलों अपने सवालों से चलों 

ये दुनिया भी एक ताबीज की मानिंद ही है 

अपने जज्बात और आते उजालों  से चलों 

बहुत कुछ पाया है हमने भी इसी दुनिया से 

अपनी फितरत है सहो पांव के छालों से चलों 

मैं नहीं,वो नहीं ये कौन है जो थम सा गया 

तुम चलो हम भी चलें उनके हवालों से चलों 

दुनिया वाले भी ऐसे ही  रोकते रहते 'दीवान '

उठाओ तेज कदम अपनी ही चालों से चलों 

कमलेश कुमार दीवान 

17/1/25




शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

कैसे कौन कहे .... कमलेश कुमार दीवान

 * कैसे कौन कहे *

                     कमलेश कुमार दीवान 

बीते दिन की मीठी बातें 

कैसे कौन कहे ।

इस उस किस किससे मुलाकातें 

कैसे कौन कहे ।

दिन तपते हैं दुपहर भारी 

शाम सुनहरी रातें कारी 

उमस भरी सांसे लगती है

बादर और वर्षा बाजारी 

यहां अधिक जल और 

वहां कहीं पर बूंदाबांदी 

मन भाए ललचाए ऐसे 

एक बड़ी सौगात  लगती हैं 

दिन बीते रूठी सी रातें 

कौन बताए कैसे मौन सहे 

कैसे कौन कहे ।

मौसम की क्या बात कहें हम 

कुछ ठंडा कुछ ताप सहे हम 

पावस गई शरद आईं है 

किस ऋतु की क्या माप कहें हम 

बदला  समय बिताना मुश्किल 

कैसे कौन सहे।

कमलेश कुमार दीवान 

21/09/24

नर्मदा पुरम मध्यप्रदेश भारत वर्ष 

461001


गुरुवार, 5 सितंबर 2024

पाठशालाएं.... कमलेश कुमार दीवान शिक्षक दिवस पर विशेष नज़्म

 शिक्षक दिवस 2024 पर विशेष 

          *उनींदी पाठशालाएं * हिंदी नज़्म 

                 कमलेश कुमार दीवान 

बच्चों अपने आप को देखों निहारों पाठशालाएं 

तुम्हारी जिंदगी थी और हजारों स्वप्न शालाएं 

अपनी सी दर ओ दीवार काले पर सफेद चाक 

लिखे  सब किलम से और किए स्लेट में साफ़ 

सफेद झक कुर्ते धोती पहने गुरूदेव शाला में 

सजे है मेज़ और एक तस्वीर पर फूल मालाएं 

वीणा वादनी मां सरस्वती होती थी किताबों में 

नदी पर्वत की पावनता पढ़ते थे दो-आबो में 

उत्तर में पहरी हिमालय आज़ भी है ,बहुत ऊंचा 

पावन नदी गंगा जिसने सभ्यताओं को बहुत सींचा 

बच्चों अब भी वही तस्वीर तख्ता चाक डस्टर है 

बदलती जा रही है जिंदगी, लगाए जैसे अस्तर हैं 

घंटी हैं मगर चुपचाप से बच्चे हैं और  स्थूल शालाएं 

न वो बातें, न वो मंजर ,न वो फोटो ,न मालाएं

सभी के साथ भी तो है सभी को याद भी तो है

अपने आप को देखों निहारों उनींदी पाठशालाएं 

कमलेश कुमार दीवान 

1/9/24

नर्मदा पुरम मध्यप्रदेश भारत वर्ष 

461001